ट्रेड डील विवाद के बीच राहुल पर सब्सटेंटिव मोशन, सियासत में नई हलचल
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ट्रेड डील विवाद के बीच राहुल पर सब्सटेंटिव मोशन, सियासत में नई हलचल

राहुल गांधी के आरोपों के बाद सरकार ने विशेषाधिकार प्रस्ताव से कदम पीछे खींचा, लेकिन भाजपा सांसद ने निष्कासन के लिए मौलिक प्रस्ताव देकर विवाद बढ़ा दिया।


केंद्र सरकार और राहुल गांधी के बीच टकराव, जो पिछले सप्ताह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान शुरू हुआ था और 11 फरवरी को उस समय तेज हो गया जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में भारत के हितों को कथित रूप से बेचने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला अब वो थमने का नाम नहीं ले रहा।

12 फरवरी को यह टकराव एक दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया। केंद्र सरकार ने पहले जिस विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव को लाने की बात कही थी, उससे पीछे हटते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के खिलाफ एक मौलिक प्रस्ताव (Substantive Motion) का नोटिस दे दिया। इस प्रस्ताव में न केवल राहुल की लोकसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई है, बल्कि उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की भी मांग की गई है।

सरकार ने विशेषाधिकार प्रस्ताव से पीछे हटाया कदम

एक दिन पहले, जब राहुल गांधी ने लोकसभा में बजट चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी पर कई आरोप लगाए थे और सत्ता पक्ष की ओर से हंगामा हुआ था, तब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सरकार बेबुनियाद और निराधार आरोप लगाने तथा संसदीय नियमों का उल्लंघन करने के लिए राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाएगी। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि राहुल अपने आरोपों को प्रमाणित नहीं करते तो सरकार आगे बढ़ेगी।

हालांकि, लोकसभा में अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि वे अपने सभी दावों को प्रमाणित करेंगे। लेकिन सूत्रों के अनुसार गुरुवार दोपहर तक उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद सरकार ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस नहीं दिया। सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह यू-टर्न राहुल को कोई रियायत देने के कारण नहीं था। बल्कि इसलिए था क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के निर्देश पर राहुल के सभी कथित निराधार और आपत्तिजनक बयान रिकॉर्ड से हटा दिए गए थे।

एक वरिष्ठ एनडीए सांसद ने संकेत दिया कि सरकार को शायद यह एहसास हुआ कि लोकसभा की विशेषाधिकार समिति का गठन जून 2024 के बाद से नहीं हुआ है और बाद में गठित समिति पहले से दिए गए नोटिस की जांच नहीं कर सकती थी।

मौलिक प्रस्ताव से नया विवाद

सरकार ने राहुल पर दबाव बनाए रखने के लिए अलग रास्ता अपनाया और निशिकांत दुबे ने मौलिक प्रस्ताव का नोटिस दिया। एमएन कौल और एसएल शकधर की पुस्तक प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर ऑफ पार्लियामेंट के अनुसार, मौलिक प्रस्ताव वह स्वतंत्र प्रस्ताव होता है जिसे सदन की स्वीकृति के लिए इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह सदन का निर्णय व्यक्त कर सके।

इससे पहले भी इस संसदीय उपाय का उपयोग सांसदों को निष्कासित या निलंबित करने के लिए किया गया है। 2005 में कैश फॉर क्वेरी मामले में 10 लोकसभा सांसदों को निष्कासित किया गया था। 2008 में भाजपा सांसद बाबूभाई कटारा को भी जांच के बाद लोकसभा से बाहर कर दिया गया था। ऐसे में दुबे का यह कदम गंभीर परिणाम ला सकता है, लेकिन उनके नोटिस की सामग्री ने विपक्ष ही नहीं बल्कि एनडीए के भीतर भी हैरानी और व्यंग्य पैदा किया है।

नोटिस में त्रुटियां और विवाद

दुबे के नोटिस में कई आरोप ऐसे हैं जिन्हें साबित करना कठिन है। यहां तक कि एक जगह उन्होंने गलती से राहुल गांधी की जगह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम लिख दिया है। नोटिस में राहुल गांधी की विदेश यात्राओं, उनकी सुरक्षा व्यवस्था और कथित रूप से फोर्ड फाउंडेशन से संबंधों को लेकर आरोप लगाए गए हैं।

दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने संसद के मंच का उपयोग चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और अन्य संस्थाओं के खिलाफ निराधार आरोप लगाने के लिए किया है। उन्होंने जॉर्ज सोरोस, फोर्ड फाउंडेशन और सैम पित्रोदा के साथ कथित संबंधों का भी उल्लेख किया और राहुल के अनैतिक आचरण की जांच कर उन्हें तत्काल निष्कासित करने की मांग की।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

कांग्रेस नेताओं ने दुबे के इस कदम को ध्यान भटकाने की कोशिश और संसदीय प्रक्रिया का मजाक बताया। उनका कहना है कि यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों से ध्यान हटाने के लिए उठाया गया है। राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी ने भी इस नोटिस का मजाक उड़ाया।

विशेषज्ञों की राय

लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने कहा कि यह नोटिस गंभीर त्रुटियों से भरा है और संभवतः प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज हो जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी सांसद को निष्कासित करना बेहद गंभीर मामला है और केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही ऐसा होता है। बिना ठोस प्रमाण और जांच के केवल आरोपों के आधार पर ऐसा प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता।

बजट सत्र 13 फरवरी से अवकाश पर जा रहा है और 9 मार्च को दोबारा शुरू होगा। ऐसे में संभावना कम है कि दुबे इस नोटिस को अवकाश से पहले आगे बढ़ा सकें। इस दौरान उन्हें अपने नोटिस की खामियों को सुधारने का अवसर मिल सकता है। अन्यथा यह कदम केंद्र सरकार को लोकसभा और बाहर झेलनी पड़ी असहज स्थिति से ध्यान हटाने की कोशिश माना जाएगा, जो राहुल गांधी के तीखे हमले और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर उठ रहे सवालों के कारण पैदा हुई है।

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