बंगाल और तमिलनाडु में प्रचार खत्म, वो बड़े मुद्दे जो तय करेंगे जीत और हार का फैसला
x

बंगाल और तमिलनाडु में प्रचार खत्म, वो बड़े मुद्दे जो तय करेंगे जीत और हार का फैसला

एक तरफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की DMK अपनी सत्ता बचाने की जद्दोजहद में हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी दोनों ही राज्यों में मुख्य चुनौती बनकर उभरी है।


जैसे-जैसे तमिलनाडु में चुनाव प्रचार थमने को है और पश्चिम बंगाल की 152 सीटों पर पहले चरण का मतदान (23 अप्रैल) करीब आ रहा है, पूरे देश की नजरें इन दो राज्यों पर टिकी हैं। एक तरफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की DMK अपनी सत्ता बचाने की जद्दोजहद में हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी दोनों ही राज्यों में मुख्य चुनौती बनकर उभरी है। आइए देखते हैं वे कौन से बड़े मुद्दे रहे जिन्होंने इस पूरे चुनाव प्रचार की दिशा तय की।

पश्चिम बंगाल में इस बार मुकाबला केवल विकास पर नहीं, बल्कि 'पहचान' और 'सुरक्षा' पर सिमट गया है।

1. SIR विवाद और 91 लाख नामों की कटौती

चुनाव से पहले 'सप्लीमेंट्री इन्वेंटरी रिवीजन' (SIR) के तहत मतदाता सूची से लगभग 91 लाख नामों का हटना सबसे बड़ा मुद्दा बना। बंगाल में वोटरों की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई है। सीमावर्ती जिलों में बड़ी संख्या में नामों के हटने से चुनावी समीकरण पूरी तरह अनिश्चित हो गए हैं। बीजेपी ने इसे 'वोटर लिस्ट की सफाई' बताया, जबकि TMC ने इसे अल्पसंख्यक मतदाताओं को निशाना बनाने की साजिश करार दिया।

2. बंगाली उप-राष्ट्रवाद बनाम घुसपैठ

ममता बनर्जी ने 'बहिरागत' (बाहरी) कार्ड खेलते हुए बीजेपी को 'बंगाली अस्मिता' का विरोधी बताया। उन्होंने अन्य राज्यों में बंगाली प्रवासियों को निशाना बनाए जाने के खिलाफ मोर्चा खोला। इसके विपरीत, बीजेपी ने अपना पूरा प्रचार 'घुसपैठ' के इर्द-गिर्द रखा। बीजेपी ने आरोप लगाया कि TMC ने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को पनाह देकर राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) बदल दी है।

3. मतुआ फैक्टर और भ्रष्टाचार

लगभग 50 सीटों पर प्रभाव रखने वाला मतुआ समुदाय इस बार भी केंद्र में है। SIR सूची से नामों के हटने के बाद मतुआ मतदाताओं में अपनी नागरिकता और पहचान को लेकर डर बढ़ा है। वहीं, विपक्ष ने 'शिक्षक भर्ती घोटाले' और भ्रष्टाचार को लेकर ममता सरकार पर तीखे हमले किए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 25,000 नियुक्तियों को रद्द किए जाने के फैसले ने शहरी इलाकों में सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा किया है।

4. महिलाओं की सुरक्षा और आरक्षण

आर.जी. कर अस्पताल की घटना ने बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। विपक्ष ने कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार को घेरा, तो ममता बनर्जी ने 'लक्ष्मीर भंडार' जैसी अपनी कल्याणकारी योजनाओं और महिला सांसदों की संख्या (40%) के जरिए खुद को महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी बताया।

तमिलनाडु: कल्याण, संघवाद और 'विजय' का जादू

दक्षिण के इस राज्य में राजनीति इस बार पारंपरिक DMK-AIADMK की लड़ाई से आगे निकलती दिख रही है।

1. विजय (TVK) फैक्टर:

इस चुनाव में सबसे बड़ा 'एक्स-फैक्टर' अभिनेता विजय की पार्टी 'तमिझगा वेत्री कड़गम' (TVK) है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय की रैलियों में उमड़ रही भारी भीड़ पारंपरिक पार्टियों के लिए खतरे की घंटी है। क्या विजय केवल वोट काटेंगे या वह एक 'तीसरे विकल्प' के रूप में उभरेंगे, यह इस चुनाव का सबसे बड़ा सस्पेंस है।

2. मुफ्त बिजली बनाम रोजगार

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) पर टिकी रही है। जहाँ DMK मुफ्त बिजली और कैश ट्रांसफर जैसी योजनाओं के जरिए वोट मांग रही है, वहीं युवा मतदाताओं का झुकाव अब रोजगार और निजी निवेश की ओर बढ़ रहा है। राज्य में कल्याण बनाम विकास का संतुलन एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है।

3. भाषा और संघवाद

तमिलनाडु में हिंदी थोपे जाने का विरोध और 'नीट' (NEET) जैसे केंद्रीय कानून हमेशा से संवेदनशील रहे हैं। DMK ने इसे संघीय अधिकारों की रक्षा के रूप में पेश किया है, जबकि बीजेपी का तर्क है कि ये नीतियां राष्ट्रीय एकीकरण और विकास के लिए जरूरी हैं।

4. परिसीमन और महिला आरक्षण

महिला आरक्षण बिल को दक्षिण भारत में एक अलग नजरिए से देखा जा रहा है। DMK और कांग्रेस का तर्क है कि आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) से जोड़ना दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक ताकत को कम करने की साजिश है। स्टालिन ने इसे राज्य की स्वायत्तता बनाम केंद्र के प्रभुत्व की लड़ाई बना दिया है।

बंगाल में जहाँ लड़ाई 'बंगाली अस्मिता' और 'सुरक्षा' के बीच है, वहीं तमिलनाडु में यह 'संघीय ढांचे' और 'नए विकल्प' (विजय) के बीच सिमट गई है। मतदाता इन मुद्दों पर अपनी मुहर लगाएंगे, जिससे न केवल इन राज्यों का भविष्य तय होगा, बल्कि 2029 की राष्ट्रीय राजनीति का संकेत भी मिलेगा।


Read More
Next Story