TMC में बगावत, कांग्रेस से नजदीकी और 2/3 का नियम, क्या होगा आगे?
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TMC में बगावत, कांग्रेस से नजदीकी और 2/3 का नियम, क्या होगा आगे?

टीएमसी के कांग्रेस में संभावित विलय की चर्चा के बीच ममता बनर्जी को दो तिहाई समर्थन, बागी गुट और चुनाव आयोग जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।


पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (TMC) के संभावित कांग्रेस विलय को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच बढ़ती नजदीकियों ने इन अटकलों को और हवा दी है। हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस संभावना पर चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी भी राजनीतिक दल का विलय केवल राजनीतिक इच्छा से संभव नहीं होता। इसके लिए संवैधानिक प्रावधानों, दल-बदल कानून, चुनाव आयोग के नियमों और संगठनात्मक सहमति जैसी कई बाधाओं को पार करना पड़ता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय करना चाहें, तो क्या यह इतना आसान होगा? इसका जवाब राजनीति से ज्यादा संविधान और कानून में छिपा है।

कांग्रेस से अलग होकर बनी थी तृणमूल कांग्रेस

ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा कांग्रेस से ही शुरू हुई थी। उन्होंने 1970 और 1980 के दशक में कांग्रेस की एक युवा और तेजतर्रार नेता के रूप में पहचान बनाई। लेकिन समय के साथ उनका कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद बढ़ने लगा। उनका मानना था कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों, विशेष रूप से सीपीएम, के खिलाफ कांग्रेस पर्याप्त आक्रामक राजनीति नहीं कर रही है।

इसी असंतोष के चलते दिसंबर 1997 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया और 1 जनवरी 1998 को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) की स्थापना की। चुनाव आयोग ने पार्टी को जोड़ा घास फूल चुनाव चिह्न आवंटित किया, जो बाद में उसकी राजनीतिक पहचान बन गया।लगभग 13 वर्षों के संघर्ष के बाद ममता बनर्जी ने 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल पुराने शासन को समाप्त कर सत्ता हासिल की। यही वजह है कि आज उसी कांग्रेस में TMC के संभावित विलय की चर्चा राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

संविधान का 10वां शेड्यूल क्यों है सबसे बड़ी बाधा?

किसी भी राजनीतिक दल के विलय की प्रक्रिया में सबसे अहम भूमिका संविधान की 10वीं अनुसूची निभाती है, जिसे दल-बदल विरोधी कानून के नाम से जाना जाता है। यह कानून 1985 में राजीव गांधी सरकार के दौरान लागू किया गया था ताकि जनप्रतिनिधियों के बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके।

कानून के अनुसार यदि कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। हालांकि पार्टी विलय के मामलों में एक विशेष छूट भी दी गई है।

क्या है दो-तिहाई समर्थन का नियम?

10वीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत किसी राजनीतिक दल का विलय तभी वैध माना जाता है, जब उसके कम से कम दो-तिहाई विधायक और सांसद विलय के पक्ष में हों। यानी यदि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय करना हो, तो केवल ममता बनर्जी की सहमति पर्याप्त नहीं होगी। पश्चिम बंगाल विधानसभा और संसद में मौजूद TMC के कुल विधायकों और सांसदों में से कम से कम 66 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का समर्थन आवश्यक होगा। यदि यह समर्थन नहीं मिलता, तो विलय का समर्थन करने वाले जनप्रतिनिधियों पर दल-बदल कानून लागू हो सकता है।

बागी गुट बना सकता है नया संकट

विलय की राह में दूसरी बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष और बागी गुटों की सक्रियता है। यदि कोई गुट खुद को "असली तृणमूल कांग्रेस" घोषित करता है, तो मामला सीधे चुनाव आयोग तक पहुंच सकता है।चुनाव आयोग के सिंबल ऑर्डर, 1968 के पैरा 15 के तहत ऐसे मामलों में आयोग यह तय करता है कि असली पार्टी कौन-सी है। इसके लिए आयोग तीन प्रमुख आधारों पर फैसला करता है—

किस गुट के पास ज्यादा विधायक और सांसद हैं।

संगठनात्मक स्तर पर किस गुट को अधिक समर्थन प्राप्त है।

क्या पार्टी संविधान और प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।

महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के विभाजन के दौरान चुनाव आयोग इसी आधार पर फैसले दे चुका है। ऐसे में यदि तृणमूल कांग्रेस में विवाद बढ़ता है, तो पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी विवाद में आ सकता है।

संगठनात्मक स्तर पर भी आसान नहीं होगी राह

कानूनी और संवैधानिक चुनौतियों के अलावा संगठनात्मक स्तर पर भी विलय आसान नहीं माना जा रहा है।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक कांग्रेस और वाम दलों के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ी है। ऐसे में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के साथ काम करने के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी संभावित विलय से पार्टी कैडर के बीच असंतोष और टूट की स्थिति पैदा हो सकती है।

ऋतब्रत बनर्जी ने खारिज की विलय की अटकलें

इसी बीच तृणमूल कांग्रेस के बागी नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी बनर्जी ने कांग्रेस में विलय की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है।उन्होंने दावा किया कि उनके नेतृत्व वाले गुट के साथ विधायकों की संख्या लगातार बढ़ रही है और उन्हें अधिकांश विधायकों तथा कई सांसदों का समर्थन प्राप्त है। रीताब्रता का कहना है कि उनका गुट ही असली तृणमूल कांग्रेस है और कांग्रेस में विलय का कोई सवाल ही नहीं उठता।उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब ममता बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व के बीच लगातार राजनीतिक संपर्क की खबरें सामने आ रही हैं।

सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद बढ़ीं चर्चाएं

हाल के दिनों में ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से मुलाकात और अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस नेताओं के साथ बातचीत ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दिया है।इन मुलाकातों के बाद यह अटकलें तेज हो गई हैं कि भविष्य में विपक्षी राजनीति के नए समीकरण बन सकते हैं। हालांकि फिलहाल कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की ओर से किसी औपचारिक विलय को लेकर कोई घोषणा नहीं की गई है।

एनडीए को समर्थन देने का दावा

ऋतब्रत बनर्जी ने यह भी दावा किया है कि उनके साथ जुड़े सांसद लोकसभा में एनडीए का समर्थन जारी रखेंगे। बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ बागी सांसदों ने अलग संसदीय समूह बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं।यदि ऐसा होता है, तो यह संकट केवल पश्चिम बंगाल विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संसद की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

आगे क्या?

तृणमूल कांग्रेस फिलहाल अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकटों में से एक का सामना करती दिखाई दे रही है। एक तरफ कांग्रेस के साथ संभावित राजनीतिक समीकरणों की चर्चा है, तो दूसरी ओर पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।

ऐसे में यदि भविष्य में TMC और कांग्रेस के बीच किसी प्रकार का विलय प्रस्ताव सामने आता है, तो उसे केवल राजनीतिक सहमति ही नहीं, बल्कि संवैधानिक नियमों, चुनाव आयोग की प्रक्रिया और संगठनात्मक समर्थन की कठिन परीक्षा से भी गुजरना होगा। फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में सस्पेंस और सियासी हलचल दोनों अपने चरम पर हैं।

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