
भारत के लिए सबक सीधा है। सोशल मीडिया पर रील्स का हिट होना और घरेलू जनता के बीच वाहवाही लूटना कूटनीति का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब ये वायरल पल देश के लिए ठोस कूटनीतिक परिणाम लेकर आएं।
हाल के दिनों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी इतालवी समकक्ष जॉर्जिया मेलोनी की रोम में मुलाकात हुई, तो पूरी दुनिया की नजरें उनके कूटनीतिक फैसलों से ज्यादा उनके बीच के दोस्ताना पलों पर टिक गईं। इंटरनेट पर 'मेलोडी' (Melody) नाम से ट्रेंड करते इन दोनों नेताओं के वीडियो, टॉफ़ी के लेन-देन के मजेदार वाकये और रील्स ने न सिर्फ भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक वर्चुअल सनसनी पैदा कर दी। लेकिन इस चमकीले और खुशनुमा माहौल के पीछे एक कड़वी कूटनीतिक हकीकत छिपी रह गई।
वह हकीकत यह है कि इस यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सीट पाने का भारत का सबसे बड़ा और पुराना सपना पूरी तरह से ठंडे बस्ते में जाता हुआ दिखाई दिया। जब दोनों देशों की द्विपक्षीय वार्ता समाप्त हुई और रोम से आधिकारिक संयुक्त बयान (Joint Statement) जारी किया गया, तो उसमें भारत की UNSC दावेदारी को लेकर पूरी तरह से खामोशी छाई रही। यह उन आम कूटनीतिक दौरों से बिल्कुल अलग था, जहाँ विदेशी दौरों पर जाने वाले भारतीय प्रधानमंत्री या दिल्ली आने वाले राष्ट्राध्यक्ष हमेशा भारत की स्थायी सदस्यता का खुलकर समर्थन करते रहे हैं।
इटली का पुराना स्टैंड और 'कॉफ़ी क्लब' का चक्रव्यूह
भारत पिछले कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 'हाई टेबल' यानी पाँच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन) के बीच अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस राह में भारत का सबसे मुखर और सीधा विरोध हमारा पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान करते आए हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस विरोध की असली कूटनीतिक धुरी कोई एशियाई देश नहीं, बल्कि खुद इटली है।
इटली की कूटनीतिक घेराबंदी को समझने के लिए हमें 'कॉफ़ी क्लब' (Coffee Club) के इतिहास को समझना होगा। साल 1995 में संयुक्त राष्ट्र में इटली के तत्कालीन राजदूत फ्रांसेस्को पाओलो फुल्की की देखरेख और योजना के तहत एक अनौपचारिक समूह का गठन किया गया था। इस समूह में इटली के साथ पाकिस्तान, मैक्सिको और मिस्र जैसे देश शामिल हुए। चूंकि इसकी शुरुआती अनौपचारिक बैठकें अक्सर कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ होती थीं, इसलिए वैश्विक कूटनीति में इसका नाम 'कॉफ़ी क्लब' पड़ गया।
आगे चलकर साल 2005 में इस समूह का विस्तार हुआ और इसे आधिकारिक तौर पर 'यूनाइटेड फॉर कंसेंसस' (Uniting for Consensus - UfC) का नाम दिया गया। इस क्लब में आज अर्जेंटीना, दक्षिण कोरिया, कनाडा, मैक्सिको, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं। इस पूरे समूह का एकमात्र मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील (जिन्हें G-4 देश कहा जाता है) को कभी भी UNSC में स्थायी सदस्यता न मिल सके।
इटली की दलील: स्थायी नहीं, रोटेशनल सीटें बढ़ें
इटली और उसका कॉफ़ी क्लब यह तर्क देता है कि सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्य जोड़ने से वैश्विक असमानता और बढ़ेगी और कुछ देशों के पास वीटो पावर (Veto Power) का एकाधिकार हो जाएगा। इसके बजाय इटली का प्रस्ताव है कि UNSC में केवल गैर-स्थायी (Non-Permanent) सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, और ये सीटें चुनाव के जरिए रोटेशन के आधार पर अलग-अलग देशों को मिलनी चाहिए। इटली का कहना है कि इससे दुनिया के छोटे और विकासशील देशों को भी सुरक्षा परिषद में काम करने का मौका मिलेगा।
यही कारण है कि जब पीएम मोदी और जॉर्जिया मेलोनी के बीच दुनिया भर में चल रहे युद्धों, मिडिल ईस्ट के संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकाबंदी जैसे गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत हुई, तब भी संयुक्त राष्ट्र के इस सबसे महत्वपूर्ण अंग के पुनर्गठन पर दोनों नेताओं ने मौन साधे रखा।
क्या भारत ने एक बड़ा मौका गंवा दिया?
यह खामोशी इसलिए भी ज्यादा खटकती है क्योंकि भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों (UN Peacekeeping Forces) में अपने सैनिकों का सबसे बड़ा योगदान देने वाले देशों में से एक है। दुनिया के तमाम अशांत क्षेत्रों में भारतीय सैनिक अपनी जान जोखिम में डालकर शांति स्थापित करते हैं। ऐसे में सुरक्षा परिषद में भारत की मजबूत उपस्थिति का दावा पूरी तरह तर्कसंगत है। भारत अब तक आठ बार UNSC का गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है, और उसका पिछला दो साल का कार्यकाल 2022 में समाप्त हुआ था।
विपक्ष, खासकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस 'मेलोडी टॉफ़ी' मोमेंट को लेकर पीएम मोदी पर तीखा हमला बोला है। आलोचकों का तर्क है कि क्या भारत की विदेश नीति अब सिर्फ सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले पलों, सेल्फ़ी और कोलोज़ियम के दौरों तक सिमट कर रह गई है? जब भारत के पास इटली जैसे एक मजबूत यूरोपीय देश के सामने अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक मांग को पुरजोर तरीके से रखने का मौका था, तब उस मौके का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? क्या मेलोनी के साथ व्यक्तिगत दोस्ती का फायदा भारत के राष्ट्रीय हितों को नहीं मिल सका?
डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल और बदलती वैश्विक कूटनीति
यह मुद्दा मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के शुरू होने के बाद से संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के कारण वैश्विक सुरक्षा संधियों का ताना-बाना बदल रहा है। ऐसे दौर में, जब दुनिया कई मोर्चों पर युद्ध और अस्थिरता का सामना कर रही है, सुरक्षा परिषद को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाना बेहद जरूरी था।
यदि भारत इस समय अपनी स्थायी सदस्यता के दावे को ठंडे बस्ते में डाल देता है, या द्विपक्षीय वार्ताओं में इस पर बात करने से हिचकिचाता है, तो यह उसकी दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति को कमजोर कर सकता है। रोम के संयुक्त बयान में इस मुद्दे का गायब होना यह साफ संकेत देता है कि इटली अपने पुराने स्टैंड से टस से मस होने को तैयार नहीं है, और भारत भी मेलोनी को इस मुद्दे पर मनाने में फिलहाल नाकाम रहा है।
सिर्फ दिखावा या ठोस परिणाम?
रोम दौरे से यह बात साफ हो गई है कि व्यक्तिगत केमिस्ट्री और दो देशों के कूटनीतिक हित दो अलग-अलग चीजें हैं। जॉर्जिया मेलोनी के साथ पीएम मोदी के संबंध चाहे जितने भी मधुर और दोस्ताना क्यों न दिखें, लेकिन जब बात इटली के राष्ट्रीय और भू-राजनीतिक स्टैंड की आती है, तो वह अपने 'कॉफ़ी क्लब' के सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं करतीं।
भारत के लिए सबक सीधा है। सोशल मीडिया पर रील्स का हिट होना और घरेलू जनता के बीच वाहवाही लूटना कूटनीति का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब ये वायरल पल देश के लिए ठोस कूटनीतिक परिणाम लेकर आएं। जब तक इटली जैसी ताकतें भारत के UNSC के रास्ते में रोड़ा बनी रहेंगी, तब तक 'मेलोडी' की मिठास के पीछे का कूटनीतिक सन्नाटा देश के नीति निर्माताओं को चुभता रहेगा।


