CBSE की डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था विवादों में, टेंडर प्रक्रिया जांच के दायरे में
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CBSE की डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था विवादों में, टेंडर प्रक्रिया जांच के दायरे में

CBSE की OSM प्रणाली को लेकर विवाद जारी है। छात्र सार्थक सिद्धांत ने टेंडर शर्तों में बदलाव पर सवाल उठाए, जबकि विशेषज्ञों ने मूल्यांकन प्रक्रिया पर चिंता जताई।


सीबीएसई की विवादास्पद ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर सवाल तब और तेज हो गए, जब 18 वर्षीय सीबीएसई कक्षा 12 के व्हिसलब्लोअर Sarthak Sidhant ने आरोप लगाया कि परियोजना के लिए चुने गए विक्रेता (वेंडर) को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर की शर्तों में बदलाव किए गए। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन उन्होंने बार-बार बोर्ड से यह पूछा कि टेंडर में कई बार संशोधन क्यों किए गए और महत्वपूर्ण प्रावधानों को क्यों बदला गया।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं की मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर व्यापक शिकायतें सामने आ रही हैं। छात्रों और अभिभावकों ने स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं, अंकन में विसंगतियों तथा तकनीकी खामियों को लेकर चिंता व्यक्त की है।

टेंडर प्रक्रिया पर सवाल

AI With Sanket कार्यक्रम में The Federal ने सिद्धांत और शिक्षाविद् अनीता रामपाल ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली, टेंडर प्रक्रिया और आगे की संभावित कार्रवाई पर बातचीत की। सिद्धांत ने बताया कि उनकी जांच की शुरुआत तब हुई जब वे पत्रकार संजय मौर्या और छात्र कार्यकर्ता निसर्ग अधिकारी के साथ इस विषय पर चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान उनकी रुचि वेंडर चयन प्रक्रिया में बढ़ी।

उनके अनुसार, उन्होंने सीबीएसई के सैकड़ों टेंडर दस्तावेजों का अध्ययन किया और पाया कि एक ही परियोजना से जुड़े कई टेंडर जारी किए गए थे। उनका कहना था कि अंतिम वेंडर का चयन करने से पहले बोर्ड ने कई प्रयास किए प्रतीत होते हैं।


सिद्धांत ने बताया कि उन्हें मई और अगस्त 2025 में जारी टेंडरों के दस्तावेज उपलब्ध हुए, जिनमें पात्रता शर्तों में बदलाव दिखाई दिए। उनके अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक खराब प्रदर्शन के रिकॉर्ड (Poor Performance Record) से संबंधित प्रावधान को हटाना था।

उन्होंने कहा कि पहले के एक टेंडर में यह उल्लेख था कि खराब प्रदर्शन का रिकॉर्ड रखने वाले सेवा प्रदाता को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन बाद के संस्करण में यह प्रावधान हटा दिया गया था।

जवाब की मांग

जब उनसे पूछा गया कि इतनी कम उम्र में क्या उन्हें अपने निष्कर्षों पर पूरा भरोसा है, तो सिद्धांत ने सावधानीपूर्ण रुख अपनाया।उन्होंने कहा, “मैं किसी भी बात को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं होता।” उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके निष्कर्ष दस्तावेजों को पढ़ते समय दिखाई दिए अंतर पर आधारित हैं।

वेंडर के पूर्व रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ प्रावधानों को हटाए जाने से स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं। हालांकि उन्होंने बार-बार दोहराया कि उनका उद्देश्य आरोप लगाना नहीं, बल्कि स्पष्टीकरण प्राप्त करना है।उन्होंने कहा, “मेरे सवाल सीबीएसई से हैं। मैं चाहता हूं कि बोर्ड इनका जवाब दे और उचित स्पष्टीकरण प्रदान करे।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या टेंडर में किए गए बदलाव किसी प्रकार की गड़बड़ी का संकेत हैं, तो उन्होंने कोई कानूनी निष्कर्ष निकालने से इनकार किया। उन्होंने इन घटनाक्रमों को “अजीब” और “चिंताजनक” बताया, विशेषकर पारदर्शिता के संदर्भ में।उनके अनुसार, इन सभी तथ्यों को एक साथ देखने पर प्रक्रिया की निष्पक्षता और उसमें पर्याप्त सुरक्षा उपायों के पालन को लेकर प्रश्न उठते हैं।

छात्रों से उम्मीद

प्रोफेसर अनीता रामपाल ने कहा कि यह घटना युवाओं में नागरिक जिम्मेदारी और सामूहिक भागीदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है।उन्होंने कहा कि सिद्धांत, निसर्ग अधिकारी, वेदांत श्रीवास्तव और अन्य छात्रों की पहल यह भरोसा दिलाती है कि युवा आज भी सार्वजनिक मुद्दों में रुचि लेकर सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हैं।रामपाल के अनुसार, शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आशा को जीवित रखना और छात्रों को केवल अपने हितों से आगे सोचने के लिए प्रेरित करना है।

उन्होंने उन छात्रों का उदाहरण दिया जिन्होंने पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया तक पहुंच में आने वाली कठिनाइयों को उजागर किया। उनका कहना था कि कई प्रभावित छात्रों के पास न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही इतनी जानकारी कि वे मूल्यांकन संबंधी त्रुटियों को चुनौती दे सकें।उनके अनुसार, सबसे प्रेरणादायक बात यह थी कि कई छात्र केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन अन्य छात्रों के लिए भी आवाज उठा रहे थे जो इस प्रक्रिया से प्रभावित हुए हो सकते हैं।

सीबीएसई की प्रतिक्रिया पर आलोचना

रामपाल ने छात्रों द्वारा उठाई गई चिंताओं पर सीबीएसई की प्रतिक्रिया की आलोचना की।उन्होंने कहा कि वैध मुद्दों को स्वीकार करने के बजाय अधिकारियों ने शुरुआत में समस्याओं से इनकार किया और सवाल उठाने वालों को ही चुनौती दी।नैतिक हैकर निसर्ग अधिकारी द्वारा उजागर की गई सुरक्षा कमजोरियों का उल्लेख करते हुए रामपाल ने कहा कि बोर्ड को समस्याओं की पहचान करने वाले छात्रों की सराहना करनी चाहिए थी, न कि उन्हें विरोधी की तरह देखना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि किसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था को ऐसी परिस्थितियों में पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ प्रतिक्रिया देनी चाहिए।रामपाल ने यह भी सुझाव दिया कि बोर्ड को केवल उन छात्रों तक राहत सीमित नहीं रखनी चाहिए जिन्होंने औपचारिक रूप से पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया है, बल्कि व्यापक सुधारात्मक कदमों पर भी विचार करना चाहिए।

पुनर्मूल्यांकन प्रणाली पर बहस

चर्चा का एक प्रमुख विषय यह था कि क्या वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली को जारी रखा जाना चाहिए।रामपाल ने उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन की गई प्रतियों के आधार पर मूल्यांकन किए जाने का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि स्क्रीन आधारित मूल्यांकन गहन शैक्षणिक निर्णय क्षमता को कमजोर करता है।उन्होंने कहा कि शिक्षकों को अक्सर ऐसी निगरानी प्रणालियों के तहत स्क्रीन पर उत्तर जांचने पड़ते हैं, जहां सावधानीपूर्वक मूल्यांकन की तुलना में गति को अधिक महत्व दिया जाता है।उनके अनुसार, कई देशों की शिक्षा प्रणालियां अब भी मानव आधारित मूल्यांकन पर निर्भर हैं और पूरी तरह डिजिटाइज्ड मूल्यांकन मॉडल नहीं अपनातीं।

रामपाल का मानना है कि सार्थक मूल्यांकन के लिए शिक्षक को उत्तरों की व्याख्या करनी होती है, छात्र की समझ का आकलन करना होता है और अपने पेशेवर निर्णय का उपयोग करना पड़ता है। उनके अनुसार, इन कार्यों को स्क्रीन आधारित प्रक्रियाओं के माध्यम से पूरी तरह दोहराना कठिन है।उन्होंने यह भी चिंता जताई कि परीक्षा प्रणालियां धीरे-धीरे ऐसे प्रश्नों को बढ़ावा दे रही हैं जिनका मूल्यांकन यांत्रिक तरीके से किया जा सके, बजाय इसके कि वे छात्रों की गहन समझ की परीक्षा लें।

तकनीक बनाम क्रियान्वयन

सिद्धांत ने स्वीकार किया कि शिक्षा प्रणाली के आधुनिकीकरण में तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।हालांकि उनका कहना था कि तकनीकी सुधारों को पर्याप्त परीक्षण और समीक्षा के बाद ही लागू किया जाना चाहिए।उनके अनुसार, OSM प्लेटफॉर्म को अपेक्षाकृत कम समय में विकसित कर लागू कर दिया गया, जिससे व्यापक परीक्षण और सुरक्षा ऑडिट के लिए सीमित अवसर मिला।

उन्होंने कहा कि समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसे लागू करने का तरीका है।उन्होंने कहा, “तकनीक भविष्य का मार्ग है। हमें तकनीक के साथ आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन इसे जल्दबाजी में नहीं किया जाना चाहिए।”दूसरी ओर, रामपाल इस धारणा से सहमत नहीं थीं कि मूल्यांकन प्रक्रिया को डिजिटाइजेशन से अनिवार्य रूप से लाभ मिलता है।

उन्होंने छात्रों को उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल प्रतियां उपलब्ध कराने जैसे कार्यों में तकनीक के उपयोग का समर्थन किया, लेकिन मूल्यांकन प्रक्रिया को मानव-केंद्रित बनाए रखने पर जोर दिया।

ट्रोलिंग को नजरअंदाज करना

चर्चा के अंत में सिद्धांत से पूछा गया कि क्या उन्हें भी उन अन्य छात्रों की तरह ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है जिन्होंने इस प्रणाली की कमियों को उजागर किया था।उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा, लेकिन वे इसमें उलझना पसंद नहीं करते।उनका कहना था, “मेरा मानना है कि उन्हें नजरअंदाज करना ही सबसे अच्छा विकल्प है।”

अंततः इस चर्चा ने दो समानांतर चिंताओं को सामने रखा—पहली, OSM टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल, और दूसरी, परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली के भविष्य को लेकर व्यापक बहस।जहां सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य टेंडर और खरीद प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों पर सीबीएसई से जवाब प्राप्त करना है, वहीं रामपाल का मानना है कि यह बहस इस मूल प्रश्न पर भी गंभीर चिंतन का अवसर है कि छात्रों की सीख और समझ का मूल्यांकन आखिर किस प्रकार किया जाना चाहिए।

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