
सब ड्यूटी निभाएंगे, बस पढ़ा नहीं पाएंगे शिक्षक! छलका दर्द
चुनाव कार्य, बोर्ड परीक्षा और कल्याणकारी अभियानों के कारण पहले से ही दबाव झेल रहे कर्मचारियों के बीच, नई जनगणना ड्यूटी शिक्षकों को कक्षाओं से बाहर खींच रही है..
आगामी जनगणना ने दिल्ली के सरकारी स्कूल शिक्षकों के बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यभार में एक और परत जोड़ दी है। इसने उस पैटर्न को और गहरा कर दिया है, जहां प्रशासनिक मांगों के कारण नियमित रूप से कक्षाओं में व्यवधान उत्पन्न होता है। चुनावी ड्यूटी, परीक्षा ड्यूटी और कल्याणकारी अभियानों के कारण पहले से ही दबाव झेल रही यह व्यवस्था अब नए तनाव का सामना करने वाली है। क्योंकि शिक्षकों को एक बार फिर स्कूलों से बाहर निकालकर राज्य के जमीनी कार्यबल के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
पिछले दो महीनों में, कई शिक्षक कक्षा 10 और 12 की सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं की ड्यूटी पर रहे हैं, जबकि कक्षा 10 की परीक्षाओं का दूसरा दौर मई के मध्य में शुरू होने वाला है। इसके साथ ही, कई शिक्षक दिल्ली में विशेष गहन संशोधन (SIR) अभ्यास से पहले चुनावी मैपिंग के लिए बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) के रूप में कार्य कर रहे हैं। अब जनगणना की गतिविधियों के शुरू होने के साथ, पहले से ही संसाधनों की कमी झेल रहे सरकारी स्कूलों में यह संचयी दबाव दिखाई देने लगा है।
'पढ़ाने के अलावा सब कुछ कर रहे हैं'
"मुझे ऐसा लगता है कि राज्य को लगता है कि सरकारी स्कूल के शिक्षक दुनिया के सबसे बेरोजगार लोग हैं और उनके पास प्रशासनिक काम के लिए इधर-उधर भागने का सारा समय है। हममें से लगभग 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी सरकारी काम में शामिल हैं। हम वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसके लिए हमें काम पर रखा गया था यानी 'पढ़ाना' उसे छोड़कर," नरेला में बीएलओ (BLO) के रूप में कार्यरत एक सरकारी स्कूल शिक्षक ने कहा।
व्यवधान न केवल बार-बार होते हैं बल्कि अक्सर अचानक भी होते हैं।
"इनमें से अधिकांश असाइनमेंट बहुत कम समय के नोटिस पर आते हैं। इसलिए योजना बनाने या वैकल्पिक व्यवस्था करने का शायद ही कोई समय मिल पाता है। जब हममें से किसी एक को बाहर बुलाया जाता है तो कई कक्षाओं की निरंतरता टूट जाती है। और बाकी कर्मचारियों को खुद पर अतिरिक्त दबाव डालना पड़ता है या सेक्शन को आपस में मिलाना पड़ता है। समय के साथ यह उस लय को पूरी तरह से बाधित कर देता है, जो उचित शिक्षण के लिए आवश्यक है," किरारी के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने कहा।
'टूटने की कगार पर'
कुछ स्कूलों में, यह तनाव अब टूटने की कगार (ब्रेकिंग पॉइंट) पर पहुंच गया है।
मॉडल टाउन के एक सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य ने कहा "आज, एसएचओ (SHO), एसीपी (ACP) और 8-10 पुलिसकर्मी हमारे स्कूल आए और उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है, जैसे युद्ध की तैयारियां चल रही हैं। हम लगातार काम से पूरी तरह ऊब चुके हैं। इस समय हमारे पास 24 सेक्शन को संभालने के लिए केवल 7-8 शिक्षक हैं। यह मानवीय रूप से कैसे संभव है?"
उन्होंने आगे कहा कि जनगणना से जुड़े काम के ताजा दौर ने व्यवस्था को और अधिक खींच दिया है। "हमारे स्कूल में, 100 प्रतिशत शिक्षक जनगणना प्रशिक्षण में भाग ले रहे हैं, जो तीन दिनों तक सुबह से शाम तक आयोजित किया जा रहा है। लगभग 25 प्रतिशत शिक्षक बीएलओ (BLO) कार्य में लगे हुए हैं। वे लोग दोहरी ड्यूटी कर रहे हैं," उन्होंने बताया।
समानांतर जिम्मेदारियों का दायरा
कक्षाओं के बाहर भी, बोझ कई समानांतर जिम्मेदारियों तक फैला हुआ है।
उदाहरण के तौर पर, 13 फरवरी से शुरू हुए महीने भर चलने वाले 'दिल्ली खेल महाकुंभ' में शारीरिक शिक्षा शिक्षकों को बड़े पैमाने पर तैनात किया गया था।
"जब तक वह चला, हमारी ड्यूटी वहां लगी रही। स्कूलों में प्रशासनिक काम और नियमित सरकारी काम के अलावा, हमें इन सब में भी शामिल किया जा रहा है। यह अंतहीन है," एक पीटी शिक्षक ने कहा।
कार्रवाई का डर
अपेक्षा के अनुरूप काम न करने पर होने वाली कार्रवाई का डर भी शिक्षकों के मन में बना रहता है।
"हमें हर दिन शाम 5 बजे एक रिपोर्ट जमा करनी होती है, जिसमें विस्तार से बताना होता है कि हमने उस दिन कितना लक्ष्य हासिल किया है। मार्च के महीने के दौरान, मैं स्कूल में अपनी जिम्मेदारियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सका क्योंकि हम पर अपने लक्ष्यों को पूरा करने का भारी दबाव था। कुछ लोग जो इसे करने में सक्षम नहीं रहे, उन्हें कारण बताओ नोटिस (show-cause notices) भी मिले हैं," अशोक विहार के एक सरकारी स्कूल शिक्षक ने कहा, जो बीएलओ के रूप में भी कार्यरत हैं।
कुछ मामलों में, यह तनाव निजी जीवन तक भी पहुंच जाता है। जिन दिनों वह बीएलओ (BLO) कार्य के लिए बाहर नहीं जा पाती थीं, उनके पति ने उनकी जगह काम संभाला।
"हममें से कुछ लोगों ने अपने जीवनसाथी की ओर से भागदौड़ वाले काम किए हैं। क्योंकि हम उनकी कठिन परिस्थिति को समझते हैं। यह एक बड़ी चुनौती रही है। क्योंकि पुराने सभी बीएलओ को हटा दिया गया था और नए नियुक्त किए गए थे, जो लोगों को उतनी अच्छी तरह नहीं जानते और न ही लोग उन्हें जानते हैं," उन्होंने कहा।
दिल्ली हाईकोर्ट का 2019 का आदेश
यह तनाव कोई नया नहीं है। अदालतें और नीतिगत ढांचे लंबे समय से इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि क्या शिक्षकों का उपयोग गैर-शैक्षणिक राज्य कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2019 में यह निर्देश दिया था कि शिक्षकों को ऐसी ड्यूटियों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका प्राथमिक कार्य शिक्षा प्रदान करना है।
हालांकि, पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शिक्षकों को ऐसे कार्यों के लिए नियुक्त करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
ढांचागत सीमाएं
दिल्ली में, यह समस्या ढांचागत सीमाओं के कारण और अधिक जटिल हो गई है। सरकारी स्कूल पहले से ही कर्मचारियों की भारी कमी के बीच काम कर रहे हैं और रिक्त पदों को भरने के लिए अतिथि (guest) और संविदा (contractual) शिक्षकों पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
इसका प्रभाव केवल शिक्षण घंटों तक ही सीमित नहीं है। स्कूलों के भीतर प्रशासनिक कार्य जैसे, प्रवेश प्रक्रिया, मूल्यांकन और अभिभावकों के साथ बातचीत भी इससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
सरकारी स्कूल के शिक्षकों पर पूरा बोझ
यहाँ समानता का सवाल भी खड़ा होता है। निजी स्कूलों के छात्र इस तरह के व्यवधानों से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के छात्र, जो अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं, उन्हें पढ़ाई में बार-बार आने वाली बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इससे मौजूदा शैक्षिक अंतर और अधिक बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
"सरकार चाहती है कि शिक्षक हर काम करें क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अधिक विश्वसनीय हैं। सारा बोझ फिर सरकारी स्कूल के शिक्षकों पर ही आ गिरता है। हमें काम करने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन सारा काम हम ही क्यों करें? अधिक से अधिक निजी स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को इसका हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए?" एक शिक्षक ने कहा।

