धनकुबेरों की मंडी? जानिए कैसे विशेषज्ञों की जगह राज्यसभा अब बन चुकी है अमीरों का बाजार!
इस पूरे खेल को कानूनी रूप से आसान बनाने का काम साल 2003 के एक संशोधन ने किया। 2003 से पहले नियम था कि कोई भी व्यक्ति उसी राज्य से राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता था, जहां की वोटर लिस्ट में उसका नाम दर्ज हो।

आगामी 18 जून को देश के 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों को भरने के लिए विधानसभाओं के सदस्य मतदान करेंगे। इसके साथ ही महाराष्ट्र, तमिलनाडु और ओडिशा में खाली हुई तीन सीटों पर उपचुनाव भी होने जा रहे हैं। भारतीय संविधान के मुताबिक, राज्यसभा एक स्थायी सदन है जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में रिटायर होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें देश की आम जनता सीधे वोट नहीं डालती। जनता द्वारा चुने गए विधायक (MLAs) एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) प्रणाली के जरिए इन सांसदों का चुनाव करते हैं।
संविधान निर्माताओं ने राज्यसभा यानी 'कौंसिल ऑफ स्टेट्स' की परकल्पना इसलिए की थी ताकि यह राज्यों के अधिकारों की रक्षा कर सके और देश के बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, कलाकारों तथा विशेषज्ञों को बिना चुनावी आपाधापी के संसद में ला सके। लेकिन आज की कड़वी हकीकत यह है कि यह सदन अब राज्यों के प्रतिनिधित्व का मंच कम, और राजनीतिक दलों तथा बड़े उद्योगपतियों के सौदेबाजी का बाजार ज्यादा नजर आने लगा है।
1. ओपन बैलेट सिस्टम: मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की
राज्यसभा चुनावों में भ्रष्टाचार और क्रॉस-वोटिंग को रोकने के लिए साल 2003 में एक बड़ा कानूनी बदलाव किया गया था। इससे पहले राज्यसभा के लिए गुप्त मतदान (Secret Ballot) होता था। लेकिन 2003 के बाद 'ओपन बैलेट' यानी खुला मतदान सिस्टम लागू कर दिया गया। इस नियम के तहत हर विधायक को मतपेटी में अपना वोट डालने से पहले अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट को अपना मार्क्ड बैलेट पेपर दिखाना अनिवार्य है।
तत्कालीन सरकार ने तर्क दिया था कि इससे विधायक अपनी पार्टी से गद्दारी या क्रॉस-वोटिंग नहीं कर पाएंगे। लेकिन हकीकत में इस कानून ने उलटा असर दिखाया। गोपनीयता हटने से अब पार्टियां अपने विधायकों की वफादारी पर चौबीसों घंटे पहरा देने लगीं। इसका सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह हुआ कि विधायक अब राजनीतिक दबाव और भारी प्रलोभन (रिश्वत) दोनों के लिए सीधे तौर पर असुरक्षित हो गए।
इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण साल 2017 में गुजरात के राज्यसभा चुनाव में देखने को मिला था। तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की सीट खतरे में थी। कांग्रेस के छह विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। पार्टी को अपने बाकी विधायकों के टूटने का इतना डर था कि उसने अपने 44 विधायकों को हवाई जहाज से बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में भेज दिया था। वोटिंग के दिन कांग्रेस के दो विधायकों भोलभाई गोहिल और राघवजी पटेल ने अपना बैलेट पेपर कांग्रेस के एजेंट के बजाय विपक्षी दल के नेता (अमित शाह) की तरफ घुमाकर दिखा दिया। वीडियो फुटेज देखने के बाद चुनाव आयोग ने उन दोनों वोटों को खारिज कर दिया, और अहमद पटेल सिर्फ 44 वोटों के न्यूनतम आंकड़े के साथ बमुश्किल चुनाव जीत पाए। यह घटना साबित करती है कि ओपन बैलेट में अब हर एक नज़र और इशारे पर करोड़ों का दांव लगा होता है।
2. दल-बदल कानून की लाचारी और चुनाव आयोग का दोहरा रवैया
चौंकाने वाली बात यह है कि देश का कड़ा दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) राज्यसभा चुनाव में होने वाली क्रॉस-वोटिंग पर लागू नहीं होता। अगर कोई विधायक राज्यसभा चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ जाकर विपक्षी दल को वोट देता है, तो उसकी विधानसभा सदस्यता रद्द नहीं होती। उसकी सदस्यता केवल तब जाती है जब वह स्वेच्छा से पार्टी छोड़े या विधानसभा के भीतर सरकार गिराने-बचाने के व्हिप का उल्लंघन करे। राज्यसभा में क्रॉस-वोटिंग करने वाले विधायक को केवल अपनी पार्टी की नाराजगी का सामना करना पड़ता है, कानूनन उसकी कुर्सी सुरक्षित रहती है। इसी कानूनी खामी का फायदा उठाकर हॉर्स-ट्रेडिंग का बाजार फलता-फूलता है।
इतिहास गवाह है कि इस खेल में करोड़ों के वारे-न्यारे होते हैं। साल 2012 में झारखंड राज्यसभा चुनाव के दौरान एक उम्मीदवार के रिश्तेदार की गाड़ी से 2 करोड़ रुपये की बेहिसाब नकदी बरामद होने के बाद चुनाव आयोग ने पूरा चुनाव ही रद्द कर दिया था। 2016 में हरियाणा में स्याही और गलत पेन का एक ऐसा खेल हुआ कि कांग्रेस के 12 वोट रिजेक्ट हो गए और ज़ी ग्रुप के सुभाष चंद्रा निर्दलीय चुनाव जीत गए। 2022 में फिर हरियाणा में कार्तिकेय शर्मा ने कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई की क्रॉस-वोटिंग के दम पर अजय माकन को हरा दिया।
सबसे हालिया और हैरान करने वाला उदाहरण 2024 में हिमाचल प्रदेश में दिखा, जहां कांग्रेस के 6 बागियों ने पाला बदला और बीजेपी के हर्ष महाजन ने दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी को लॉटरी (पर्ची सिस्टम) के जरिए हरा दिया। इसी साल बिहार, ओडिशा और हरियाणा में भी यही खेल दोहराया गया। लेकिन इस सब के बीच चुनाव आयोग का रवैया बेहद असमान रहा है। जहां उसने 2012 (झारखंड) और 2017 (गुजरात) में कड़ा एक्शन लिया, वहीं 2024 में हिमाचल प्रदेश या बिहार-ओडिशा के मामलों में कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
3. धनकुबेरों की एंट्री और हितों का टकराव (Conflict of Interest)
जिन राज्यों में तीन या उससे ज्यादा मजबूत राजनीतिक दल होते हैं, वहां अतिरिक्त वोटों की खरीद-फरोख्त के लिए एक पूरा बाजार सज जाता है। इस बाजार के सबसे बड़े खरीदार देश के वो पूंजीपति और बिजनेसमैन होते हैं, जो बिना किसी आम चुनाव की मेहनत और जनता के बीच जाए सीधे देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठना चाहते हैं।
इन उद्योगपतियों के लिए राज्यसभा सिर्फ एक स्टेटस सिंबल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उनके बिजनेस को फायदा पहुंचाने का जरिया बन जाता है। संसद सदस्य बनने के बाद इन धनकुबेरों को उन संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) का सदस्य बना दिया जाता है, जो सीधे उनके व्यापार से जुड़े मंत्रालयों के लिए नीतियां और कानून बनाती हैं।
उदाहरण के तौर पर, किंगफिशर एयरलाइंस के संस्थापक विजय माल्या उड्डयन (Aviation) और वाणिज्य समितियों में बैठे थे, जिसे लेकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने "हितों के गंभीर टकराव" (Serious Conflict of Interest) का मुद्दा उठाया था। इसी तरह कर्नाटक के एक बड़े रियल एस्टेट कारोबारी कुपेंद्र रेड्डी को उस प्रवर समिति में जगह मिली जो देश के रियल एस्टेट रेगुलेशन बिल (RERA) की समीक्षा कर रही थी। यानी जो व्यक्ति खुद बिल्डर है, वही बिल्डरों को रेगुलेट करने वाला कानून बना रहा था। संसद में अमीर लोगों के आने पर आपत्ति नहीं है, आपत्ति इस बात पर है कि पैसे के दम पर कानून बनाने वाली संस्था में घुसकर ऐसे कानून बनवाना जो सीधे उनके निजी व्यापार को फायदा पहुंचाते हों।
4. 2003 का वह संशोधन जिसने 'मूल निवास' की शर्त ही खत्म कर दी
इस पूरे खेल को कानूनी रूप से आसान बनाने का काम साल 2003 के एक संशोधन ने किया। 2003 से पहले नियम था कि कोई भी व्यक्ति उसी राज्य से राज्यसभा का चुनाव लड़ सकता था, जहां की वोटर लिस्ट में उसका नाम दर्ज हो (यानी वह वहां का मूल निवासी हो)। लेकिन पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट 1951 में संशोधन करके इस शर्त को हटा दिया गया और नियम बना दिया गया कि उम्मीदवार बस "भारत का नागरिक और वोटर" होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 2006 के 'कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ' मामले में इस बदलाव को हरी झंडी दे दी। राजनीति शास्त्र के विद्वानों का मानना है कि इस एक संशोधन ने राज्यसभा के मूल चरित्र की आत्मा को ही मार दिया। जब निवास स्थान की बाध्यता खत्म हो गई, तो राज्यसभा की सीटें राज्यों से कट गईं। अब पार्टियां अपने किसी भी चहेते नेता या फाइनेंसर को, जिसका उस राज्य की संस्कृति या भूगोल से कोई लेना-देना नहीं है, किसी भी ऐसे राज्य से सांसद बना देती हैं जहां उनके पास पर्याप्त विधायक होते हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब या तेलंगाना से किसी ऐसे व्यक्ति को राज्यसभा भेज दिया जाता है जिसने कभी उस राज्य का दौरा तक न किया हो।
5. छह गुना बढ़ गई सांसदों की दौलत: ADR की रिपोर्ट
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि राज्यसभा में अमीर लोगों की एंट्री कितनी तेजी से बढ़ी है। साल 2013 में एक मौजूदा राज्यसभा सांसद की औसत घोषित संपत्ति करीब 20 करोड़ रुपये थी। मार्च 2026 तक यह औसत छह गुना बढ़कर ₹120.69 करोड़ प्रति सांसद हो चुका है। सदन में इस समय 31 से ज्यादा ऐसे सदस्य बैठे हैं जिनकी व्यक्तिगत संपत्ति 100 करोड़ रुपये से अधिक है।
अगर हम इसकी तुलना लोकसभा से करें, तो लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले सांसदों की संपत्ति में 10 साल में औसतन 110% की बढ़ोतरी हुई है, जो कि महंगाई दर के अनुपात में सामान्य है। लेकिन राज्यसभा के सांसदों की संपत्ति का यह अप्रत्याशित उछाल यह साबित करता है कि पुराने सांसद अमीर नहीं हो रहे हैं, बल्कि हर बार पहले से कहीं ज्यादा अमीर लोग इस सदन में एंट्री ले रहे हैं।
क्या है आगे की राह?
राज्यों की परिषद (Council of States) अब पूरी तरह से राजनीतिक दलों की जागीर और उन लोगों का अड्डा बन चुकी है जो पार्टी का तय किया हुआ 'प्राइस टैग' चुकाने की हैसियत रखते हैं। इसके उपाय बेहद सीधे और स्पष्ट हैं:
गुप्त मतदान (Secret Ballot) को बहाल किया जाए, ताकि विधायकों पर पार्टी आकाओं की डिजिटल पुलिसिंग बंद हो सके।
मूल निवास (Residence) की शर्त को दोबारा लागू किया जाए, ताकि कोई भी सीट किसी बाहरी उद्योगपति के हाथों बिकने के बजाय उसी राज्य के वास्तविक मुद्दों का प्रतिनिधित्व कर सके।
जब तक राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और नैतिकता नहीं लाएंगे, तब तक राज्यसभा की सीटों की कीमत इसी तरह बढ़ती रहेगी, और इसकी भारी कीमत देश के लोकतंत्र और राज्यों के अधिकारों को चुकानी पड़ेगी।

