
नीदरलैंड से 11वीं शताब्दी की धरोहर चोल ताम्रपत्र ला रहे हैं, पीएम मोदी
नीदरलैंड ने भारत की धरती और तमिलनाडु के वैभव से जुड़ा चोल राजवंश का ताम्रपत्र लौटाया है। पीएम दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के लिए नीदरलैंड की यात्रा पर हैं।
भारत और नीदरलैंड के बीच द्विपक्षीय संबंधों में एक नया ऐतिहासिक मोड़ तब देखने को मिला, जब नीदरलैंड ने भारत को 11वीं सदी के चोल राजवंश के ताम्रपत्र सौंपे। यह पल और उपलब्धि हर उस भारतीय के लिए अतिविशिष्ट और भावुक कर देनेवाली है, जिसे अपनी जड़ों, विरासत और इतिहास से प्रेम है। नीदरलैंड द्वारा भारत को लौटाए जा रहे ये कुछ ऐतिहासिक ताम्रपत्र (कॉपर प्लेट्स) वो धरोहर हैं, जिन्हें वापस लाने के लिए भारत साल 2012 से लगातार प्रयास कर रहा था।
इन ऐतिहासिक कलाकृतियों को शनिवार (16 मई 2026) को आयोजित एक विशेष गरिमामयी कार्यक्रम के दौरान भारत को वापस सौंपा गया। इस विशेष अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके डच समकक्ष (नीदरलैंड के प्रधानमंत्री) रॉब जेटन व्यक्तिगत रूप से मौजूद थे, जो दोनों देशों के बीच मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों की गहराई को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पांच देशों की राजकीय यात्रा के दूसरे चरण के तहत संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में एक संक्षिप्त ठहराव के बाद शुक्रवार को नीदरलैंड पहुंचे थे। नीदरलैंड की धरती पर इस ऐतिहासिक वापसी के गवाह बने पीएम मोदी ने इस खास अवसर को "हर भारतीय के लिए एक अत्यंत खुशी का क्षण" करार दिया। भारत पिछले 14 वर्षों से इन 'अनाइमंगलम ताम्रपत्रों' की वापसी के लिए लगातार प्रयास कर रहा था, जिन्हें नीदरलैंड में 'लीडेन प्लेट्स' (Leiden Plates) के नाम से भी जाना जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोशल मीडिया पोस्ट
ताम्रपत्रों की इस घर वापसी और सौंपने के आधिकारिक समारोह (Restitution Ceremony) में शामिल होने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर अपनी खुशी साझा की। पीएम मोदी ने अपने पोस्ट में लिखा, "हर भारतीय के लिए यह एक अत्यंत खुशी का क्षण है! 11वीं शताब्दी के चोल ताम्रपत्रों को नीदरलैंड से वापस भारत लाया जाएगा।"
उन्होंने इस ऐतिहासिक दस्तावेज की बनावट और महत्ता के बारे में आगे जानकारी देते हुए बताया कि इन ताम्रपत्रों में कुल 21 बड़े पत्र और 3 छोटे पत्र शामिल हैं, जिन पर मुख्य रूप से तमिल भाषा में ग्रंथ और संदेश उत्कीर्ण हैं। यह ऐतिहासिक दस्तावेज विशेष रूप से चोल शासक राजेंद्र चोल प्रथम से संबंधित है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने पिता राजा राज चोल प्रथम द्वारा दिए गए एक मौखिक वादे या प्रतिबद्धता को औपचारिक और स्थाई रूप दिया था।
पीएम मोदी ने चोल साम्राज्य के गौरव को याद करते हुए लिखा, "ये ताम्रपत्र चोल राजवंश की महानता को भी दुनिया के सामने प्रदर्शित करते हैं। हम भारतवासियों को चोल साम्राज्य, उनकी समृद्ध संस्कृति और उनकी अद्वितीय नौसैनिक क्षमता (समुद्री कौशल) पर बेहद गर्व है।" इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने नीदरलैंड की सरकार और लीडेन यूनिवर्सिटी (Leiden University) के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया, जहां ये ऐतिहासिक ताम्रपत्र 19वीं शताब्दी के मध्य से बेहद सुरक्षित रखे गए थे।
ताम्र पत्रों के छल्ले के ऊपरी भाग पर चोल राजवंश की राजमुहर।
इन ऐतिहासिक ताम्रपत्रों का क्या महत्व है?
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस ऐतिहासिक घटनाक्रम पर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया। उन्होंने कहा कि ये ताम्रपत्र चोल राजवंश की महान विरासत को रेखांकित करते हैं और इनकी वतन वापसी "विदेशों से भारतीय सांस्कृतिक कलाकृतियों और अमूल्य धरोहरों की घर वापसी की दिशा में उठाया गया एक और महत्वपूर्ण कदम है।"
वास्तव में, इन 21 ताम्रपत्रों को चोल राजवंश के सबसे प्रामाणिक और महत्वपूर्ण बचे हुए ऐतिहासिक अभिलेखों में गिना जाता है। यह भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर दुनिया में कहीं भी मौजूद तमिल विरासत की सबसे महत्वपूर्ण और अनमोल कलाकृतियों में से एक हैं। वजन के लिहाज से यह पूरा सेट लगभग 30 किलोग्राम का है और ये सभी पत्र कांसे (Bronze) की एक मजबूत अंगूठी (रिंग) के माध्यम से आपस में एक साथ बंधे हुए हैं। इस कांसे की अंगूठी पर चोल राजवंश की आधिकारिक शाही मुहर (Royal Seal) भी अंकित है।
ये ताम्रपत्र मुख्य रूप से दो स्पष्ट भागों में विभाजित हैं: इसके एक हिस्से में संस्कृत भाषा में ग्रंथ लिखे गए हैं। जबकि दूसरे हिस्से में तमिल भाषा में लेख उत्कीर्ण हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो हिंदू सम्राट राजा राज चोल प्रथम ने एक बौद्ध मठ के लिए राजस्व बंदोबस्त (राजस्व बंदोबस्ती या दान) प्रदान किया था। राजा राज चोल प्रथम ने शुरुआत में केवल मूल मौखिक आदेश दिया था, जिसे उस समय ताड़ के पत्तों पर दर्ज किया गया था। लेकिन बाद में उनके योग्य पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने इस दान राशि और आदेश को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इसे टिकाऊ तांबे की प्लेटों पर स्थाई रूप से उकेरवा दिया था। इन प्लेटों को आपस में जोड़ने वाली कांसे की अंगूठी पर राजेंद्र चोल प्रथम की ही शाही मुहर लगी हुई है।
चोल ताम्रपत्र (Chola Copper Plates): मुख्य तथ्य और जानकारियां
कलाकृतियां (Artefacts): इस ऐतिहासिक सेट में 21 बड़ी और 3 छोटी तांबे की प्लेटें शामिल हैं, जिनका कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है। ये सभी प्लेटें राजेंद्र चोल की शाही मुहर वाली कांसे की अंगूठी से आपस में बंधी हुई हैं।
शासनकाल (Reign): ये ऐतिहासिक दस्तावेज सीधे तौर पर चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल के रिकॉर्ड से जुड़े हैं, जो उनके पिता राजा राज चोल प्रथम द्वारा दिए गए एक मौखिक दान को कानूनी और औपचारिक रूप देते हैं।
भाषाएं (Languages): इन ताम्रपत्रों पर ऐतिहासिक दस्तावेज संस्कृत और तमिल दोनों ही भाषाओं में बहुत खूबसूरती से खुदे हुए हैं।
महत्व (Significance): इन्हें चोल राजवंश के सबसे महत्वपूर्ण जीवित ऐतिहासिक अभिलेखों के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो तमिल विरासत, संस्कृति और चोल साम्राज्य की महान समुद्री शक्ति को दर्शाते हैं।
ऐतिहासिक सफर (Journey): इन ताम्रपत्रों को 1700 के दशक में फ्लोरेंटियस कैंपर (Florentius Camper) नाम के एक व्यक्ति द्वारा नीदरलैंड ले जाया गया था। वह उस कालखंड में एक ईसाई मिशनरी के हिस्से के रूप में भारत में कार्यरत थे, जब ताम्रपत्रों में वर्णित ऐतिहासिक शहर नागापट्टिनम पूरी तरह से डच (नीदरलैंड) नियंत्रण के अधीन था।
कैसे पहुंचे थे ये ताम्रपत्र नीदरलैंड की धरती पर?
इन ऐतिहासिक ताम्रपत्रों के भारत से नीदरलैंड पहुंचने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इन्हें 1700 के दशक में फ्लोरेंटियस कैंपर नामक एक पादरी द्वारा नीदरलैंड ले जाया गया था। कैंपर उस समय भारत में एक ईसाई मिशनरी के सदस्य के रूप में काम कर रहे थे। यह वही दौर था, जब इन ताम्रपत्रों में विशेष रूप से दर्ज किया गया ऐतिहासिक भारतीय शहर नागापट्टिनम पूरी तरह से डच (नीदरलैंड) औपनिवेशिक नियंत्रण के अधीन था।
हाल ही में, 'रिटर्न एंड रेस्टिट्यूशन' (वापसी और बहाली) पर अंतर-सरकारी समिति के 24वें सत्र की बैठक के दौरान यह पाया गया कि इन ताम्रपत्रों के मूल राष्ट्र (उत्पत्ति के देश) के रूप में भारत का दावा पूरी तरह से वैध और कानूनी रूप से सही है। समिति ने इस फैसले के बाद नीदरलैंड सरकार को प्रोत्साहित किया कि वह इन मूल्यवान प्लेटों की सुरक्षित वापसी के संबंध में भारत के साथ रचनात्मक और सकारात्मक द्विपक्षीय बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए। इसके बाद, नीदरलैंड सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री की इस आधिकारिक यात्रा के दौरान इन ऐतिहासिक प्लेटों को सम्मानपूर्वक भारत को सौंपने का बड़ा निर्णय लिया।
भारत और नीदरलैंड के बदलते संबंध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न महत्वपूर्ण और रणनीतिक क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को एक नई ऊंचाई और गति देने के उद्देश्य से यूरोप के चार देशों की अपनी आधिकारिक यात्रा के हिस्से के रूप में शुक्रवार को द हेग (The Hague) के दो दिवसीय दौरे की शुरुआत की। बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य (Global Geopolitics) के बीच पीएम मोदी और डच पीएम रॉब जेटन के बीच हुई बेहद व्यापक और गहन वार्ता के बाद, दोनों देशों ने आपसी सहमति से अपने द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य स्तर से ऊपर उठाते हुए सीधे 'रणनीतिक साझेदारी' (Strategic Partnership) के स्तर पर ले जाने का एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला किया है।
इसके साथ ही, दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने आपसी सहयोग को और अधिक मजबूत व विस्तारित करने के लिए कई महत्वपूर्ण समझौतों और ज्ञापनों पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर भी किए हैं। वर्तमान में नीदरलैंड पूरे यूरोप महाद्वीप में भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों और गंतव्यों में से एक है। दोनों देशों के बीच आपसी द्विपक्षीय व्यापार वित्तीय वर्ष 2024-25 में 27.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को छू चुका है। इसके अलावा, यह यूरोपीय देश भारत में निवेश करने वाला चौथा सबसे बड़ा निवेशक देश भी है, जिसका भारत में संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) कुल 55.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है।
पीएम मोदी ने डच कंपनियों को दिया भारत आने का न्योता
दोनों देशों के बीच आधिकारिक द्विपक्षीय वार्ता शुरू होने से ठीक पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीदरलैंड के पीएम रॉब जेटन के साथ मिलकर डच कंपनियों के प्रमुख मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEOs) के साथ एक विशेष बैठक की। इस हाई-लेवल बैठक में ऊर्जा, बंदरगाह (पोर्ट्स), स्वास्थ्य सेवा (हेल्थकेयर), कृषि व्यापार और अत्याधुनिक तकनीक जैसे विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों की अग्रणी डच कंपनियों के बिजनेस लीडर्स शामिल हुए।
प्रधानमंत्री मोदी ने डच कंपनियों को भारत में निवेश की अपार संभावनाओं को तलाशने और व्यापार बढ़ाने के लिए खुले दिल से आमंत्रित किया। उन्होंने विशेष रूप से समुद्री क्षेत्र (मैरीटाइम), नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी), डिजिटल टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक हेल्थकेयर जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश करने पर जोर दिया।
व्यापारिक नेताओं को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने भारत के रिफॉर्म्स की जानकारी दी। उन्होंने कहा, "हम भारत में व्यापारिक नियमों और कंप्लायंस के बोझ को लगातार कम कर रहे हैं और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (व्यापार करने की सुगमता) को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं। हमने हाल ही में कराधान (टैक्सेशन), श्रम संहिता (लेबर कोड) और सुशासन (गवर्नेंस) के क्षेत्रों में अगली पीढ़ी के बड़े सुधारों (Next-Generation Reforms) को लागू किया है।"
पीएम मोदी ने भारत की आर्थिक ताकत का जिक्र करते हुए कहा कि आज भारत में विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की लागत बेहद प्रतिस्पर्धी और अत्यधिक लागत प्रभावी (Cost-Effective) हो रही है। इसके साथ ही, हमारा सेवा क्षेत्र (सर्विसेज सेक्टर) आज पूरी दुनिया में दक्षता और नवाचार (इन्नोवेशन) का एक बड़ा इंजन बनकर उभरा है। उन्होंने डच बिजनेस लीडर्स को आमंत्रित करते हुए कहा, "हम आप सभी को भारत में डिजाइन करने और नए नवाचार (इन्नोवेट) करने के लिए आमंत्रित करते हैं। इस निवेश और शुरुआत के लिए आज के समय से बेहतर और कोई समय नहीं हो सकता है।"
(एजेंसी इनपुट्स के साथ)

