दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद: क्या अब सांसदों के आलीशान बंगले भी होंगे खाली?
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दिल्ली जिमखाना क्लब विवाद: 'क्या अब सांसदों के आलीशान बंगले भी होंगे खाली?'

दिल्ली जिमखाना क्लब का विवाद सिर्फ एक इमारत या कुछ एकड़ जमीन की लड़ाई नहीं है। यह भारत की राजनीति में चल रहे 'अमीर बनाम गरीब' और 'विशेषाधिकार बनाम आम नागरिक' के नैरेटिव की एक बानगी है।


देश की सत्ता के सबसे पॉश इलाके यानी लुटियंस दिल्ली (Lutyens' Delhi) के दिल में स्थित 113 साल पुराना 'दिल्ली जिमखाना क्लब' इस समय एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक घमासान का केंद्र बन चुका है। केंद्र सरकार ने इस ऐतिहासिक क्लब को अपनी बेशकीमती जमीन खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया है। सरकार का कहना है कि सुरक्षा कारणों और सार्वजनिक हित के लिए इस जमीन का वापस लिया जाना बेहद जरूरी है।

इस मुद्दे ने देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक धड़ा ऐसा है जो मानता है कि यह क्लब अंग्रेजों के जमाने की गुलामी, अंग्रेजी बोलने वाले अभिजात वर्ग (Elite Class) और आम जनता से कटे हुए वीआईपी कल्चर का प्रतीक है, जिसे ढहा दिया जाना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ, बुद्धिजीवियों और क्लब के सदस्यों का मानना है कि यह एक हेरिटेज संस्था है, जिसमें सुधार की जरूरत तो है, लेकिन इसे पूरी तरह से खत्म कर देना सरकार की 'सिलेक्टिव' (चुनिंदा) राजनीति को दर्शाता है।

'द फेडरल' (The Federal) के विशेष कार्यक्रम में प्रसिद्ध लेखक, पूर्व राजनयिक और जिमखाना क्लब के पुराने सदस्य पवन वर्मा ने इस पूरे विवाद, क्लब के अंदर की कमियों और सरकार की मंशा पर बेहद बेबाकी से अपनी राय रखी है।

क्या सरकार को क्लब खाली कराने का हक है?

पवन वर्मा कहते हैं कि इस बात में कोई दो राय नहीं है कि लीज पर दी गई सभी जमीनों का असली मालिक देश का कानून और सरकार ही होती है। सरकार के पास यह कानूनी अधिकार है कि वह जब चाहे, जनहित में अपनी जमीन को वापस मांग सकती है। इसे बुनियादी आधार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

लेकिन, जिमखाना क्लब के मामले में सरकार ने जिस जल्दबाजी और बिना किसी ठोस पूर्व सूचना के पूरी संस्था को अपने नियंत्रण में लेने का आदेश जारी किया है, वह कई सवाल खड़े करता है। सरकार ने इसके पीछे 'सुरक्षा' और 'सार्वजनिक भलाई' का तर्क दिया है। सवाल यह उठता है कि एक शताब्दी से भी ज्यादा पुरानी इस संस्था को अचानक बंद कर देने से जनता की कौन सी बड़ी भलाई होने जा रही है? सरकार को इस मामले में अधिक पारदर्शी होना चाहिए था और जनता को बताना चाहिए था कि इस जमीन का इस्तेमाल भविष्य में किस लोक-कल्याण के लिए किया जाएगा।

एलीट कल्चर (अभिजात्य वर्ग) का टैग और जिमखाना का सच

इस क्लब को बंद करने के पीछे सरकार ने आधिकारिक तौर पर 'एलीट कल्चर' या 'अमीरों का अड्डा' होने का तर्क नहीं दिया है, लेकिन बैकग्राउंड में यही नैरेटिव सबसे मजबूत है। इसमें कोई शक नहीं है कि दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना ब्रिटिश काल में हुई थी और यह हमेशा से अंग्रेजी बोलने वाले गिने-चुने रईसों, अफसरों और रसूखदारों का गढ़ रहा है, जहां आम आदमी के लिए सदस्यता पाना लगभग असंभव है। यह दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में एक बहुत बड़ी जमीन पर फैला हुआ है, जिसका इस्तेमाल आबादी का एक बेहद छोटा हिस्सा करता है।

लेकिन पवन वर्मा एक तीखा सवाल पूछते हैं— आखिर 'एलीटिज्म' या विशिष्टता क्या है? दुनिया का हर क्लब और हर बड़ी संस्था इसी सिद्धांत पर काम करती है कि कौन उसका हिस्सा बन सकता है और कौन नहीं। आप दिल्ली के किसी भी महंगे रेस्टोरेंट के बाहर चले जाइए, वहां बोर्ड पर साफ लिखा होता है— "प्रवेश का अधिकार सुरक्षित है" (Rights of Admission Reserved)। देश के प्रीमियर संस्थानों (जैसे IIT, IIM या यूपीएससी) में भी एक तरह का निष्कासन (Exclusion) होता है, जहां हर कोई प्रवेश नहीं पा सकता। आप क्लब की सदस्यता के नियमों पर सवाल उठा सकते हैं, आप कह सकते हैं कि इसका लोकतांत्रीकरण होना चाहिए, लेकिन सिर्फ इस आधार पर किसी संस्था को मिटाया नहीं जा सकता।

जिमखाना क्लब का आंतरिक ढांचा और सदस्यता का गणित

अगर हम जिमखाना क्लब की बनावट को देखें, तो इसकी आधी यानी 50 प्रतिशत सदस्यता देश के सिविल सर्वेंट्स (IAS, IPS, IFS) और सेना के सेवारत या रिटायर्ड अधिकारियों के लिए आरक्षित है। बाकी की 50 फीसदी सीटें आम नागरिकों (बिजनेसमैन, डॉक्टर, वकील आदि) के लिए खुली हैं।

चूंकि यह देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक है, इसलिए यहां सदस्यता पाने के लिए सालों लंबी वेटिंग लिस्ट होती है। इसी वजह से इस पर 'सुपर एलीट' होने का ठप्पा और गहरा हो जाता है। लेकिन यह क्लब की कोई अंतर्निहित कमी नहीं है। यह पूरी तरह से मांग और आपूर्ति (Supply and Demand) का खेल है। जब किसी चीज की मांग बहुत ज्यादा होती है और उसकी उपलब्धता सीमित होती है, तो उसका प्रीमियम अपने आप बढ़ जाता है। अदालतों के आदेशों के कारण क्लब में नई सदस्यता बढ़ाने पर रोक लगी हुई है, अन्यथा इसमें और भी कई लोग शामिल हो सकते थे।

लुटियंस दिल्ली के 5-5 एकड़ के बंगले खाली क्यों नहीं होते?

पवन वर्मा सरकार के इस कदम पर सबसे बड़ा और तीखा प्रहार करते हुए कहते हैं कि अगर सरकार का मकसद वाकई 'एलीट कल्चर' को खत्म करना और 'सार्वजनिक भलाई' के लिए जमीनों का सही इस्तेमाल करना है, तो यह नियम सिर्फ जिमखाना क्लब पर ही क्यों लागू हो रहा है? पूरी लुटियंस दिल्ली पर यह नियम लागू क्यों नहीं किया जाता?

लुटियंस जोन की हकीकत यह है:

विशाल बंगले: देश के मंत्री, सांसद, जज, ब्यूरोक्रेट्स और बड़े सैन्य अधिकारी लुटियंस दिल्ली के उन बंगलों में रहते हैं जो तीन से पांच एकड़ की सरकारी जमीन पर फैले हुए हैं। एक-एक सरकारी परिवार के लिए इतनी विशाल जमीन आवंटित है।

दिल्ली का दूसरा पहलू: यह सब उस शहर में हो रहा है जिसकी आधी यानी लगभग 50 फीसदी आबादी आधिकारिक तौर पर झुग्गियों (Slums) या अनधिकृत कॉलोनियों में रहने को मजबूर है, जहां पीने का पानी और सीवर जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं।

अगर प्रधानमंत्री का विजन एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहां असमानता न हो— जिसका मैं पूरी तरह समर्थन करता हूँ— तो इसकी शुरुआत केवल एक क्लब को प्रतीकात्मक (Symbolic) निशाना बनाकर नहीं की जा सकती। यदि आप उन मंत्रियों और सांसदों के बंगलों का बाजार मूल्य के हिसाब से किराया वसूलने लगें, तो देश का आधा कॉपोरेट जगत भी उसे नहीं चुका पाएगा। कई मंत्रियों के बंगलों के अंदर निजी 'मिनी गोल्फ कोर्स' बने हुए हैं। सांसदों ने इन सरकारी घरों को विलासिता के महलों में बदल दिया है। अगर सब्सिडी और विशेषाधिकार ही सरकार की चिंता हैं, तो लुटियंस जोन के हर बंगले को खाली कराकर वहां गरीबों के लिए अस्पताल या स्कूल बनाए जाने चाहिए।

सिर्फ जिमखाना ही क्यों? बाकी क्लबों पर चुप्पी क्यों?

पवन वर्मा पूछते हैं कि अगर वीआईपी कल्चर पर चोट करनी है, तो केवल जिमखाना क्लब को ही 'सॉफ्ट टारगेट' (आसान निशाना) क्यों बनाया जा रहा है? दिल्ली में ऐसे कई और संस्थान हैं जो पूरी तरह से चुनिंदा लोगों के विशेषाधिकारों पर चल रहे हैं:

लोधी गार्डन के ठीक बगल में स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC)

आलीशान इंडिया हैबिटेट सेंटर (IHC)

दर्जनों एकड़ सरकारी जमीन पर फैला दिल्ली गोल्फ क्लब

धौला कुआं में स्थित डिफेंस सर्विसेज ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट (DSOI), जिसके पास अपना खुद का विशाल गोल्फ कोर्स है।

चाणक्यपुरी का एयर फोर्स क्लब और संसद के पास स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब।

ये सभी संस्थान किसी न किसी स्तर पर आम जनता के लिए बंद हैं और विशिष्टता के सिद्धांत पर ही चलते हैं। ऐसे में सिर्फ एक संस्था पर बुलडोजर चला देना न्यायसंगत नहीं लगता।

'सफेद कुर्ता-पायजामा बनाम औपनिवेशिक मानसिकता'

लेखक होने के नाते पवन वर्मा क्लब की कमियों को छिपाते नहीं हैं। वे खुद इस क्लब की संकीर्ण और रूढ़िवादी सोच के बड़े आलोचक रहे हैं। उन्होंने अपना एक व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक बार उन्हें जिमखाना क्लब में प्रवेश करने से सिर्फ इसलिए रोक दिया गया क्योंकि उन्होंने पारंपरिक भारतीय पोशाक— कड़क सफेद कुर्ता-पायजामा और सिल्क का कुर्ता पहना हुआ था। क्लब के कर्मचारियों ने उनसे कहा कि जब तक वह इसके ऊपर 'जवाहर जैकेट' नहीं पहनते, उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जबकि उसी समय क्लब के अंदर लोग जींस, टी-शर्ट और स्पोर्ट्स शूज पहनकर आराम से घूम रहे थे।

पवन वर्मा ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया और क्लब के सेक्रेटरी को तलब किया। तब वह विदेश सेवा (IFS) में एक जूनियर अधिकारी थे। बाद में तत्कालीन क्लब अध्यक्ष एडमिरल तहिलियानी ने उन्हें पत्र लिखकर उनकी बात से सहमति जताई और ड्रेस कोड के नियमों में बदलाव किया गया। भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से विविध देश में, जहाँ पहनावे की इतनी विविधता है, वहाँ औपचारिक पोशाक (Formal Wear) की परिभाषा केवल अंग्रेजों के कोट-पेंट तक सीमित नहीं रखी जा सकती।

दिमाग की गुलामी और असली असमानता की लड़ाई

पवन वर्मा अपनी मशहूर किताब "बिकमिंग इंडियन: द अनफिनिश्ड रिवोल्यूशन ऑफ कल्चर एंड आइडेंटिटी" का हवाला देते हुए कहते हैं कि भारत के कई क्लबों में आज भी दिमागी गुलामी (Colonisation of the Mind) साफ दिखती है। कोलकाता के 'बंगाल क्लब' में 1959 तक किसी भारतीय को सदस्य नहीं बनाया जाता था। मुंबई के कई क्लबों के बाहर अंग्रेजों के जमाने में बोर्ड लगे होते थे— "कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है"। यह सब बदलना बेहद जरूरी है। क्लबों के अंदर भारतीय संस्कृति, कला और सभ्यता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, न कि केवल अंग्रेजी बोलने की कुशलता को ही श्रेष्ठता का पैमाना माना जाए।

लेकिन इन तमाम कमियों के बावजूद, किसी संस्था को पूरी तरह से मिटा देना इसका समाधान नहीं है। आज देश में आर्थिक असमानता एक कड़वा सच है। भारत की कुल जीडीपी (GDP) का 40 प्रतिशत हिस्सा देश के केवल 1 प्रतिशत अमीरों के हाथ में केंद्रित है। मुंबई जैसे महानगर की 50 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती है, जबकि उसी शहर में दुनिया के सबसे महंगे और गगनचुंबी निजी महल भी मौजूद हैं, जिन्हें आम जनता सिर्फ हसरत और उम्मीद की निगाहों से बाहर खड़े होकर देखती है।

दिल्ली जिमखाना क्लब का विवाद सिर्फ एक इमारत या कुछ एकड़ जमीन की लड़ाई नहीं है। यह भारत की राजनीति में चल रहे 'अमीर बनाम गरीब' और 'विशेषाधिकार बनाम आम नागरिक' के नैरेटिव की एक बानगी है। यदि सरकार वाकई इस देश से असमानता और वीआईपी कल्चर को जड़ से उखाड़ना चाहती है, तो इस मुहिम का स्वागत होना चाहिए। लेकिन यह मुहिम जिमखाना क्लब पर आकर रुकनी नहीं चाहिए। सरकार को संवाद और पारदर्शिता का रास्ता चुनना चाहिए, न कि केवल प्रतीकात्मक राजनीतिक लाभ के लिए चुनिंदा संस्थाओं को निशाना बनाना चाहिए।

"ऊपर दिया गया लेख एआई (AI) की मदद से वीडियो से तैयार किया गया है। इसकी शुद्धता और क्वालिटी को बनाए रखने के लिए हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम प्रकाशन से पहले इसे अच्छी तरह चेक और एडिट करती है। 'द फेडरल' में, हम भरोसेमंद पत्रकारिता के लिए एआई की तेज़ी और इंसानी अनुभव दोनों का इस्तेमाल करते हैं।"

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