महिला आरक्षण बनाम सियासी रणनीति, असली मकसद क्या है?
x

महिला आरक्षण बनाम सियासी रणनीति, असली मकसद क्या है?

महिला आरक्षण पर प्रस्तावित संशोधन पर राजनीति विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं कि परिसीमन के जरिए संसद का संतुलन बदलने और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश है।


राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह पहल “महिला आरक्षण” से ज्यादा संसद की संरचना और शक्ति संतुलन को बदलने की कोशिश है। लोकसभा की सीटों को 850 तक बढ़ाने के प्रस्ताव ने प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है।

क्या यह ‘पिछले दरवाजे’ से परिसीमन है?

योगेंद्र यादव इस धारणा को खारिज करते हुए कहते हैं कि यह पिछले दरवाजे से नहीं बल्कि सामने के दरवाजे से किया जा रहा परिसीमन है। उनके अनुसार, महिला सशक्तिकरण की बात एक ट्रोजन हॉर्स की तरह इस्तेमाल हो रही है।वे आरोप लगाते हैं कि सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन को जल्द लागू करना चाहती है क्योंकि उसे अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर असुरक्षा महसूस हो रही है।

क्या यह वास्तव में महिला आरक्षण का मुद्दा है?

यादव के अनुसार, यह पहल मुख्य रूप से महिला आरक्षण के बारे में नहीं है। वे कहते हैं कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर होती, तो एक सरल संवैधानिक संशोधन के जरिए बिना जनगणना और परिसीमन के भी 2029 तक महिला आरक्षण लागू किया जा सकता था।उनका तर्क है कि मौजूदा प्रस्ताव में महिला आरक्षण केवल एक छोटा हिस्सा है, जबकि असली उद्देश्य कुछ और है।

संशोधन का असली लक्ष्य क्या है?

यादव के मुताबिक, इस संशोधन का मूल उद्देश्य परिसीमन के माध्यम से संसद के स्वरूप और संतुलन को बदलना है।हालांकि सरकार यह आश्वासन दे रही है कि सभी राज्यों की सीटें लगभग 50% बढ़ेंगी, लेकिन यादव का कहना है कि विधेयक में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसके विपरीत, विधेयक जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण की बात करता है, जिसे सरकार कानून के जरिए तय करेगी।

क्या आश्वासन भरोसेमंद हैं?

यादव के अनुसार, प्रस्तावित विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि सीटों का पुनर्वितरण उस जनगणना के आधार पर होगा जिसे सरकार तय करेगी। परिसीमन प्रस्ताव में नवीनतम उपलब्ध जनगणना का उल्लेख है, जो संभवतः 2011 के आंकड़े हो सकते हैं।वे दावा करते हैं कि जिन राज्यों में भाजपा की स्थिति कमजोर है, वे नुकसान में रहेंगे, जबकि जिन राज्यों में पार्टी मजबूत है जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात उन्हें फायदा होगा।

दक्षिणी राज्यों पर क्या असर पड़ेगा?

यादव के अनुसार, सीटों की कुल संख्या बढ़ने से सभी राज्यों को संख्यात्मक रूप से लाभ दिखेगा, लेकिन असली सवाल प्रतिनिधित्व के हिस्से का है।

तमिलनाडु: 39 सीटों से बढ़कर लगभग 61 होनी चाहिए थीं, लेकिन प्रस्तावित संख्या करीब 50 हो सकती है

केरल: 20 से बढ़कर 31 होनी चाहिए थीं, लेकिन लगभग 23 सीटें मिल सकती हैं

इस तरह, ये राज्य सीटें बढ़ने के बावजूद अपने प्रतिनिधित्व के हिस्से में कमी महसूस करेंगे।

अन्य राज्यों—आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और पंजाब—पर भी ऐसा ही प्रभाव पड़ सकता है।

क्या इसमें राजनीतिक पैटर्न दिखता है?

यादव का मानना है कि इसमें स्पष्ट राजनीतिक पैटर्न है। जिन राज्यों में भाजपा अपेक्षाकृत कमजोर है, वे प्रतिनिधित्व खो सकते हैं, जबकि मजबूत राज्यों को लाभ मिल सकता है।उनके अनुसार, यह कदम महिला आरक्षण नहीं बल्कि “राजनीतिक लाभ” सुनिश्चित करने का प्रयास है, जिसे वे भाजपा के लिए एक “इंश्योरेंस पॉलिसी” बताते हैं।

जनगणना और 1971 के आधार का मुद्दा

यादव बताते हैं कि यह बदलाव केवल नई जनगणना के उपयोग का मामला नहीं है, बल्कि 1971 की जनगणना पर आधारित संवैधानिक सुरक्षा को हटाने का मुद्दा है।नए प्रस्ताव के तहत संसद को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह तय करे कि किस जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाएगा चाहे वह 2011 हो या भविष्य की कोई जनगणना।इससे अनिश्चितता बढ़ेगी और संतुलन बिगड़ने की आशंका भी।

राष्ट्रीय एकता पर संभावित प्रभाव

योगेंद्र यादव इसे केवल 2029 के चुनाव का मुद्दा नहीं मानते, बल्कि अगले 50 से 100 वर्षों के लिए भारत की एकता से जुड़ा सवाल बताते हैं।उनका कहना है कि यदि प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा हुआ, तो देश के विभिन्न हिस्सों में अलगाव की भावना बढ़ सकती है।वे चेतावनी देते हैं कि भारत पहले से ही क्षेत्रीय (उत्तर बनाम दक्षिण), भाषाई (हिंदी बनाम गैर-हिंदी) और आर्थिक विभाजनों से जूझ रहा है। ऐसे में एक और विभाजन जोड़ना खतरनाक हो सकता है।

वैकल्पिक रास्ता क्या हो सकता है?

यादव के अनुसार, समस्या केवल प्रक्रिया में नहीं बल्कि मंशा में भी है। उनका आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़कर इसे टाल रही है।वे सुझाव देते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 334 में सरल संशोधन कर इस शर्त को हटाया जा सकता है और सीधे महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है।उनके मुताबिक, यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो महिला आरक्षण को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि असली लक्ष्य कुछ और है।


Read More
Next Story