
परिसीमन पर आर-पार की लड़ाई, चुनावों की चिंता छोड़ सरकार के प्लान को चुनौती देगा विपक्ष
विपक्ष के लिए इन विधेयकों का विरोध करना आसान नहीं है, क्योंकि बीजेपी इसे "महिला विरोधी" रुख के रूप में प्रचारित कर सकती है। इसके बावजूद, विपक्षी नेताओं ने सर्वसम्मति से 'नहीं' कहने का फैसला किया है।
भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ आने वाला है। विपक्षी दलों के गठबंधन 'INDIA' (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस) और आम आदमी पार्टी (AAP) ने एक बड़ा राजनीतिक जोखिम लेते हुए संसद के विस्तारित बजट सत्र में सरकार द्वारा लाए जा रहे तीन प्रमुख विधेयकों का कड़ा विरोध करने का फैसला किया है। यह निर्णय बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया।
किन बिलों पर मचा है घमासान?
केंद्र सरकार गुरुवार को लोकसभा में तीन मसौदा कानून पेश करने जा रही है:
131वां संविधान संशोधन विधेयक
परिसीमन (Delimitation) विधेयक
केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक
सरकार का तर्क है कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023' (महिला आरक्षण) को जमीन पर उतारने के लिए इन कानूनों को पारित करना एक अनिवार्य शर्त है। कानून के मुताबिक, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें तभी आरक्षित होंगी, जब अगली जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन पूरा हो जाएगा।
विपक्ष का रुख: "धोखा और सत्ता की भूख"
विपक्ष के लिए इन विधेयकों का विरोध करना आसान नहीं है, क्योंकि बीजेपी इसे "महिला विरोधी" रुख के रूप में प्रचारित कर सकती है। इसके बावजूद, विपक्षी नेताओं ने सर्वसम्मति से 'नहीं' कहने का फैसला किया है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, "हम महिला आरक्षण का पूर्ण समर्थन करते हैं, लेकिन सरकार इन तीन बिलों के जरिए विपक्ष को जाल में फंसाने की कोशिश कर रही है। केंद्र का असली इरादा 'चोरी-छिपे परिसीमन' लागू करना है।" उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनावी पिच को पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में झुकाने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना चाहती है।
राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सरकार जो प्रस्तावित कर रही है, उसका महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। यह संशोधन 'सत्ता हथियाने' का एक प्रयास है।
क्षेत्रीय असंतुलन और दक्षिण भारत की चिंता
खड़गे की बैठक में कपिल सिब्बल, टीआर बालू (DMK), संजय सिंह (AAP), सागरिका घोष (TMC) और तेजस्वी यादव (RJD) जैसे दिग्गज नेता शामिल थे। बैठक के दौरान इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई कि नया परिसीमन बिल दक्षिण भारतीय राज्यों और कम जनसंख्या वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है।
डीएमके नेता टीआर बालू और जयराम रमेश ने तर्क दिया कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है (जैसे तमिलनाडु और केरल), उन्हें लोकसभा सीटों के मामले में नुकसान होगा। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि केंद्र यह शक्ति अपने पास रखना चाहता है कि वह किस जनगणना के आधार पर परिसीमन करे, जो संवैधानिक ढांचे के खिलाफ है।
विपक्ष की काट: "अभी और इसी वक्त लागू हो आरक्षण"
जनता, विशेषकर महिला मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए विपक्ष ने एक नई रणनीति तैयार की है। विपक्ष अब यह मांग करेगा कि महिला आरक्षण को "वर्तमान लोकसभा की 543 सीटों की संख्या के आधार पर तुरंत लागू किया जाए।"
CPI(ML) के सांसद राजा राम सिंह ने कहा, "यह केंद्र को जवाब देना है कि उन्होंने 2024 के चुनाव में इसे लागू क्यों नहीं किया? उनका तर्क था कि जनगणना और परिसीमन के बिना यह संभव नहीं है। लेकिन अब वे जनगणना पूरी होने का इंतजार किए बिना नियमों को क्यों बदलना चाहते हैं?"
इसके अलावा, समाजवादी पार्टी (SP) और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) 'कोटा के भीतर कोटा' की मांग को फिर से उठाएंगे, ताकि ओबीसी (OBC) महिलाओं को भी 33% आरक्षण के भीतर अलग से आरक्षण मिल सके।
दावों और हकीकत में अंतर
विपक्षी सूत्रों का कहना है कि सरकार पिछले कुछ हफ्तों से जो "अनौपचारिक दावे" कर रही थी और जो "असली बिल" सामने आया है, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है। चर्चा थी कि लोकसभा सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 816 कर दी जाएगी और हर राज्य की सीटों में 50% की समान वृद्धि होगी।
लेकिन, जो बिल सार्वजनिक किए गए हैं, उनमें 50% वृद्धि का कोई फॉर्मूला नहीं है। इसके बजाय, संविधान संशोधन बिल लोकसभा की संख्या बढ़ाकर 850 (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35) करने का प्रस्ताव देता है। साथ ही, परिसीमन आयोग को यह तय करने का अधिकार देता है कि निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण के मानक क्या होंगे।
क्या है चुनावी चुनौती?
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अगले हफ्ते विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है। ऐसे में बीजेपी इस मुद्दे को हथियार बना सकती है कि ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और कांग्रेस महिलाओं को उनका हक देने से रोक रहे हैं। स्टालिन ने पहले ही 16 अप्रैल को तमिलनाडु में 'काला झंडा' विरोध प्रदर्शन की घोषणा कर दी है।
विपक्ष के लिए चुनौती यह है कि वे जनता को यह समझा सकें कि उनका विरोध महिला आरक्षण का नहीं, बल्कि परिसीमन की उस प्रक्रिया का है जिसे वे "लोकतंत्र के लिए खतरा" मानते हैं। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर यह बहस भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगी।

