PM मोदी ने जो अब कहा, क्या नोयडा श्रमिकों का विरोध इसी की चेतावनी था?
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विरोध प्रदर्शन की फाइल फोटो।

PM मोदी ने जो अब कहा, क्या नोयडा श्रमिकों का विरोध इसी की चेतावनी था?

ऊर्जा और अर्थव्यवस्था के जिस संकट पर पीएम ने देशवासियों से कुछ अपील की हैं, क्या नोएडा श्रमिकों का विरोध प्रदर्शन इसी की चेतावनी था, जिसे किसी ने नहीं सुना...


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यदि पीछे मुड़कर देखें तो दिल्ली के उपनगर नोएडा में श्रमिकों द्वारा की गई हड़ताल एक शुरुआती चेतावनी संकेत थी। ईरान में बढ़ते संघर्ष के बीच इन विरोध प्रदर्शनों ने अर्थव्यवस्था के भीतर बिगड़ते ऊर्जा संकट और आपूर्ति संबंधी बाधाओं को रेखांकित किया था। लेकिन एक महीने पहले उठाई गई इस आवाज पर तब तक ध्यान नहीं दिया गया, जब तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले रविवार (10 मई) को हैदराबाद में अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए सार्वजनिक रूप से किफायत (Austerity) बरतने की तत्काल अपील नहीं की।

श्रमिकों के आक्रोश का सड़क पर प्रदर्शन

पिछले महीने के मध्य में, नोएडा के हलचल भरे औद्योगिक क्षेत्र से हजारों की संख्या में श्रमिक सड़कों पर उतर आए थे। उनकी मुख्य मांग न्यूनतम वेतन में संशोधन और वृद्धि की थी ताकि वे पड़ोसी क्षेत्र में छिड़े युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई और दैनिक उपभोग की वस्तुओं की ऊंची कीमतों का सामना कर सकें। जल्द ही, असंगठित क्षेत्र के घरेलू कामगार भी इस विरोध में शामिल हो गए। देखते ही देखते यह आंदोलन फैल गया और कई जगहों पर हिंसा, आगजनी और पुलिस के साथ झड़प में तब्दील हो गया। इसके परिणामस्वरूप कई गिरफ्तारियां भी हुईं, जिससे आर्थिक संकट का पूरा मुद्दा महज कानून-व्यवस्था की समस्या बनकर रह गया।

रसोई गैस की कमी बनी गुस्से की मुख्य वजह

श्रमिकों के इस गुस्से का तात्कालिक कारण ईरान में युद्ध की वजह से रसोई गैस (LPG) सिलेंडर की किल्लत, कीमतों में वृद्धि, कालाबाजारी और गैस पाने के लिए किया जाने वाला लंबा इंतजार था। हालांकि सरकार ने इन दावों को खारिज कर दिया कि विरोध के पीछे यही असली कारण था और इसके बजाय 'साजिश' के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया। सरकार ने श्रमिकों पर झूठी चेतावनी फैलाने का आरोप लगाया और दावा किया कि देश में हफ्तों तक आपूर्ति के लिए गैस का पर्याप्त भंडार है। सरकार ने उन लोगों के लिए छोटे सिलेंडर (मिनी-सिलेंडर) का विकल्प भी पेश किया जो नियमित 14.5 किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर का खर्च वहन नहीं कर सकते।

राजनीति ने चेतावनी को किया नजरअंदाज

सरकार की ही तरह, अधिकांश विपक्षी दलों ने भी श्रमिकों की चिंताओं को केवल एक औद्योगिक विवाद (Industrial Relations Issue) के रूप में देखा। जबकि असलियत में ये चिंताएं पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों से उपजी थीं, जो दूर-दराज के क्षेत्रों तक रसोई की आग बुझाने की धमकी दे रहे थे। उस समय सरकार और विपक्ष दोनों ही पांच राज्यों के चुनावों में व्यस्त थे। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के लिए यह अनुकूल नहीं था कि वह भविष्य के अंधेरे दिनों की संभावना को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करे। वहीं, भाजपा को चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दल स्थानीय और राज्य-विशिष्ट मुद्दों या चुनाव पूर्व मतदाता सूची के संशोधन जैसे तकनीकी मामलों तक ही सीमित रहे।

राहुल गांधी की चेतावनी और व्यापक चुप्पी

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीतियों के भारतीय बाजारों और श्रमिकों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के प्रति सरकार की उदासीनता पर सवाल उठाए थे। उन्होंने ईरान युद्ध और भारत के लिए उत्पन्न जोखिमों के मद्देनजर भी अपनी बात दोहराई। लेकिन कुल मिलाकर विपक्ष और यहां तक कि कांग्रेस के भीतर राहुल के कई सहयोगी भी ईंधन की कमी के बढ़ते संकेतों से बेखबर रहे। किसी ने भी नोएडा के गरीब श्रमिकों के उस शोर को नहीं सुना, जो आने वाले आर्थिक संकट की ओर इशारा कर रहा था। वैचारिक मतभेदों के बावजूद सभी पार्टियां चुनाव प्रचार में मग्न रहीं और गंभीर चेतावनी संकेतों को अनदेखा किया गया।

प्रधानमंत्री मोदी का किफायत का संदेश

4 मई को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद, प्रधानमंत्री ने अंततः उस आर्थिक बोझ का खुलासा किया, जो वैश्विक युद्धों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। उन्होंने राजकोषीय विवेक और संयम बरतने का आह्वान किया। उनके सुझावों में यात्रा कम करने और ईंधन बचाने के लिए जहां संभव हो वहां 'वर्क फ्रॉम होम' (घर से काम) करना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचना और कम से कम एक साल तक सोना (Gold) न खरीदने की अपील शामिल थी। इसके अलावा, उन्होंने आयातित खाद्य तेल और अन्य विदेशी वस्तुओं के उपयोग को कम करने का सुझाव दिया ताकि तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के कारण घटते विदेशी मुद्रा भंडार को बचाया जा सके।

मीडिया की भूमिका और छूटे हुए संकेत

नोएडा के श्रमिकों ने जिन समस्याओं को उठाया था, वे भले ही प्रधानमंत्री की विस्तृत 'अपेक्षित किफायत सूची' जितनी व्यापक न रही हों। लेकिन उनका दर्द वास्तविक था। यह विडंबना ही है कि नोएडा में स्थित दर्जनों टीवी चैनलों के दफ्तरों के ठीक बाहर यह प्रदर्शन कई दिनों तक चलते रहे, लेकिन श्रमिकों का संदेश खो गया। मीडिया ने श्रमिकों के आंदोलन को लेकर साजिश की कहानियों और यहां तक कि 'पाकिस्तान एंगल' को भी जगह दी, जिससे श्रमिक संगठनों को बदनाम करने के आरोप लगे। इस शोर-शराबे में यह तथ्य भी छिप गया कि पाकिस्तान उन पहले देशों में से था, जिसने ईंधन की कमी से निपटने के लिए वर्क-फ्रॉम-होम नीति लागू की थी। अंततः घर के पास से मिल रही चेतावनियों को तब तक नजरअंदाज किया गया, जब तक कि संकट पूरी तरह सामने नहीं आ गया।

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