
महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने की मंशा पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने सरकार को घेरा
संसद के विशेष सत्र में 131वें संविधान संशोधन और परिसीमन विधेयक को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तलवारें खिंच गई हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 'विकसित भारत' का नया अध्याय बताया है।
भारत की संसद का विशेष सत्र इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर है। एजेंडे में तीन प्रमुख विधेयक हैं—131वां संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े कानून। लेकिन जिस चीज ने सबसे ज्यादा विवाद पैदा किया है, वह है 'महिला आरक्षण' को 'परिसीमन' (Delimitation) के साथ जोड़ना। यह बहस अब केवल सीटों तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत के संघीय ढांचे और उत्तर-दक्षिण के राजनीतिक संतुलन पर एक बड़ा सवाल बन गई है।
पीएम मोदी की दलील: "विकसित भारत का नया अध्याय"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में महिला आरक्षण का पुरजोर बचाव किया। उन्होंने विपक्षी दलों से अपील की कि वे इस संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण न करें। पीएम ने इसे "विकसित भारत में एक नया अध्याय जोड़ने का अवसर" बताया। विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे तकनीकी सवालों को प्रधानमंत्री ने "तकनीकी बहानेबाजी" करार दिया।
दिलचस्प बात यह रही कि डीएमके (DMK) सांसदों द्वारा काले कपड़े पहनकर किए गए विरोध पर तंज कसते हुए प्रधानमंत्री ने इसे भारतीय परंपरा में शुभ कार्यों से पहले लगाया जाने वाला "काला टीका" बताया। पीएम ने विश्वास जताया कि यह बिल पास होगा, हालांकि सरकार के पास दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत है या नहीं, यह अभी भी एक बड़ा सवाल है।
विपक्ष की आशंका: "आरक्षण की आड़ में परिसीमन क्यों?"
विपक्ष का मुख्य हमला आरक्षण और परिसीमन के जुड़ाव पर है। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने की योजना को महिला आरक्षण से क्यों जोड़ा जा रहा है? इसी तरह, केसी वेणुगोपाल ने चेतावनी दी कि बिना व्यापक परामर्श के इस तरह का कदम उठाना राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम कर सकता है।
विपक्ष का तर्क है कि 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन करना गलत है और नई जनगणना कब होगी, इसका कोई अता-पता नहीं है। उन्हें डर है कि यह कदम आगामी चुनावों में राजनीतिक संतुलन बदलने की एक रणनीतिक चाल है।
दक्षिण भारत का नजरिया: राजनीतिक ताकत खोने का डर
राजनीतिक विश्लेषक आर. कन्नन ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा, "महिला आरक्षण दरअसल एक 'रेड हेरिंग' (ध्यान भटकाने वाली चीज) है, असली खेल तो परिसीमन का है।" कन्नन के अनुसार, परिसीमन के बाद संसद में दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी 24.3% से गिरकर 20.7% रह सकती है।
उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 58 तो हो सकती हैं, लेकिन कुल सीटों के अनुपात में उसकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अमेरिका या यूरोपीय संघ जैसे मॉडल देखने चाहिए या फिर तेलंगाना के नेतृत्व द्वारा प्रस्तावित 'हाइब्रिड फॉर्मूला' पर विचार करना चाहिए, जो जनसंख्या के साथ-साथ आर्थिक योगदान को भी आधार बनाता है।
बीजेपी का बचाव: "यह कोई नई बात नहीं"
भाजपा नेता रचना रेड्डी ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि महिला आरक्षण और परिसीमन का लिंक कोई नया नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि जब दो साल पहले यह बिल पेश किया गया था, तब भी स्पष्ट था कि कार्यान्वयन परिसीमन के बाद ही होगा। उन्होंने सवाल किया कि लोकसभा की सीटें बढ़ना नकारात्मक क्यों माना जा रहा है? रेड्डी ने विपक्ष के बदलते रुख को "असंगत" बताया।
एक अलग दृष्टिकोण: क्या उत्तर भारत को होगा नुकसान?
लेखक विनोद कुमार ने एक विपरीत तर्क पेश किया। उन्होंने कहा कि उत्तर भारतीय राज्यों को वर्तमान में कम सीटें मिल रही हैं। उदाहरण के लिए, समान जनसंख्या होने के बावजूद तमिलनाडु के पास 39 सीटें हैं जबकि गुजरात के पास केवल 26। उन्होंने कहा, "दक्षिण के राज्य हमेशा 'विक्टिम कार्ड' खेलते हैं। जनसंख्या के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व को पूरी तरह और निष्पक्ष रूप से लागू किया जाना चाहिए।" उन्होंने इसे सरकार और विपक्ष दोनों के लिए चुनावी लाभ का खेल बताया।
कानूनी पेचीदगियां: सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट के वकील हर्षा आजाद ने इस पूरी प्रक्रिया के कानूनी और संस्थागत ढांचे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि परिसीमन का उद्देश्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, लेकिन अदालतों ने ऐतिहासिक रूप से इन मामलों में हस्तक्षेप करने से परहेज किया है क्योंकि इन्हें 'राजनीतिक प्रश्न' माना जाता है।
आजाद ने कहा, "यह एक नई प्रणाली है जिसे सरकार लाने की कोशिश कर रही है, इसे पहले कभी परखा नहीं गया है।" उन्होंने परिसीमन निकायों की स्वतंत्रता पर भी संदेह जताया और कहा कि ये निकाय सरकार के नियंत्रण में काम करते हैं, जिससे उनकी तटस्थता पर सवाल उठना लाजिमी है।
परामर्श का अभाव: सबसे बड़ी चुनौती
चर्चा में एक बात बार-बार उभर कर आई—परामर्श की कमी। आर. कन्नन ने जोर देकर कहा कि परिसीमन 2011 के बजाय 2027 की जनगणना पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मौजूदा दृष्टिकोण सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी को दर्शाता है। वकील हर्षा आजाद ने भी मांग की कि इस बिल को वापस लिया जाए और एक व्यापक परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से इसे फिर से तैयार किया जाए।

