
विवादों में पवन खेड़ा केस, जमानत खारिज होने के बाद न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अब उनके वकीलों ने हितों के टकराव व तथ्यों के छिपाने का आरोप लगाकर नई सुनवाई की मांग की।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर एक नया विवाद खड़ा हो गया। खेड़ा के वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर कर आदेश को वापस लेने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया और राज्य के शीर्ष विधि अधिकारी के साथ हितों का टकराव (conflict of interest) था।
मुख्य न्यायाधीश अशुतोष कुमार को संबोधित औपचारिक शिकायत में, वकील रीटम सिंह के नेतृत्व में अधिवक्ताओं ने एडवोकेट जनरल देवाजित लोन सैकिया की भूमिका पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “एडवोकेट जनरल दोहरी भूमिका में पेश हुए और ऐसे दस्तावेजों पर भरोसा किया, जो स्वयं उनके और संबंधित पक्षों के बीच वित्तीय संबंध को दर्शाते हैं। यह तथ्य अदालत के सामने पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया।”
नई सुनवाई की मांग
याचिका में 24 अप्रैल के आदेश को वापस लेने और एक स्वतंत्र पीठ के समक्ष मामले की दोबारा सुनवाई की मांग की गई है। वकीलों का तर्क है कि ऐसे तथ्यों का खुलासा न होना न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करता है।इससे पहले उसी दिन, उच्च न्यायालय ने खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की पत्नी रिनिकी भुयान शर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। इस मामले की जांच गुवाहाटी क्राइम ब्रांच द्वारा की जा रही है। न्यायमूर्ति पार्थिवज्योति सैकिया की एकल पीठ ने 21 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रखने के बाद यह आदेश सुनाया।
शिकायत में क्या कहा गया
शिकायत के अनुसार, एडवोकेट जनरल ने 20 मार्च 2026 के मुख्यमंत्री के चुनावी हलफनामे का हवाला दिया, जो जलुकबाड़ी निर्वाचन क्षेत्र के लिए दाखिल किया गया था। आरोप है कि उन्होंने उसी दस्तावेज का उपयोग करते हुए यह नहीं बताया कि उसमें संबंधित व्यक्तियों और उनके बीच वित्तीय संबंध (जैसे बकाया ऋण) दर्ज हैं।वकीलों ने इसे “महत्वपूर्ण तथ्यों का गंभीर दमन” बताया। उनका कहना है कि इससे पक्षपात की आशंका उत्पन्न होती है और यह प्राकृतिक न्याय तथा अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से स्वतः संज्ञान लेने या इसे संवैधानिक प्रावधानों के तहत याचिका के रूप में स्वीकार करने का अनुरोध किया है।
‘गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं’
इस घटनाक्रम से पहले दिन में सुनवाई के दौरान खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मामला राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उन्होंने कहा, “जब स्वयं मुख्यमंत्री मुझे निशाना बना रहे हैं, तो मैं निष्पक्षता की उम्मीद कैसे कर सकता हूं?”उन्होंने यह भी कहा कि गिरफ्तारी की कोई आवश्यकता नहीं है—“मैं भागने वाला नहीं हूं और जांच में पूरा सहयोग कर रहा हूं।”
वरिष्ठ वकील के.एन. चौधरी ने भी इस दलील का समर्थन किया और आरोपों को दुर्भावनापूर्ण बताया। बचाव पक्ष का कहना था कि मामला अधिकतम आपराधिक मानहानि का हो सकता है, जिसे निजी शिकायत के जरिए आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
अभियोजन पक्ष का तर्क
वहीं, एडवोकेट जनरल सैकिया ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि मामला सिर्फ मानहानि तक सीमित नहीं है। “यह दस्तावेजों की फर्जी तैयारी, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ा गंभीर मामला है, जिसकी गहन जांच जरूरी है।”
उच्च न्यायालय की टिप्पणी
अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने आरोपों की प्रकृति पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि आरोप मुख्यमंत्री तक सीमित होते, तो इसे राजनीतिक बयानबाजी माना जा सकता था, लेकिन एक “निर्दोष महिला” को इसमें घसीटना अलग मंशा को दर्शाता है।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला साधारण मानहानि का नहीं है और इसमें हिरासत में पूछताछ (custodial interrogation) आवश्यक है। आदेश में कहा गया कि दस्तावेज किसने जुटाए और उपलब्ध कराए, इसकी जांच बिना हिरासत में पूछताछ के संभव नहीं है।
साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि खेड़ा अपने दावों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाए हैं—विशेष रूप से यह कि रिनिकी भुयान शर्मा के पास कई देशों के पासपोर्ट हैं या उन्होंने अमेरिका में बड़ी निवेश वाली कंपनी स्थापित की है। अंत में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि खेड़ा असम की किसी सक्षम अदालत में राहत के लिए जाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश उनकी याचिका पर विचार करने में बाधा नहीं बनेंगे।

