NEET विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान पर सस्पेंस, कुरियन के इस्तीफे ने बढ़ाई चर्चा
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NEET विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान पर सस्पेंस, कुरियन के इस्तीफे ने बढ़ाई चर्चा

राष्ट्रपति ने जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। इसके बाद मोदी कैबिनेट में बड़े फेरबदल, महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और सहयोगियों को जगह देने की चर्चा तेज हुई।


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार (23 जून) को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। इस घटनाक्रम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंत्री परिषद में जल्द बड़े फेरबदल की अटकलों को और तेज कर दिया है। जॉर्ज कुरियन भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्रिपरिषद में एकमात्र ईसाई चेहरा थे। उनका बाहर होना लगभग तय माना जा रहा था, क्योंकि भाजपा ने 21 जून को उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें दोबारा राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया। अल्पसंख्यक मामलों के पूर्व राज्य मंत्री कुरियन ने बताया कि उन्होंने सोमवार (22 जून) को अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज दिया था।

क्या होने वाला है व्यापक मंत्रिमंडल फेरबदल?

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, कुरियन का इस्तीफा प्रधानमंत्री मोदी की केंद्रीय मंत्रिपरिषद में होने वाले एक “व्यापक फेरबदल” का संकेत है। यह फेरबदल अगले महीने संसद के मानसून सत्र से पहले किया जा सकता है।फेरबदल से पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पार्टी संगठन में बड़े बदलावों को अंतिम रूप देने की तैयारी में हैं। यह प्रक्रिया पिछले महीने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और त्रिपुरा में नए प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति के साथ तेज हुई थी।

सूत्रों का कहना है कि नितिन नवीन द्वारा पार्टी संगठन के पुनर्गठन में कई नए प्रभारियों की नियुक्ति, राष्ट्रीय पदाधिकारियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि और संसदीय बोर्ड के पुनर्संरचना जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि ये बदलाव आगामी मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल के साथ तालमेल में होंगे।

ध्यान देने योग्य है कि 10 जून 2024 को गठित मोदी मंत्रिपरिषद में अब तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। आगामी फेरबदल प्रधानमंत्री मोदी के पिछले कार्यकाल के उस मॉडल से मेल खाता दिखाई देता है, जिसमें जुलाई 2021 में एक बड़ा मध्यावधि फेरबदल किया गया था। उस समय 12 मंत्रियों को हटाया गया था और 15 नए कैबिनेट मंत्रियों (जिनमें सात राज्य मंत्रियों को पदोन्नति दी गई थी) तथा 28 राज्य मंत्रियों को शामिल किया गया था।

उत्तर प्रदेश पर विशेष फोकस

भाजपा सूत्रों के अनुसार, आगामी फेरबदल का पैमाना और राजनीतिक संदेश 2021 के फेरबदल जैसा ही हो सकता है। उस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से लगभग आठ महीने पहले मोदी ने 77 मंत्री पदों में से बड़ी संख्या अन्य पिछड़ा वर्ग (27), अनुसूचित जाति (12) और अनुसूचित जनजाति (7) समुदायों को दी थी।

अगले महीने होने वाले संभावित फेरबदल में भी इसी तरह का सामाजिक संतुलन देखने को मिल सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बाद भाजपा राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने को प्राथमिकता दे रही है।

हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह फेरबदल केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं होगा, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों—जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, तेलंगाना आदि—के लिए भाजपा की राजनीतिक रणनीति को भी दिशा देगा।

महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर

सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी 2029 के लोकसभा चुनावों से महिला आरक्षण लागू करने की अपनी मंशा पहले ही जता चुके हैं। इसलिए मंत्रिपरिषद में महिलाओं की संख्या में “महत्वपूर्ण वृद्धि” देखने को मिल सकती है।वर्तमान में 72 सदस्यीय केंद्रीय मंत्रिपरिषद में केवल सात महिलाएं हैं। इनमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल हैं।

सहयोगी दलों की बढ़ सकती है हिस्सेदारी

भाजपा के कुछ सहयोगी दलों को उम्मीद है कि इस फेरबदल में उन्हें अधिक मंत्री पद मिल सकते हैं। वर्तमान में 72 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में 61 मंत्री भाजपा से हैं।नीतीश कुमार की जदयू, चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी, एच.डी. देवेगौड़ा की जद(एस), जीतन राम मांझी की हम और चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) के पास एक-एक कैबिनेट मंत्री है। इसके अलावा एकनाथ शिंदे की शिवसेना और जयंत चौधरी की आरएलडी के पास स्वतंत्र प्रभार वाले एक-एक राज्य मंत्री हैं।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि जदयू और टीडीपी की हिस्सेदारी कुछ बढ़ सकती है। यह भी देखा जाएगा कि क्या जदयू प्रमुख नीतीश कुमार को, उनकी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद, केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलती है।उधर, एकनाथ शिंदे की शिवसेना कम से कम एक कैबिनेट पद चाहती है। हाल ही में शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के उनके दल में आने की खबरों के बाद उनकी यह मांग और मजबूत हुई है।

बंगाल और बिहार पर भी नजर

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि मोदी आगामी फेरबदल के जरिए पश्चिम बंगाल और बिहार में अपनी राजनीतिक पहुंच और मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में इन राज्यों से कुछ नए चेहरों को मंत्रिपरिषद में शामिल किया जा सकता है।हालांकि सूत्रों का कहना है कि हाल ही में त्रिपुरा आधारित नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय और एनडीए में शामिल होने की इच्छा जताने वाले 20 बागी तृणमूल कांग्रेस सांसदों को मंत्रिपरिषद में जगह नहीं मिलेगी। पश्चिम बंगाल से नए मंत्री भाजपा के मौजूदा सांसदों में से ही चुने जाने की संभावना है।

क्या धर्मेंद्र प्रधान बने रहेंगे मंत्री?

जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे के अलावा कुछ अन्य मंत्रियों के भी बाहर होने की संभावना जताई जा रही है। इनमें रेल राज्य मंत्री रवनीत बिट्टू, सड़क परिवहन राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा और वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के नाम शामिल हैं।रवनीत बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो गया और भाजपा ने उन्हें दोबारा नामित नहीं किया। हालांकि सूत्रों का कहना है कि उन्हें पंजाब में पार्टी के चुनावी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है।

हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी के क्रमशः दिल्ली और उत्तर प्रदेश भाजपा इकाइयों के प्रमुख बनने के बाद उनके मंत्री पद छोड़ने की संभावना जताई जा रही है।वहीं अश्विनी वैष्णव, प्रह्लाद जोशी और मनसुख मांडविया जैसे मंत्री, जिनके पास वर्तमान में कई मंत्रालयों का प्रभार है, उनके कुछ विभाग नए मंत्रियों को दिए जा सकते हैं।

सबकी नजर इस बात पर भी रहेगी कि क्या प्रधानमंत्री मोदी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद पर बनाए रखते हैं। हाल के समय में नीट परीक्षा प्रश्नपत्र लीक और शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अन्य विवादों के कारण उनके इस्तीफे की मांग तेज हुई है।पिछले 12 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने विवादों में घिरे मंत्रियों के इस्तीफे की मांगों को अक्सर नजरअंदाज किया है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि धर्मेंद्र प्रधान या पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी—जिनका नाम अमेरिका में जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों में सामने आने की चर्चा रही है—अपने पदों पर बने रहते हैं या नहीं।

कुल मिलाकर, आगामी मंत्रिमंडल फेरबदल केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि भाजपा और एनडीए की आने वाली चुनावी रणनीति, सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक संदेश को भी स्पष्ट रूप से दर्शाएगा।

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