तीन कानूनी आधार, जिनके दम पर अदालत में दी जा सकती है परिसीमन को चुनौती
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तीन कानूनी आधार, जिनके दम पर अदालत में दी जा सकती है परिसीमन को चुनौती

जैसे ही ये विधेयक कानून बनेंगे, इनका सुप्रीम कोर्ट पहुंचना लगभग तय है। कानूनी गलियारों में इस बात पर चर्चा तेज है कि आखिर किन आधारों पर इन्हें चुनौती दी जाएगी? यहाँ तीन मुख्य कानूनी आधार हैं जो इस लड़ाई की दिशा तय करेंगे।


भारत की संसद में वर्तमान में जो तीन विधेयक पेश किए गए हैं, वे देश के चुनावी इतिहास के पिछले 50 वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हैं। '131वां संविधान संशोधन विधेयक 2026' लोकसभा की सीटों पर लगी पुरानी रोक को हटाता है, 'परिसीमन विधेयक 2026' निर्वाचन क्षेत्रों को फिर से तैयार करने की मशीनरी बनाता है, और तीसरा विधेयक केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली, पुडुचेरी, जम्मू-कश्मीर) को इस नई व्यवस्था के दायरे में लाता है। लेकिन, जैसे ही ये विधेयक कानून बनेंगे, इनका सुप्रीम कोर्ट पहुंचना लगभग तय है। कानूनी गलियारों में इस बात पर चर्चा तेज है कि आखिर किन आधारों पर इन्हें चुनौती दी जाएगी? यहाँ तीन मुख्य कानूनी आधार हैं जो इस लड़ाई की दिशा तय करेंगे।

1. अनुच्छेद 368: वो तकनीकी पेंच जो सब कुछ बदल सकता है

सबसे मजबूत और तकनीकी चुनौती 'अनुच्छेद 368' के एक प्रावधान से आती है। आमतौर पर संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत काफी होता है। लेकिन, कुछ खास मामलों में कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी (Ratification) अनिवार्य है। इन खास मामलों में वह संशोधन भी शामिल है जो "संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व" (Representation of States in Parliament) में बदलाव करता है। अब सवाल यह है कि क्या 131वां संशोधन इस श्रेणी में आता है?

पहला पक्ष (सरकार का संभावित तर्क): कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह वाक्यांश केवल राज्यसभा के लिए है, क्योंकि वहाँ राज्यों की सीटें निश्चित हैं। लोकसभा हमेशा से जनसंख्या आधारित रही है, इसलिए इसके परिसीमन के लिए राज्यों की मंजूरी की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

दूसरा पक्ष (याचिकाकर्ताओं का तर्क): "संसद" शब्द में दोनों सदन (लोकसभा और राज्यसभा) शामिल हैं। अगर तमिलनाडु की सीटें कम होकर उत्तर प्रदेश की सीटें बढ़ती हैं, तो यह सीधे तौर पर "संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व" में बदलाव है। 1992 के 'किहोतो होलोहन' मामले में कोर्ट ने कहा था कि अगर संशोधन का "प्रभाव" बदल रहा है, तो राज्यों की सहमति जरूरी है।

अगर सुप्रीम कोर्ट दूसरे पक्ष को सही मानता है, तो सरकार को आधे राज्यों की मंजूरी लेनी होगी, जो एक बड़ी राजनीतिक बाधा बन सकती है।

2. संघीय ढांचा (Federalism): क्या यह एक 'धोखा' है?

दूसरा बड़ा आधार 'संघीय ढांचा' या फेडरलिज्म है। सुप्रीम कोर्ट ने 'केशवानंद भारती' (1973) मामले में फेडरलिज्म को संविधान का 'मूल ढांचा' (Basic Structure) घोषित किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क यह हो सकता है कि 1976 में लोकसभा सीटों पर जो रोक लगाई गई थी और जिसे 2001 में बढ़ाया गया, वह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था। वह एक 'फेडरल कॉम्पैक्ट' (संघीय समझौता) था। दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेषकर केरल और तमिलनाडु को यह वादा किया गया था कि अगर वे जनसंख्या नियंत्रण करेंगे, तो उनकी राजनीतिक शक्ति (सीटों की संख्या) कम नहीं की जाएगी।

अब उस रोक को हटाना उस समझौते को एकतरफा तोड़ना है। कोर्ट के सामने अब दो मूल्यों के बीच चुनाव करने की चुनौती होगी: एक तरफ 'लोकतंत्र' (जहाँ जनसंख्या के आधार पर वोट की वैल्यू समान होनी चाहिए) और दूसरी तरफ 'फेडरलिज्म' (जहाँ राज्यों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है)।

3. अनुच्छेद 329(a) और न्यायिक समीक्षा की सीमा

संविधान का अनुच्छेद 329(a) कहता है कि परिसीमन से जुड़े किसी भी कानून को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। दशकों तक इसे एक 'पूर्ण प्रतिबंध' माना गया। लेकिन, हाल ही में 'किशोरचंद्र छाँगनलाल राठौड़ बनाम भारत संघ (2024)' के मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने कहा कि यह प्रतिबंध पूर्ण नहीं है। अगर परिसीमन का आदेश "स्पष्ट रूप से मनमाना" (Manifestly Arbitrary) है, तो कोर्ट उसकी समीक्षा कर सकता है।

सरकार का तर्क होगा कि पुराने फैसलों के अनुसार कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता, जबकि विपक्ष 'एल. चंद्र कुमार' (1997) केस का हवाला देगा, जिसमें कहा गया था कि 'न्यायिक समीक्षा' (Judicial Review) संविधान का मूल ढांचा है और इसे छीना नहीं जा सकता।

कौन और कब देगा चुनौती?

इस मामले में सबसे मजबूत याचिकाकर्ता कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक राज्य सरकार होगी। एक राज्य के पास संसाधन, खड़े होने का आधार (Standing) और राजनीतिक वैधता होती है। चुनाव कैलेंडर भी इस लड़ाई के समय को प्रभावित करेगा। केरल और तमिलनाडु में मतदान के नतीजे 4 मई तक आने हैं। ऐसे में कर्नाटक (सिद्धारमैया सरकार) सबसे पहले याचिका दायर कर सकता है। मई की शुरुआत तक दक्षिण के तीन राज्यों की एक संयुक्त याचिका देखने को मिल सकती है।

यह विधेयक समूह भारत के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा पुनर्गठन है। इसकी तुलना केवल 2015 के 'NJAC' (99वां संशोधन) से की जा सकती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। सवाल यह है कि क्या वर्तमान सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के इतने बड़े फैसले में हस्तक्षेप करने की हिम्मत दिखाएगा? अनुच्छेद 368 का तकनीकी विवाद सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह आने वाली कई पीढ़ियों के लिए भारत के संवैधानिक और राजनीतिक परिदृश्य को बदल कर रख देगा।

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