सरकारी स्कूलों का मर्जर, क्यों दलित, आदिवासी और छात्राओं पर पड़ रही है सबसे कड़ी मार?
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सरकारी स्कूलों का मर्जर, क्यों दलित, आदिवासी और छात्राओं पर पड़ रही है सबसे कड़ी मार?

शिक्षा केवल एक नंबर नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है। यदि सरकारें स्कूलों को केवल 'लागत और दक्षता' के चश्मे से देखेंगी, तो समावेशी भारत का सपना अधूरा रह जाएगा।


भारत में सरकारी स्कूलों के 'युक्तिकरण' (Rationalisation) और विलय की प्रक्रिया किसी एक सांचे में नहीं ढली है। हर राज्य अपने-अपने मानक तय कर रहा है। कहीं कम नामांकन आधार है, तो कहीं स्कूलों के बीच की दूरी। लेकिन इन अलग-अलग प्रयोगों के बीच एक बात हर राज्य में समान है: इस सरकारी नीति का प्रभाव समाज के हर तबके पर एक जैसा नहीं पड़ रहा है।

विशेषज्ञों और अध्ययनों की मानें तो स्कूलों पर ताला लगने का सबसे बड़ा बोझ उन कंधों पर गिर रहा है जो पहले से ही हाशिए पर हैं, यानी लड़कियां, दलित, आदिवासी और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे।

सामाजिक ताने-बने की अनदेखी

अनुसंधान से पता चलता है कि स्कूलों को बंद करने का फैसला अक्सर उन समुदायों की सामाजिक संरचना को नजरअंदाज करके लिया जाता है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर की निखिता मैरी मैथ्यू द्वारा 2025 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि विलय के निर्णय केवल संख्यात्मक सीमाओं (Enrolment Thresholds) पर आधारित थे।

मैथ्यू नोट करती हैं, "भारत में जाति-आधारित आवासीय अलगाव (Residential Segregation) एक कड़वी हकीकत है। अक्सर कम आबादी वाली बस्तियां उन्हीं समुदायों की होती हैं जो सामाजिक रूप से हाशिए पर हैं। जब आप केवल संख्या के आधार पर स्कूल बंद करते हैं, तो आप अनजाने में इन्हीं समुदायों के स्कूलों को निशाना बनाते हैं।"

आंकड़ों में छिपी असमानता

आंध्र प्रदेश, असम, हरियाणा, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों के आंकड़े डराने वाले हैं। स्कूलों के विलय के बाद सरकारी स्कूलों में कुल नामांकन में 6.62% की गिरावट आई। लेकिन जब हम गहराई में जाते हैं, तो पता चलता है कि अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों के नामांकन में यह गिरावट 11.8% तक थी। जिन गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी थी, वहां नामांकन 10% से ज्यादा गिर गया, जबकि संपन्न इलाकों में इसका कोई खास असर नहीं हुआ।

भूगोल और बुनियादी ढांचे की मार

दूरी और परिवहन की कमी इस खाई को और चौड़ा कर देती है। जिन गांवों में सरकारी बस सेवा नहीं है, वहां एससी, ओबीसी और एसटी छात्रों के नामांकन में भारी कमी देखी गई है। कई मामलों में, जातिगत भेदभाव वाले क्षेत्रों में एससी और ओबीसी छात्रों के नामांकन में 30% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई।

ओडिशा आरटीई फोरम के ब्लोरिन मोहंती बताते हैं, "रायगढ़ा जैसे आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों में स्थिति सबसे खराब है। बस्तियां बिखरी हुई हैं और रास्ते कठिन हैं। स्कूल दूर होने के कारण केवल दो ब्लॉकों में ही 500 से अधिक बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। इनमें से ज्यादातर बच्चे आदिवासी समुदायों से हैं।"

जाति का कारक और सरकारी निर्भरता

हाशिए के समुदायों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का एकमात्र जरिया हैं। हिमाचल प्रदेश का उदाहरण लें, तो वहां 62% लड़कियां सरकारी स्कूलों में पढ़ती हैं। अनुसूचित जाति (SC) के मामले में यह निर्भरता और भी ज्यादा—करीब 72% है। शिक्षाविद ओ.पी. भूरैता कहते हैं, "इन स्कूलों के बंद होने का सीधा मतलब है कि गरीब और दलित बच्चों, खासकर लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद करना।"

हरियाणा में भी यही चिंताएं हैं। भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति (BGVS) के प्रमोद गौरी बताते हैं कि राज्य में 1,400 से ज्यादा स्कूलों का विलय हो चुका है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान दलित बच्चों को उठाना पड़ रहा है क्योंकि वे ही इन स्कूलों की रीढ़ हैं।

लड़कियों पर दोहरी मार

जब स्कूल पड़ोस से दूर चला जाता है, तो लड़कियों की शिक्षा पर सबसे पहले गाज गिरती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रोफेसर एस. श्रीनिवास राव के एक अध्ययन के अनुसार, स्कूल दूर होने पर माता-पिता अपनी बेटियों को अकेले भेजने में डरते हैं। नतीजा? पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है और अक्सर यह बाल विवाह की ओर ले जाती है।

राजस्थान और ओडिशा के फील्ड स्टडीज बताते हैं कि लड़कियों के लिए शिक्षा का संघर्ष केवल किताबों तक सीमित नहीं है। उन्हें घर और समाज के उस पितृसत्तात्मक नजरिए से भी लड़ना पड़ता है जो बेटी को 'बोझ' और उसकी शिक्षा पर निवेश को 'बर्बादी' मानता है। स्कूल का दूर होना इस नजरिए को और मजबूत कर देता है।

निजीकरण का अनचाहा बोझ

एनआईईपीए (NIEPA) की आयशा मलिक के शोध के अनुसार, विलय के बाद करीब 15% छात्र कम फीस वाले निजी स्कूलों में चले गए। यह उन गरीब परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ है जिनकी मासिक आय 5,000 से 10,000 रुपये के बीच है। जो परिवार निजी स्कूल का खर्च नहीं उठा पाए, उनके बच्चे बाल श्रम की ओर धकेल दिए गए। तेलंगाना के महबूबनगर, राजस्थान के बांसवाड़ा और ओडिशा के कोरापुट जैसे इलाकों में, जहां बाल श्रम पहले से एक चुनौती है, स्कूल का दूर होना बच्चों को कक्षाओं से पूरी तरह बाहर कर रहा है।

दिव्यांग बच्चों की अनदेखी

यह नीति दिव्यांग बच्चों के लिए तो किसी सजा से कम नहीं है। ओडिशा के एक मामले में, बोलने में अक्षम (Speech Impaired) एक बच्चे को स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि उसका पड़ोस का स्कूल बंद हो गया था और परिवार के लिए उसे दूर के स्कूल तक ले जाना संभव नहीं था।

एक ढांचागत पैटर्न

ये तमाम अनुभव एक स्पष्ट पैटर्न की ओर इशारा करते हैं: जिन स्कूलों में हाशिए के समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं, उनके बंद होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। कर्नाटक जैसे राज्यों में प्रस्तावित 'मैग्नेट स्कूल' मॉडल ने इन चिंताओं को फिर से जिंदा कर दिया है। एआईडीएसओ (AIDSO) के सुभाष बट्टदकोप्पा चेतावनी देते हैं, "ये स्कूल खेतिहर मजदूरों और दूर-दराज की लड़कियों से उनके शिक्षा के अधिकार को छीन लेंगे।" सवाल यह है कि क्या सरकारें 'दक्षता' के नाम पर समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) के संवैधानिक वादे को भूलती जा रही हैं? यदि शिक्षा तक पहुंच ही नहीं होगी, तो गुणवत्ता का दावा बेमानी रह जाएगा।


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