टेलीग्राम बैन ने कैसे बढ़ा दिया आईटी एक्ट की ब्लॉकिंग पावर्स का दायरा?

दिल्ली हाई कोर्ट ने नीट-यूजी 2026 की दोबारा परीक्षा के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा टेलीग्राम ऐप पर लगाए गए 6 दिनों के अस्थायी प्रतिबंध को सही ठहराया है।


टेलीग्राम बैन ने कैसे बढ़ा दिया आईटी एक्ट की ब्लॉकिंग पावर्स का दायरा?
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कानून की दुनिया में एक कहावत है कि सिर्फ छह दिनों की पाबंदी भी आने वाले कई सालों के लिए कानून की दिशा तय कर सकती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (19 जून) को केंद्र सरकार के उस आपातकालीन फैसले को सही ठहराया, जिसके तहत पूरे देश में मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम (Telegram) पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया गया था। यह बैन सोमवार (22 जून) तक लागू रहेगा, जो कि 21 जून को होने वाली नीट-यूजी 2026 (NEET-UG 2026) की दोबारा परीक्षा के ठीक एक दिन बाद का समय है।

सरकार का तात्कालिक उद्देश्य बिल्कुल साफ और सीमित था। वह री-नीट परीक्षा से ठीक पहले किसी भी तरह के घोटाले, अफवाहों और फर्जी 'पेपर लीक' के दावों को रोकना चाहती थी ताकि परीक्षा की शुचिता बनी रहे। लेकिन इस फैसले ने एक बड़ा और व्यापक कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या सरकार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) 2000 की धारा 69A के तहत किसी पूरे के पूरे डिजिटल प्लेटफॉर्म को ब्लॉक कर सकती है? और क्या ऐसा पूर्ण प्रतिबंध कानून की नजर में 'आनुपातिकता के सिद्धांत' (Proportionality Test) पर खरा उतरता है? जस्टिस तेजस कारिया ने इन दोनों सवालों का जवाब 'हां' में दिया है। यह फैसला सिर्फ इसके नतीजों के लिए नहीं, बल्कि इसके पीछे दिए गए तर्कों के लिए पढ़ना बेहद जरूरी है।

यह विवाद अचानक या किसी आपातकाल के रूप में शुरू नहीं हुआ था। 21 मई को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को सूचित किया था कि नीट परीक्षा को लेकर टेलीग्राम का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बाद सरकार ने 1 जून को नोटिस जारी किया और 3 जून को टेलीग्राम और एनटीए के साथ बैठक की। 9 जून को सरकार ने टेलीग्राम के साथ संदिग्ध चैनलों, अकाउंट्स और बॉट्स की एक सूची साझा की। टेलीग्राम ने इस पर कार्रवाई करते हुए बताया कि उसने फ्लैग किए गए 1300 यूआरएल (URLs) में से 900 को हटा दिया है।

सरकार का तर्क— क्यों सिर्फ लिंक्स को हटाना नाकाफी था?

टेलीग्राम ने इस बात से कभी इनकार नहीं किया कि उसके प्लेटफॉर्म पर गलत गतिविधियां हो रही थीं। कंपनी का तर्क केवल यह था कि उसने सरकार के साथ पूरा सहयोग किया है और पूरा ऐप ब्लॉक करने का सरकारी कदम बहुत ज्यादा सख्त है। कंपनी ने अदालत को बताया कि वह एआई (AI) और इंसानी निगरानी के जरिए लगातार काम कर रही है। उसने सैकड़ों आपत्तिजनक लिंक हटाए और 150 से अधिक बॉट्स को बंद कर दिया।

लेकिन सरकार इस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं थी। सरकार का मुख्य तर्क टेलीग्राम के काम करने के तरीके (Design) को लेकर था, न कि हटाए गए लिंक्स की संख्या पर। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और सरकारी वकीलों ने तर्क दिया कि टेलीग्राम का ढांचा ऐसा है जो गैरकानूनी नेटवर्कों को उतनी ही तेजी से दोबारा बनने की इजाजत देता है, जितनी तेजी से उन्हें हटाया जाता है। सुनवाई के दौरान टेलीग्राम की तीन अनूठी विशेषताओं को रेखांकित किया गया।

पहला, पैमाना (Scale): टेलीग्राम के एक सिंगल पब्लिक चैनल में दो लाख (2,00,000) तक सदस्य जुड़ सकते हैं। इसका मतलब है कि एक सिंगल पोस्ट पल भर में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है।

दूसरा, ऑटोमेशन (Automation): सरकार ने बताया कि एक अकेला यूजर 40 जितने बॉट्स बना सकता है, जो बिना किसी मानवीय प्रयास के अपने आप संदेशों को फैलाते रहते हैं।

तीसरा, बचाव (Evasion): जब भी किसी बॉट या चैनल को ब्लॉक किया जाता है, तो उसके पीछे के लोग तुरंत एक नया 'मिरर लिंक' या बैकअप बना लेते हैं और सारे दर्शक वहां शिफ्ट हो जाते हैं।

इसके अलावा जांच एजेंसियों के सामने एक बड़ी समस्या यह थी कि टेलीग्राम क्लाउड-आधारित है। यहां यूजर अपने फोन नंबर के बजाय सिर्फ यूजरनेम के पीछे छिप सकते हैं। इस वजह से पुलिस के लिए असली अपराधी तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है। साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने अक्टूबर 2024 से अब तक टेलीग्राम से कम से कम 35 बार सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की थी। आई4सी की रिपोर्ट में सामने आया कि यहां सिर्फ परीक्षा के पेपर ही नहीं, बल्कि मालवेयर और बाल यौन शोषण जैसी सामग्री भी फैलाई जा रही थी। इस पर व्यावहारिक टिप्पणी करते हुए जस्टिस कारिया ने कहा कि एक बार जब परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है, तो उससे होने वाले नुकसान की तुरंत भरपाई करना असंभव हो जाता है।

मैसेज एडिटिंग फीचर और टाइमस्टैम्प का पेंच

इस केस का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू टेलीग्राम का 'मैसेज एडिटिंग' टूल था। टेलीग्राम पर कोई भी यूजर अपने पुराने भेजे गए मैसेज और उसके साथ अटैच फाइल को बदल सकता है, लेकिन उस मैसेज का ओरिजिनल टाइमस्टैम्प (समय और तारीख) वही पुराना रहता है। सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस फीचर का इस्तेमाल 'बैकडेटिंग घोटाले' के लिए किया जाता है।

इस घोटाले के तहत, परीक्षा खत्म होने के बाद कोई जालसाज पुराने मैसेज को एडिट करके उसमें असली क्वेश्चन पेपर डाल देता है। इससे ऐसा भ्रम पैदा होता है कि पेपर परीक्षा से पहले ही लीक हो गया था। सरकार ने बताया कि 2024 में ऐसा हो चुका है। खुद टेलीग्राम के सीईओ पावेल डुरोव ने 16 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक पोस्ट में स्वीकार किया था कि वे इस घोटाले को रोकने के लिए 'Edited' लेबल को अधिक स्पष्ट बनाने पर काम कर रहे हैं। कोर्ट की कमेटी ने इसे खतरे की स्वीकारोक्ति माना। चूंकि इस तकनीकी बदलाव में समय लगना था, इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि 30 जून तक टेलीग्राम का यह एडिटिंग फीचर फ्रीज (अक्षम) रहेगा।

अनुराधा भसीन जजमेंट और आनुपातिकता का सिद्धांत

अदालत में टेलीग्राम ने मुख्य रूप से 'अनुराधा भसीन बनाम भारत सरकार (2020)' और 'मद्रास राज्य बनाम वी.जी. राव (1952)' के ऐतिहासिक मामलों का हवाला दिया। टेलीग्राम का कहना था कि आईटी एक्ट की धारा 69A सरकार को केवल किसी विशिष्ट 'जानकारी' (Information) को ब्लॉक करने का अधिकार देती है, किसी पूरे प्लेटफॉर्म या मध्यस्थ (Intermediary) को नहीं। कंपनी ने दलील दी कि कुछ मुट्ठी भर अपराधियों की सजा 15 करोड़ (150 मिलियन) निर्दोष भारतीय यूजर्स को नहीं दी जा सकती, जो इस ऐप का इस्तेमाल पढ़ाई, बिजनेस और सामान्य बातचीत के लिए करते हैं।

इसके जवाब में देश के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने तीखा तर्क दिया। उन्होंने कहा कि जो प्लेटफॉर्म अपने भीतर जवाबदेही तय करने में असमर्थ है, वह आनुपातिकता की दुहाई नहीं दे सकता। उन्होंने टेलीग्राम की तुलना 'फ्रैंकनस्टीन के मॉन्स्टर' (एक ऐसा जीव जो अपने ही निर्माता के नियंत्रण से बाहर हो जाए) से की। सरकार ने 'रामलीला मैदान मामला (2012)' का भी हवाला दिया, जहां कोर्ट ने माना था कि सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को खतरे की स्थिति में अधिकारी एहतियाती कदम उठा सकते हैं।

अदालत ने इस मामले को सुलझाने के लिए अनुराधा भसीन मामले के चार-भाग वाले टेस्ट को लागू किया:

वैध उद्देश्य (Legitimate Aim): राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की रक्षा करना और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना एक वैध उद्देश्य है।

तार्किक संबंध (Rational Link): परीक्षा धोखाधड़ी के लिए इस्तेमाल हो रहे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना इस उद्देश्य से सीधे जुड़ा है।

आवश्यकता (Necessity): कोर्ट ने माना कि टेलीग्राम के मौजूदा ढांचे के कारण छोटे कदम (लिंक हटाना) बार-बार फेल हो रहे थे।

न्यूनतम प्रतिबंध (Least Restrictive Means): चूंकि यह बैन केवल 6 दिनों के लिए (22 जून तक) है, इसलिए कोर्ट ने इसे संतुलित और कानून के दायरे में माना।

इस फैसले के दूरगामी मायने क्या हैं?

इस फैसले का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक असर यह हुआ कि इसने सूचना (Information) की परिभाषा को व्यापक कर दिया। आईटी एक्ट के तहत कंप्यूटर प्रोग्राम और सॉफ्टवेयर को भी 'सूचना' माना गया है, और चूंकि मोबाइल एप्लीकेशन एक सॉफ्टवेयर है, इसलिए कोर्ट ने माना कि सरकार के पास पूरे ऐप को ब्लॉक करने की शक्ति है।

हालांकि, यह फैसला पूरी तरह से नीट परीक्षा की संवेदनशीलता, कम अवधि (6 दिन) और टेलीग्राम के विशेष तकनीकी ढांचे से बंधा हुआ है। भविष्य में कोई भी सरकार इस फैसले का इस्तेमाल किसी ऐप पर अनिश्चितकालीन या मनमाना बैन लगाने के लिए लाइसेंस के रूप में नहीं कर सकती। सरकार को हर बार धारा 69A के कड़े नियमों और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना होगा। 22 जून को टेलीग्राम से यह ब्लॉक हट जाएगा, लेकिन अदालत द्वारा की गई कानून की यह नई व्याख्या हमेशा के लिए डिजिटल इंडिया के इतिहास में दर्ज रहेगी।

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