
बंगाल चुनाव के बाद बदले समीकरण, जानें- बांग्लादेश की चिंता क्यों बढ़ी?
पश्चिम बंगाल में BJP की जीत के बाद बांग्लादेश में तीस्ता समझौते को लेकर उम्मीद बढ़ी है, लेकिन अवैध घुसपैठ मुद्दे पर चिंता भी गहराई है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की शानदार जीत ने बांग्लादेश में उम्मीद और चिंता—दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। ढाका में यह उम्मीद जताई जा रही है कि पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद लंबे समय से लंबित तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौते को अब लागू किया जा सकता है।
हालांकि दूसरी ओर यह आशंका भी बढ़ी है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं द्वारा बांग्लादेशी “अवैध घुसपैठियों” को लेकर दिया गया राजनीतिक बयान यदि “पुश बैक” नीति में बदलता है और लोगों को वापस बांग्लादेश भेजने की कोशिश होती है, तो इसका कड़ा विरोध होगा और इससे दोनों देशों के संबंधों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अगस्त 2024 में सत्ता से हटने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ गया था। लेकिन अब दोनों देश रिश्तों को सुधारने और सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं।भारत और बांग्लादेश के बीच 4,097 किलोमीटर लंबी बेहद संवेदनशील और खुली सीमा है, जहां से लोगों का एक-दूसरे के देश में आसानी से प्रवेश संभव है। दोनों देशों के बीच गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना समेत 54 से अधिक साझा नदियां भी हैं।
तीस्ता नदी उत्तर बंगाल और उत्तरी बांग्लादेश दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि लाखों लोग सिंचाई, खेती और दैनिक जरूरतों के लिए इसके पानी पर निर्भर हैं।
तीस्ता समझौते पर नई उम्मीद
सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के सूचना सचिव अज़ीज़ुल बारी हेलाल ने उम्मीद जताई है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर तीस्ता जल समझौते को आगे बढ़ाएगी।सितंबर 2011 में तत्कालीन पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ढाका यात्रा का विरोध करते हुए तीस्ता समझौते का विरोध किया था। उसी के बाद से यह समझौता अटका हुआ है क्योंकि कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल सरकार की सहमति के बिना इसे अंतिम रूप नहीं देना चाहता था।
तीस्ता मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों में लंबे समय से संवेदनशील और विवादास्पद विषय बना हुआ है। ढाका में भारत विरोधी समूह अक्सर इस मुद्दे का इस्तेमाल जनभावनाएं भड़काने के लिए करते रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शेख हसीना के बीच अच्छे संबंध होने के बावजूद तीस्ता समझौता लागू नहीं हो पाया। यह शेख हसीना के लिए भी राजनीतिक असहजता का कारण बना क्योंकि वह अपने समर्थकों को यह नहीं समझा पाईं कि भारत के साथ अच्छे रिश्तों के बावजूद समझौता क्यों अटका रहा।
अवैध घुसपैठ को लेकर चिंता
तीस्ता समझौते को लेकर उम्मीद के बीच बांग्लादेश में यह चिंता भी बढ़ रही है कि भारत “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों” के मुद्दे को कैसे संभालेगा। असम और पश्चिम बंगाल चुनावों में भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे को लगातार उठाया था।राजनीतिक विश्लेषक अल्ताफ हुसैन ने प्रोथोम आलो अखबार में लिखा कि “इन दोनों भारतीय राज्यों के चुनाव परिणाम बांग्लादेश के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं।”
बांग्लादेश के विदेश मंत्री खालिलुर रहमान ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पश्चिम बंगाल की नई सरकार के तहत “पुश-इन” की घटनाएं बढ़ती हैं, तो बांग्लादेश भी जवाब देगा।हालांकि बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि ऐसी कोई घटना नहीं होगी।”उन्होंने यह भी बताया कि बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) को सतर्क रहने और किसी भी जबरन घुसपैठ की कोशिश को रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
लंबे समय से विवाद का विषय रहा है घुसपैठ
बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों का मुद्दा लंबे समय से भारतीय सरकारों के लिए चिंता का विषय रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में इसे अधिक आक्रामक और प्रमुख तरीके से उठाया गया।असम में यह मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक अभियान का हिस्सा रहा है और भाजपा ने इसे प्रमुख चुनावी मुद्दा बना दिया। पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी प्रवासियों का सवाल पहले उठता रहा, लेकिन हाल तक कोई दल इसे मुख्य चुनावी मुद्दा नहीं बना पाया था।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे दो मुख्य कारण थे। पहला, पश्चिम बंगाल में पारंपरिक रूप से बड़ी संख्या में बंगाली मुस्लिम आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी, जो अब लगभग 30 प्रतिशत या उससे अधिक मानी जाती है।दूसरा, राजनीतिक दलों को डर था कि बाहरी लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से पारंपरिक बंगाली मुसलमानों की स्थिति प्रभावित हो सकती है और उनका वोट बैंक कमजोर पड़ सकता है।
भाजपा की “अवैध घुसपैठियों” के खिलाफ नीति की आलोचना भी हुई है। आलोचकों का आरोप है कि भाजपा व्यापक तरीके से इस मुद्दे का इस्तेमाल कर पश्चिम बंगाल की मुस्लिम आबादी को निशाना बना रही है।इसके बावजूद हाल के महीनों में राज्य के हिंदू मतदाताओं के बीच बाहरी लोगों के खिलाफ भावना काफी मजबूत हुई है। भाजपा की निर्णायक जीत ने यह संकेत दिया कि इस मुद्दे को जनता का समर्थन मिला।
भारत-बांग्लादेश संबंधों की नई चुनौती
शेख हसीना के सत्ता से जाने और अंतरिम सरकार बनने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में गिरावट आई थी। लेकिन अब BNP सरकार और प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में रिश्तों में सुधार की उम्मीद दिखाई दे रही है।भारत और बांग्लादेश दोनों आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक कारणों से एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण हैं। जहां चीन बांग्लादेश का बड़ा विकास सहयोगी बन चुका है, वहीं भारत की चिंता पाकिस्तान की ढाका में बढ़ती सक्रियता को लेकर रही है।
बांग्लादेश की सीमा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से लगती है, जहां लंबे समय तक अस्थिरता और उग्रवाद की समस्या रही है। पड़ोसी म्यांमार की अस्थिरता भी भारत की चिंताओं को बढ़ाती है।हालांकि चीन का प्रभाव बांग्लादेश में बढ़ा है, लेकिन वह दक्षिण एशियाई देश नहीं है और इसलिए क्षेत्र में भारत की पारंपरिक भूमिका को पूरी तरह चुनौती देना उसके लिए आसान नहीं होगा।बांग्लादेश का नेतृत्व भी इस वास्तविकता को समझता है और भारत के साथ मजबूत और मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहता है। फिलहाल, अवैध प्रवासियों का मुद्दा और लंबित तीस्ता नदी समझौता भारत-बांग्लादेश संबंधों के सामने नई चुनौतियों के रूप में उभरकर सामने आए हैं।

