
ऊर्जा संकट से अर्थव्यवस्था हिली, रुपये पर लगातार दबाव बढ़ा
भारत एक गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है, विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जताते हुए राष्ट्रीय सहमति और त्वरित आर्थिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया है।
“प्रधानमंत्री को देश के प्रधानमंत्री की तरह काम करना चाहिए, न कि सत्तारूढ़ पार्टी के प्रधानमंत्री की तरह।” यह बात प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कही और चेतावनी दी कि भारत का गहराता आर्थिक संकट राष्ट्रीय सहमति की मांग करता है — न कि राजनीतिक दिखावे की।
भारत इस समय होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट से उत्पन्न एक बड़े सप्लाई शॉक (आपूर्ति झटके) से जूझ रहा है, जिसमें कच्चे तेल के आयात, विदेशी मुद्रा भंडार और रुपया—तीनों पर गंभीर दबाव है। इसी पृष्ठभूमि में द फेडरल ने यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ (यूके) के सेंटर फॉर डेवलपमेंट में विजिटिंग प्रोफेसर और आईजेडए इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स, बॉन के रिसर्च फेलो प्रो. संतोष मेहरोत्रा तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार से बातचीत की, ताकि यह समझा जा सके कि भारतीय अर्थव्यवस्था किस संकट से गुजर रही है और सरकार को क्या तत्काल कदम उठाने चाहिए।
73 दिन की देरी पर सवाल
सरकार की प्रतिक्रिया की समयबद्धता पर कड़ी आलोचना हुई है। प्रो. कुमार ने साफ कहा कि जो कदम अब उठाए जा रहे हैं, वे 73 दिन पहले उठाए जाने चाहिए थे।उन्होंने कहा, “हमें शुरुआत से ही इन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए था क्योंकि हमें नहीं पता था कि युद्ध कितने समय चलेगा और आज भी नहीं पता।” यह 73 दिन की अवधि ठीक चुनावी समय से मेल खाती है, जब पेट्रोल पंपों पर लगी कतारें अचानक गायब हो गई थीं।
संकट सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। प्रो. कुमार के अनुसार, वेस्ट एशिया से आने वाले उर्वरक, प्लास्टिक, API (सक्रिय दवा सामग्री) और कई अन्य उत्पाद प्रभावित हुए हैं।उन्होंने कहा, “वेस्ट एशिया से आने वाले 20 प्रतिशत कच्चे तेल और गैस का कोई विकल्प नहीं है।”इसी दौरान भारत 20–30 प्रतिशत रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात कर रहा था, जिससे निजी कंपनियों को भारी मुनाफा हुआ जबकि घरेलू भंडार घटता गया।
ऊर्जा संकट का असर
मार्च में पिछले वर्ष की तुलना में कच्चे तेल का आयात 40 प्रतिशत घट गया। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा संकट गहराया है, जिससे उत्पादन, परिवहन और घरेलू खपत प्रभावित हो रही है।प्रो. कुमार ने कहा, “जब ऊर्जा की कमी होती है, तो उत्पादन, वितरण और उपभोग — सब प्रभावित होते हैं।” श्रमिक शहरों से वापस गांवों की ओर लौट रहे हैं। कई लोगों को रसोई गैस तक उपलब्ध नहीं हो रही।
“विंडफॉल” का गलत उपयोग
प्रो. मेहरोत्रा ने दीर्घकालिक आर्थिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, पिछले दशक में सरकार को वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट का बड़ा लाभ मिला, जिसे बेहतर तरीके से उपयोग किया जा सकता था।उन्होंने कहा कि इसके बजाय सरकार ने “खर्चीली नीति” अपनाई। बुनियादी ढांचे पर खर्च सही था, लेकिन बड़ी मात्रा में धन चुनावी दृष्टि से प्रेरित सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं में चला गया, जबकि स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर अपेक्षित निवेश नहीं हुआ। नतीजतन, राजकोषीय स्थिति बिगड़ती गई कर्ज-से-जीडीपी अनुपात: 56–58% से बढ़कर 82%, कुल कर्ज: 62 लाख करोड़ रुपये (2014) से बढ़कर 230 लाख करोड़ रुपये। इसके अलावा, कॉरपोरेट टैक्स और व्यक्तिगत आयकर में कटौती से लगभग 3 लाख करोड़ रुपये सालाना राजस्व नुकसान हुआ।
विदेशी मुद्रा और राजकोषीय संकट
तेल विपणन कंपनियों को हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा संकट भी गहराता जा रहा है।
प्रधानमंत्री के 7 सुझावों पर विवाद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की कि वे:
विदेशी यात्रा कम करें
पेट्रोल-डीजल का उपयोग घटाएं
एक वर्ष तक सोना न खरीदें
वर्क फ्रॉम होम अपनाएं
खाद्य तेल की खपत कम करें
दोनों अर्थशास्त्रियों ने इन सुझावों की आलोचना की।प्रो. मेहरोत्रा ने कहा कि ये सुझाव मुख्य रूप से अमीर तबके को प्रभावित करते हैं, जबकि गरीबों की स्थिति अलग है।उन्होंने कहा, “यह देश की शीर्ष 1% आबादी से जुड़ी बातें हैं, जिनके पास 41% संपत्ति है, जबकि निचले 50% के पास केवल 6.3% संपत्ति है।”
असली संकट आम जनता के लिए
प्रो. कुमार ने महंगाई का उदाहरण देते हुए स्थिति स्पष्ट की एलपीजी सिलेंडर की कीमत 950 से बढ़कर 5000 रुपए तक है। वास्तविक महंगाई दर 60% तक पहुंच रही है (सरकारी 4% आंकड़े के विपरीत)। उन्होंने कहा कि ग्रामीण रोजगार गारंटी योजनाएं भी कई क्षेत्रों में प्रभावी नहीं हैं, जिससे ग्रामीण परिवारों के पास कोई सुरक्षा कवच नहीं है।
कर और समानता की जरूरत
प्रो. कुमार ने सुझाव दिया कि अमीरों पर अधिक कर लगाया जाना चाहिए। वेल्थ टैक्स, एस्टेट ड्यूटी, गिफ्ट टैक्स। उन्होंने कहा कि असमानता कम किए बिना संकट का समाधान संभव नहीं है।
राष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता
दोनों विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि बिना राष्ट्रीय सहमति के कोई भी नीति प्रभावी नहीं हो सकती। प्रो. कुमार ने कहा, “यदि प्रधानमंत्री विपक्ष पर हमला जारी रखेंगे, तो सहमति कैसे बनेगी?”
आगे की कठिन राह
प्रो. मेहरोत्रा ने सुझाव दिया कि पेट्रोल की कीमतें बढ़ाई जानी चाहिए। डीजल की कीमतों में सावधानी रखनी चाहिए। यूरिया की कीमत बढ़ाई जानी चाहिए। उनके अनुसार यूरिया अत्यधिक सब्सिडी के कारण असंतुलित रूप से उपयोग हो रहा है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और सरकारी बजट दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
दीर्घकालिक समाधान
प्रो. कुमार ने कहा कि भारत को आरएंडडी (अनुसंधान एवं विकास), शिक्षा और स्वास्थ्य, नवीकरणीय ऊर्जा, रणनीतिक ऊर्जा भंडार में निवेश बढ़ाना होगा।उन्होंने चेतावनी दी कि भारत के पास केवल 15 दिन का तेल भंडार है, जबकि चीन के पास 6 महीने का है।
दोनों अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि यदि सरकार निर्णायक कदम नहीं उठाती, तो राजकोषीय घाटा, व्यापार घाटा, रुपया तीनों गंभीर असंतुलन की ओर बढ़ते रहेंगे।प्रो. कुमार ने कहा,“हमें बेहतर की उम्मीद करनी चाहिए, लेकिन सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना होगा — क्योंकि स्थिति और बिगड़ सकती है।”

