फाउंडेशनल AI मॉडल से आगे की सोच, भारत के लिए क्या है सही रास्ता?
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फाउंडेशनल AI मॉडल से आगे की सोच, भारत के लिए क्या है सही रास्ता?

जोहो कॉर्प के सह संस्थापक कुमार वेंबू ने कहा कि भारत AI की दौड़ में पीछे नहीं है। असली चुनौती शिक्षा, नवाचार और जोखिम लेने वाली तकनीकी संस्कृति विकसित करना है।


पिछले लगभग दो वर्षों से भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक सवाल लगातार चर्चा में है—आखिर भारत का अपना फाउंडेशनल AI मॉडल कहां है? जहां अमेरिका ने OpenAI, Anthropic और Google जैसे दिग्गज AI प्लेटफॉर्म तैयार किए हैं, वहीं चीन ने DeepSeek जैसे कम लागत वाले मॉडल के जरिए अपनी क्षमता दिखाई है। ऐसे में भारत अब भी अपने जवाब की तलाश में नजर आता है।

देश में बड़े भाषा मॉडल (Large Language Model) की अनुपस्थिति ने इस चिंता को जन्म दिया है कि कहीं भारत तकनीक के क्षेत्र में वही गलती तो नहीं दोहरा रहा, जो उसने विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और हार्डवेयर सेक्टर में की थी—यानी तकनीक का बड़ा उपभोक्ता बनना, लेकिन उसके मूल प्लेटफॉर्म का मालिक न बन पाना।

हालांकि, Zoho Corp के सह-संस्थापक और जाने-माने निवेशक कुमार वेंबू इस सोच से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि असली सवाल यह नहीं है कि भारत ने अपना फाउंडेशनल मॉडल क्यों नहीं बनाया, बल्कि यह है कि देश को अपनी प्राथमिकताओं को समझते हुए सीमित संसाधनों का सही इस्तेमाल कैसे करना चाहिए।

'भारत ने कोई अवसर नहीं गंवाया'

The Federal के प्रमुख कार्यक्रम Talking Sense With Srini में बातचीत के दौरान वेंबू ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि हमने कोई बस मिस की है।"उन्होंने कहा कि अमेरिका में AI की मौजूदा सफलता के पीछे दशकों तक सार्वजनिक धन से किए गए वैज्ञानिक अनुसंधान की बड़ी भूमिका रही है। भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए उस स्तर का निवेश करना कभी संभव नहीं था।

वेंबू के अनुसार, अब AI की दुनिया बदल चुकी है। अधिकांश वैज्ञानिक सिद्धांत साबित हो चुके हैं और कई तकनीकें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। ऐसे में AI का विकास अब शुद्ध वैज्ञानिक शोध से अधिक इंजीनियरिंग की चुनौती बन गया है, जिसके लिए पहले की तुलना में कम पूंजी की आवश्यकता है।

देर से आने वालों के लिए भी अवसर

भारत में AI को लेकर चिंताएं इसलिए भी बढ़ रही हैं क्योंकि देश का अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर खर्च GDP का केवल लगभग 0.6 प्रतिशत है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है। इसके अलावा अत्याधुनिक कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और GPU तक पहुंच भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। भारत की भाषाई विविधता भी AI मॉडल विकसित करने को और जटिल बनाती है।

इसके बावजूद वेंबू का मानना है कि देर से शुरुआत करने वाले देशों के लिए भी अवसर मौजूद हैं। चीन के DeepSeek मॉडल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इसने साबित किया है कि कम लागत में भी शक्तिशाली AI सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं।उन्होंने कहा, "जब कोई दूसरा यह कर चुका है, तो इसका मतलब है कि आज यह विज्ञान से ज्यादा इंजीनियरिंग की समस्या है। इसके लिए जरूरी ज्ञान सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।"

शिक्षा व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती

कुमार वेंबू का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या पूंजी या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता है।उन्होंने कहा, "हमने मानव प्रतिभा को बर्बाद करने की कला में महारत हासिल कर ली है।" उनके अनुसार, भारत की शिक्षा व्यवस्था क्षमता विकसित करने की बजाय डिग्रियों और प्रमाणपत्रों पर अधिक जोर देती है। छात्र सैद्धांतिक ज्ञान तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन वास्तविक समस्याओं को हल करने और व्यावहारिक कौशल में पीछे रह जाते हैं।

भर्ती के अपने लंबे अनुभव का हवाला देते हुए वेंबू ने कहा कि कई इंजीनियरिंग स्नातक प्रोग्रामिंग की अवधारणाएं तो समझा सकते हैं, लेकिन यह नहीं बता पाते कि उन्होंने वास्तव में क्या बनाया है।उन्होंने कहा, "लोग नौकरी पर आने के बाद ही सब कुछ सीखते हैं। प्रशिक्षण का पूरा बोझ नियोक्ताओं पर आ जाता है।"

AI बहस से असली समस्या छिप रही है

वेंबू का मानना है कि AI मॉडल बनाने की बहस कहीं न कहीं नीति निर्माताओं का ध्यान शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं से भटका रही है।हालांकि तकनीकी आत्मनिर्भरता और विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता को लेकर चिंताएं जायज हैं, लेकिन भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह तकनीक का उपयोग करने वाले लोगों की बजाय समस्या समाधान करने वाली पीढ़ी तैयार कर पाता है या नहीं।

मूलभूत तकनीकों में निवेश की कमी

वेंबू ने इस धारणा पर भी सवाल उठाया कि भारत अचानक फाउंडेशनल AI में विश्व नेता बन सकता है।उन्होंने कहा, "पिछले 40 वर्षों में हमने ऑपरेटिंग सिस्टम, प्रोग्रामिंग लैंग्वेज, प्रोसेसर और अन्य बुनियादी तकनीकों पर पर्याप्त काम नहीं किया। अब AI आने के बाद हम पूछ रहे हैं कि हमने GPU या बड़े मॉडल क्यों नहीं बनाए।"उनके अनुसार, भारत को अपनी वास्तविक ताकत और अवसरों पर ध्यान देना चाहिए।

AI एप्लिकेशन में भारत की मजबूत संभावनाएं

वेंबू का मानना है कि भारतीय तकनीकी कंपनियां ऐतिहासिक रूप से मूलभूत शोध की बजाय एप्लिकेशन आधारित नवाचार में अधिक सफल रही हैं।जैसे-जैसे AI बिजनेस सॉफ्टवेयर और सेवाओं का हिस्सा बनता जा रहा है, भारतीय कंपनियों के लिए इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करने की बड़ी संभावना है।उन्होंने कहा, "लगभग हर स्टार्टअप और हर व्यवसायी AI को एक उपकरण के रूप में देख रहा है।"कंपनियां पहले से ही ग्राहक सेवा को स्वचालित बनाने, उत्पादकता बढ़ाने और सेवाओं का विस्तार करने के लिए मौजूदा AI मॉडलों का उपयोग कर रही हैं।

स्टार्टअप्स के सामने एक और बड़ी समस्या

वेंबू ने भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम की एक बड़ी कमजोरी की ओर भी इशारा किया। उनके मुताबिक भारत में जोखिम लेने वाले ग्राहकों की कमी है।अक्सर बड़ी कंपनियां किसी स्टार्टअप का उत्पाद खरीदने से पहले यह प्रमाण मांगती हैं कि उसे पहले कहीं और सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया है। इससे नए स्टार्टअप्स के सामने "पहले ग्राहक" की समस्या खड़ी हो जाती है।उन्होंने कहा, "अधिकांश ग्राहक कहते हैं कि हम पहले ग्राहक नहीं बनना चाहते। पहले दिखाइए कि कोई और इसका इस्तेमाल कर रहा है।"

क्या होना चाहिए आगे का रास्ता?

वेंबू का सुझाव है कि बड़ी कंपनियों को स्टार्टअप्स के उत्पादों को आजमाने और उन्हें शुरुआती ग्राहक उपलब्ध कराने में भूमिका निभानी चाहिए। इसे कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की तरह देखा जा सकता है।उनका मानना है कि भारत का AI भविष्य केवल अगला ChatGPT बनाने पर निर्भर नहीं करेगा। असली चुनौती शिक्षा व्यवस्था को सुधारने, नवाचार को बढ़ावा देने और तकनीकी कंपनियों को जोखिम लेने के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने की है।

वेंबू ने कहा, "अगर हम शिक्षा पर ध्यान दें और नवाचार के लिए अधिक अवसर पैदा करें, तो हम निश्चित रूप से आगे बढ़ेंगे।"AI क्रांति से पीछे छूटने की चिंता कर रहे भारत के लिए शायद यही सबसे महत्वपूर्ण संदेश है मुद्दा केवल बड़ा भाषा मॉडल बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करने का है जो लगातार नवाचार और समस्या समाधान को बढ़ावा दे सके।

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