
भारतीय नाविकों की मौत पर नरम क्यों पड़ा भारत? अमेरिका पर उठे सवाल
ओमान तट पर अमेरिकी कार्रवाई में तीन भारतीयों की मौत के बाद भारत की सीमित प्रतिक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों ने जवाबदेही की मांग की है।
ओमान के तट के पास भारतीय नाविकों से संचालित तेल टैंकरों को अमेरिकी हमलों का निशाना बनाए जाने और तीन भारतीयों की मौत के बाद भारत की अपेक्षाकृत नरम प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस छवि को झटका पहुंचा सकती है, जिसमें उन्हें स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे मजबूत नेता बताया जाता है, जो अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर कदम उठाने को तैयार रहते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक अक्सर उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह को भारत के खिलाफ गंभीर उकसावों पर कमजोर प्रतिक्रिया देने के लिए निशाना बनाते रहे हैं। लेकिन इस मामले में तीन अलग-अलग घटनाओं में भारतीय नाविकों पर हुए अमेरिकी हमलों के बावजूद न तो प्रधानमंत्री मोदी और न ही उनके किसी कैबिनेट सहयोगी ने सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी की है। प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी केवल विदेश मंत्रालय (MEA) पर छोड़ दी गई।
भारत की नरम प्रतिक्रिया से उठ रहे सवाल
भारत की संयमित प्रतिक्रिया नई दिल्ली की रणनीतिक स्वायत्तता की सीमाओं को लेकर असहज सवाल खड़े करती है।इसमें कोई विवाद नहीं कि अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकत है और भारत को अमेरिकी तकनीक, निवेश और रक्षा सहयोग से काफी लाभ मिलता है। लेकिन मित्रता एकतरफा नहीं हो सकती। भारतीय नाविकों वाले जहाजों पर हेलफायर मिसाइलों का इस्तेमाल कहीं अधिक कड़ी प्रतिक्रिया की मांग करता था।
भारत आमतौर पर पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामक रुख अपनाता है, लेकिन वाशिंगटन के मामले में उसका रवैया कहीं अधिक सावधान नजर आता है।प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की खुली आलोचना से बचना संभवतः दोनों देशों के संबंधों को बनाए रखने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब जी-7 शिखर सम्मेलन में दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात की चर्चा है।
भारत के पास भी अपना प्रभाव है। दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक होने और कुशल मानव संसाधन का प्रमुख स्रोत होने के कारण भारत एक ऐसा साझेदार है जिसकी जरूरत दुनिया को है। अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारतीय नागरिकों के जीवन और हितों को किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बहाने नहीं बदल सकते सच्चाई
कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि कई भारतीय नाविक उन जहाजों पर काम करते हैं जो ईरानी तेल ढोते हैं, लेकिन इससे मूल तथ्य नहीं बदलता कि तीन भारतीय नागरिकों की जान गई है।विडंबना यह है कि भारत और अमेरिका अपने संबंधों को साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त समुद्री आवागमन पर आधारित व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी बताते हैं। ऐसे में कम से कम अमेरिका से माफी की उम्मीद की जा सकती थी, लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया।
ओमान में भारत के पूर्व राजदूत अनिल वाधवा का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति ट्रंप से स्पष्ट कहना चाहिए कि मारे गए भारतीय नाविक कोई “कोलैटरल डैमेज” नहीं थे, बल्कि गलत कार्रवाई के शिकार बने लोग थे, जिसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।उनका मानना है कि भारत को भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर ठोस गारंटी की मांग करनी चाहिए और भारत, अमेरिका तथा ओमान के बीच संयुक्त जांच करानी चाहिए ताकि पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
वाधवा के अनुसार, भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के उल्लंघन के रूप में इस हमले की कड़ी निंदा करनी चाहिए और वाणिज्यिक जहाजों पर अमेरिकी हमलों को तत्काल रोकने की मांग करनी चाहिए।
विदेश मंत्रालय का बयान पर्याप्त था?
इस सप्ताह दूसरी बार भारत में अमेरिकी प्रभारी राजदूत जेसन मीक्स को विदेश मंत्रालय ने तलब किया।शुक्रवार को जारी मंत्रालय के बयान में कहा गया कि ओमान की खाड़ी में भारतीय नाविकों वाले व्यापारिक जहाजों पर अमेरिकी नौसैनिक बलों द्वारा लगातार हमलों के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया गया है, जिनमें तीन भारतीयों की जान जा चुकी है।
भारत ने घातक बल के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई और अमेरिका से भविष्य में नागरिकों की जान की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का आग्रह किया।लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या तीन भारतीय नागरिकों की मौत पर भारत का गुस्सा व्यक्त करने के लिए इससे अधिक मजबूत बयान नहीं दिया जा सकता था?
अमेरिका को जवाब देना चाहिए
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने स्वीकार किया कि उसने पलाऊ ध्वज वाले तेल टैंकर एमटी सेट्टेबेलो के इंजन रूम पर हेलफायर मिसाइलें दागी थीं।यह तथ्य महत्वपूर्ण नहीं है कि जहाज भारतीय ध्वज वाला नहीं था। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कार्रवाई में तीन भारतीय नागरिकों की मौत हुई और अमेरिका को इसका जवाब देना चाहिए।
भारत के पूर्व राजनयिक K P Fabian का कहना है कि यदि किसी जहाज को रास्ता बदलने के लिए मजबूर करना होता है तो आमतौर पर चेतावनी के तौर पर हवा में या जहाज के पास गोली चलाई जाती है।उनके अनुसार, इंजन रूम पर हमला कर वहां आग लगाना सामान्य प्रक्रिया नहीं है, जब तक कि जहाज को गंभीर नुकसान पहुंचाने या उसमें मौजूद लोगों को खतरे में डालने का इरादा न हो।
भारत को और सक्रिय होना चाहिए था
फैबियन का मानना है कि भारत, जो वर्तमान में ब्रिक्स का अध्यक्ष है, को पिछले महीने दिल्ली में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में फंसे हुए जहाजों के लिए मानवीय सहायता मिशन का प्रस्ताव रखना चाहिए था।इस मिशन में डॉक्टरों और नर्सों को शामिल किया जा सकता था ताकि भोजन, दवाओं और अन्य जरूरी सहायता की कमी से जूझ रहे नाविकों की मदद की जा सके।उन्होंने सवाल उठाया कि जब बड़ी संख्या में नाविक भारतीय थे, तब विदेश मंत्रालय ने ऐसी पहल के बारे में क्यों नहीं सोचा।
नागरिकों की सुरक्षा पर दोहरा मापदंड नहीं
यदि कोई सरकार दुनिया भर में भारतीयों की आवाज उठाने का दावा करती है, तो उसे यह चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि किस देश के खिलाफ सवाल पूछे जाएं और किसके खिलाफ नहीं।चाहे वह कोई पड़ोसी देश हो या दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति अमेरिका, भारतीय नागरिकों के जीवन और सुरक्षा से जुड़े मामलों में भारत की प्रतिक्रिया समान रूप से दृढ़ और स्पष्ट होनी चाहिए।

