बदलाव की तलाश में भारत का युवा, क्या पारंपरिक राजनीति खो रही है पकड़?
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बदलाव की तलाश में भारत का युवा, क्या पारंपरिक राजनीति खो रही है पकड़?

भारत का युवा और मध्यम वर्ग बदलाव, नई सोच और बेहतर अवसरों की तलाश में नए राजनीतिक आंदोलनों की ओर आकर्षित हो रहा है। क्या पारंपरिक राजनीति की पकड़ कमजोर पड़ रही है?


के. अन्नामलाई के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से इस्तीफे के बाद तमिलनाडु की राजनीति में उठे झटके अभी भी जारी हैं। उनके पार्टी छोड़ने और नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद राज्य भाजपा के कई पदाधिकारियों ने भी उनका साथ छोड़ दिया। इनमें तमिलनाडु भाजपा के उपाध्यक्ष करु नागराजन, राज्य सचिव सुमति वेंकटेश और कम से कम 14 अन्य पदाधिकारी शामिल हैं। इससे राज्य भाजपा इकाई के भीतर गहरे असंतोष का संकेत मिला है।

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इस घटनाक्रम के प्रभाव को कम करके दिखाने की कोशिश की है, लेकिन अन्नामलाई की नई राजनीतिक पहल अपने अलग कारणों से चर्चा का विषय बन रही है। अपने नए आंदोलन की शुरुआत करते हुए पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने युवाओं और मध्यमवर्गीय परिवारों को विशेष रूप से संबोधित किया और अपनी सोच को "समावेशी राजनीति" के रूप में प्रस्तुत किया।

लता रजनीकांत की पहल

कुछ ही महीने पहले अभिनेता रजनीकांत की पत्नी लता रजनीकांत ने "मक्कल मेडई" नामक एक मंच शुरू किया था, जो बदलाव और जनभागीदारी की बात करता है। स्वयं रजनीकांत ने 2017 में "रजनी मक्कल मंड्रम" नामक संगठन शुरू किया था, जिसे उन्होंने 2021 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए बंद कर दिया।

आर्थिक उदारीकरण, स्टार्टअप्स का बढ़ना, कौशल-आधारित रोजगार और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के विस्तार ने भारतीय युवाओं में नई आकांक्षाएं पैदा की हैं। अवसर तो बढ़े हैं, लेकिन निराशा भी मौजूद है।अन्नामलाई ने 5 जून (शुक्रवार) को भाजपा छोड़कर "वी द लीडर्स" आंदोलन की घोषणा की। इसके एक दिन के भीतर लगभग 14 लाख लोगों ने सक्रिय सदस्य के रूप में इसमें नामांकन कराया।

इनमें से एक 24 वर्षीय स्नातक एस. विमल ने कहा:"मेरा मानना है कि राजनीति में प्रशिक्षण पाने के लिए किसी राजनीतिक आंदोलन में भाग लेना जरूरी है। मैं राजनीति से दूर नहीं रहना चाहता। मैं राजनीतिक व्यवस्था को और समझना चाहता हूं। मेरे जैसे युवा राजनीति में रुचि रखते हैं, लेकिन बहुत कम लोग हमारी भाषा में बात करते हैं।"

"कॉकरोच जनता पार्टी" का उदाहरण

लगभग इसी समय उत्तर भारत में भी एक अलग राजनीतिक घटना देखने को मिली। 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर में कई युवा "कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)" के समर्थन में पहुंचे। जो शुरुआत में सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक अभियान था, वह अब लाखों अनुयायियों वाला बड़ा ऑनलाइन आंदोलन बन चुका है।दिलचस्प बात यह है कि इसका संदेश भी हाल के कई नए राजनीतिक संगठनों जैसा है, जो युवाओं, महत्वाकांक्षी मध्यम वर्ग और पहली बार राजनीति में भाग लेने वालों को आकर्षित करते हैं।

विजय की टीवीके, अन्ना हजारे और केजरीवाल

तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों में सत्ता परिवर्तन की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के बीच अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी "तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके)" गठबंधन सरकार में प्रमुख सत्तारूढ़ दल के रूप में उभरी।एक दशक पहले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी भारी जनसमर्थन मिला था। इसी तरह अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) ने भी तेजी से लोकप्रियता हासिल की, हालांकि बाद के वर्षों में वह राजनीतिक संकटों में घिर गई। फिर भी इन आंदोलनों और पार्टियों को मिली शुरुआती जनउत्साह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सब महज संयोग नहीं है।

"युवा और मध्यम वर्ग सबसे गतिशील वर्ग"

तिरुचिरापल्ली स्थित भारथिदासन विश्वविद्यालय के "सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल एक्सक्लूजन एंड इन्क्लूसिव पॉलिसी" के सहायक प्रोफेसर पी. रामाजयम के अनुसार: "इन सभी आंदोलनों के विषय लगभग एक जैसे हैं। वे बदलाव, समावेशी राजनीति, युवाओं की भागीदारी और यथास्थिति को चुनौती देने की बात करते हैं।"उनका कहना है कि ये समूह युवाओं और मध्यम वर्ग को लक्ष्य बनाते हैं क्योंकि वे समाज के सबसे गतिशील और तेजी से बढ़ते हुए वर्ग हैं।रामाजयम के अनुसार 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग आज देश की सबसे महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय शक्ति है।

उन्होंने कहा:"भारत आज भी दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है। यूरोप, जापान और चीन जैसे वृद्ध होती आबादी वाले समाजों के विपरीत भारत के पास अभी भी जनसांख्यिकीय लाभ (Demographic Advantage) है।"

लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह ताकत अपेक्षाओं के साथ आती है। आर्थिक उदारीकरण, स्टार्टअप संस्कृति, कौशल आधारित रोजगार और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था ने युवाओं में नई महत्वाकांक्षाएं पैदा की हैं। अवसर बढ़े हैं, लेकिन असंतोष भी मौजूद है।रामाजयम का कहना है कि कई युवा मानते हैं कि राजनीतिक फैसले सीधे उनके आर्थिक भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए राजनीतिक आंदोलन स्वयं को उनकी आकांक्षाओं और चिंताओं के समाधान के मंच के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी

युवा मामलों के मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। देश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है, जबकि लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है।

"गहरी राजनीतिक समझ जरूरी"

राजनीतिक समीक्षक और लेखक ए. तमिल सेलवन, जिन्होंने संस्कृति, राजनीति और सामाजिक इतिहास के संबंधों पर व्यापक लेखन किया है, मानते हैं कि युवाओं और मध्यम वर्ग की आकांक्षाएं अब राजनीतिक मंचों पर अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं।

उनके अनुसार:"युवा राजनीति को आकर्षक बनाने का उद्देश्य अक्सर ऐसे लोगों को संगठित करना होता है जिनकी राजनीतिक समझ अभी गहरी नहीं होती।"उन्होंने कहा:"युवा राजनीतिक लामबंदी का बड़ा लक्ष्य बन चुके हैं। कई आंदोलन बदलाव और युवा आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। कुछ टिक सकते हैं, जबकि कुछ थोड़े समय बाद गायब हो सकते हैं।"

हजारे और आप का उदाहरण

तमिल सेलवन ने कहा: "अगर आज आप जनरेशन-ज़ेड के युवाओं से अन्ना हजारे के बारे में पूछें तो संभव है कि कई उन्हें जानते भी न हों। उनके आंदोलन से प्रेरित होकर अरविंद केजरीवाल उभरे, लेकिन आज आम आदमी पार्टी स्वयं संकट का सामना कर रही है।"उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बेरोजगारी, वर्ग राजनीति और अन्य मूलभूत मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक समझ विकसित नहीं की गई, तो ऐसे आंदोलन तेजी से उभरते हैं और उतनी ही तेजी से समाप्त भी हो सकते हैं।

उनका मानना है कि ऐसे आंदोलनों का आकर्षण अक्सर विचारधारा से ज्यादा धारणा (Perception) पर आधारित होता है। राजनीति में पहली बार प्रवेश करने वाले युवा मतदाता परिवर्तन के वादों से आकर्षित हो सकते हैं, बिना यह परखे कि उसके पीछे दीर्घकालिक राजनीतिक दृष्टि क्या है।

शिक्षित, शहरी और डिजिटल मध्यम वर्ग का उदय

विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षित, शहरी और डिजिटल रूप से जुड़े मध्यम वर्ग के विस्तार ने राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है।राजनीतिक टिप्पणीकार ए. मार्क्स के अनुसार:"जब लोगों को लगता है कि स्थापित राजनीतिक व्यवस्था उनकी कुछ अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर रही है, तब नए राजनीतिक समूह उस खाली स्थान को भरने की कोशिश करते हैं। वे सफल होंगे या असफल, यह अलग प्रश्न है। लेकिन उनका आकर्षण आमतौर पर बदलाव चाहने वाले वर्गों की ओर होता है।"

मार्क्स ने ऐसे आंदोलनों का जल्द मूल्यांकन करने से बचने की सलाह दी। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक राजनीति में नए प्रयोगों और नई आवाजों के लिए जगह होनी चाहिए।उनके अनुसार तमिलनाडु में नए राजनीतिक मंचों के उभरने के साथ राज्य के राजनीतिक भविष्य की लड़ाई अब काफी हद तक युवा मतदाताओं और मध्यम वर्गीय परिवारों का ध्यान आकर्षित करने पर केंद्रित होती जा रही है।

उन्होंने कहा: "ये समूह नई राजनीतिक व्यवस्था की नींव बनेंगे या फिर केवल राजनीतिक प्रयोगों के एक और दौर के दर्शक साबित होंगे, यह समय बताएगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस दौर में राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है और इसे स्वीकार करना चाहिए। कुछ लोग इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते और स्वयं को समावेशी राजनीति का योद्धा बताने लगते हैं।"

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