Iran Isreal War: खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी, मजबूरी या सोची-समझी रणनीति?
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Iran Isreal War: खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी, मजबूरी या सोची-समझी रणनीति?

भारत ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर अभी तक कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया। कांग्रेस ने सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं, लेकिन सरकार की इस चुप्पी के मायने क्या हैं?


ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद जहाँ पूरी दुनिया से प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, वहीं भारत की चुप्पी ने देश के भीतर एक नई राजनीतिक और कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। क्या नई दिल्ली को इस घटना की निंदा करनी चाहिए थी? या यह चुप्पी भारत की बदलती विदेश नीति का हिस्सा है?

'The Federal' के शो AI With Sanket में पूर्व राजदूत मीरा शंकर, पश्चिम एशिया विशेषज्ञ डॉ. जाकिर हुसैन और वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी ने इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन

पूर्व राजदूत मीरा शंकर ने इसे कानूनी नजरिए से गलत बताया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर स्पष्ट रूप से किसी देश की संप्रभुता का सम्मान करने की बात करता है। उनके अनुसार, किसी देश का राजनीतिक नेतृत्व चुनना उस देश का आंतरिक मामला है। उन्होंने चेतावनी दी कि लक्षित हत्याओं (Targeted Assassinations) को सैन्य रणनीति के रूप में खुलेआम अपनाना अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए एक खतरनाक मिसाल है।

भारत के सामने धर्मसंकट

भारत की चुप्पी पर शंकर ने कहा कि नई दिल्ली की स्थिति काफी "जटिल" है। एक तरफ भारत के ईरान के साथ पुराने ऐतिहासिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ इजरायल के साथ एक विशेष सामरिक साझेदारी है। साथ ही, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों के साथ भी भारत के गहरे रिश्ते हैं। शायद इसीलिए सरकार तनाव कम करने और बातचीत पर जोर देने के लिए किसी को नाराज नहीं करना चाहती।


विपक्ष का सवाल: क्या यह तटस्थता है?

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने हाल ही में एक लेख में भारत की चुप्पी को "तटस्थता" नहीं बल्कि "जिम्मेदारी से भागना" बताया था। इस पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि भारत ने यूक्रेन युद्ध में भी रूस की निंदा नहीं की थी और केवल बातचीत की सलाह दी थी।

इजरायल की तरफ रणनीतिक झुकाव?

वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत अब स्पष्ट रूप से इजरायल की तरफ झुक गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि भारत अब अपनी पुरानी 'गुटनिरपेक्ष' नीति से दूर हो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या पर भी हम कोई स्टैंड नहीं ले सकते, तो यह तटस्थता नहीं बल्कि एक सीधा संकेत है।

बदलती विदेश नीति और चाबहार पोर्ट

डॉ. जाकिर हुसैन का मानना है कि 2014 के बाद भारत की नीति बदली है। अब भारत नेहरू काल की नीतियों को छोड़कर अमेरिका-इजरायल धुरी के करीब जा रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत अब ईरान के चाबहार पोर्ट के बजाय उन वैकल्पिक रास्तों में अधिक रुचि ले रहा है जो उसके नए वैश्विक भागीदारों के अनुकूल हैं।

नैतिक शक्ति या कूटनीतिक लाभ?

बहस का मुख्य बिंदु यह रहा कि क्या इस चुप्पी से 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के नेता के रूप में भारत का दावा कमजोर होगा? जहाँ पहले भारत नैतिक मूल्यों के आधार पर दुनिया का नेतृत्व करता था, वहीं अब वह सामरिक शक्ति और वित्तीय मजबूती को प्राथमिकता दे रहा है। यह बदलाव भारत के हित में होगा या उसकी छवि को नुकसान पहुँचाएगा, यह तो वक्त ही बताएगा।

(ऊपर दिया गया कंटेंट एक वीडियो से लिया गया है, जिसे एक विशेष रूप से प्रशिक्षित AI मॉडल की मदद से लिखा गया है। सही जानकारी, अच्छी गुणवत्ता और संपादकीय विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रक्रिया अपनाते हैं। इसका मतलब है कि AI पहले ड्राफ्ट तैयार करता है, लेकिन हमारी अनुभवी संपादकीय टीम उसे ध्यान से पढ़ती है, सुधारती है और प्रकाशित करने से पहले बेहतर बनाती है। The Federal में हम AI की तेज़ी और मानव संपादकों के अनुभव को मिलाकर भरोसेमंद और जानकारीपूर्ण पत्रकारिता प्रस्तुत करते हैं।)

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