
अंतरिक्ष में भारत-रूस की नई जुगलबंदी, RD-191 इंजन से लैस होगा LVM3!
भारत 2026 तक अपने 'हेवी-लिफ्ट' लक्ष्यों को तेजी से पूरा करने के लिए रूस के साथ सेमी-क्रायोजेनिक इंजन सौदे को अंतिम रूप देने के करीब...
भले ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपना स्वदेशी सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन विकसित करने की प्रक्रिया में है। लेकिन प्रीमियम अंतरिक्ष एजेंसी अपने 'LVM3' रॉकेट की पेलोड ले जाने की क्षमता को बढ़ाने के लिए रूसी इंजन हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार दिख रही है।
इसरो के सूत्रों के अनुसार, सेमी-क्रायोजेनिक इंजन की सोर्सिंग के लिए अनुबंध का मसौदा (Draft Contract) वर्तमान में अनुमोदन प्रक्रिया में है। इस सौदे में भारत को 'तकनीक हस्तांतरण' (Transfer of Technology) भी शामिल होने की उम्मीद है ताकि इन इंजनों का निर्माण भविष्य में भारत में ही किया जा सके। इसरो के अधिकारियों की एक टीम ने तकनीकी चर्चा के लिए मॉस्को का दौरा किया है। यदि यह सौदा सफल होता है तो यह दूसरी बार होगा, जब भारत अपने रॉकेट की क्षमता बढ़ाने के लिए रूस से इंजन खरीदेगा।
भारत-रूस एयरोस्पेस संबंध: एक नई उड़ान
रूस अपने सेमी-क्रायोजेनिक 'RD-191' रॉकेट इंजन की पेशकश और स्वदेशी निर्माण के लिए तकनीक साझा कर भारत के साथ अपनी एयरोस्पेस साझेदारी को मजबूत करना चाहता है। पिछले साल रॉसकॉस्मॉस (Roscosmos) के महानिदेशक दिमित्री बाकानोव ने संकेत दिया था कि इंजन आपूर्ति के लिए बातचीत जारी है। उन्होंने मानव अंतरिक्ष उड़ान और अंतरिक्ष स्टेशन विकास में भी सहयोग की संभावना जताई।
यह चर्चा 2019 से चल रही है, जब तत्कालीन इसरो अध्यक्ष के. सिवन ने 'मेक-इन-इंडिया' कार्यक्रम के तहत इस तकनीक की पेशकश का उल्लेख किया था। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह 'ब्रह्मोस मिसाइल' कार्यक्रम के बाद भारत-रूस का दूसरा सबसे बड़ा एयरोस्पेस सहयोग होगा।
अधिक थ्रस्ट और पेलोड क्षमता
RD-191 इंजन अत्यंत शक्तिशाली है और यह LVM3 की वहन क्षमता को बढ़ा सकता है। एक उन्नत क्रायोजेनिक चरण के साथ जुड़ने पर, यह रॉकेट को 'जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट' (GTO) में 7 टन तक पेलोड ले जाने में सक्षम बना सकता है।
यह भारत के आगामी मिशनों जैसे 'मानवयुक्त चंद्र मिशन' और अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इनके लिए भारी वजन ले जाने वाले लॉन्च वाहनों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में LVM3 की GTO क्षमता लगभग 4 टन है, जिसे इसरो पहले से ही उन्नत क्रायोजेनिक स्टेज के जरिए 5 टन तक बढ़ाने पर काम कर रहा है।
बजट 2026-27 में विशेष आवंटन
भारत के अंतरिक्ष विभाग ने वर्ष 2026-27 के बजट में रूसी रॉकेट इंजन की खरीद के लिए एक निश्चित राशि आवंटित की है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, कुल 13,705.63 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन में दो नई परियोजनाएं शामिल हैं...
LVM3 की पेलोड क्षमता बढ़ाने के लिए खरीदे गए सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का समावेश।
स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट-2 (SPADEX-2) मिशन।
इसरो का स्वदेशी इंजन: SE2000
दूसरी ओर, इसरो अपने स्वदेशी सेमी-क्रायोजेनिक इंजन 'SE2000' पर भी काम कर रहा है, जो तरल ऑक्सीजन और केरोसिन से संचालित होता है। हालांकि इसकी प्रगति क्रमिक रही है। लेकिन यह कार्यक्रम अब उन्नत चरण में है। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक इस एकीकृत इंजन का 'हॉट टेस्ट' (Hot Test) करने का लक्ष्य रखा गया है।
सेमी-क्रायोजेनिक इंजन के फायदे
ये इंजन केरोसिन का उपयोग करते हैं, जिसे सामान्य तापमान के करीब संग्रहीत किया जा सकता है (तरल हाइड्रोजन के विपरीत, जिसे बहुत कम तापमान की आवश्यकता होती है)।
केरोसिन का घनत्व अधिक होने के कारण ईंधन टैंक छोटे रखे जा सकते हैं और थ्रस्ट दक्षता (Thrust Efficiency) अधिक होती है।
यह प्रणाली परिचालन की दृष्टि से कम जटिल है और वैश्विक स्तर पर इसका व्यापक उपयोग होता है।
स्वदेशी विकास और पेलोड क्षमता में वृद्धि
इसरो का 'लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम सेंटर' (LPSC) वर्तमान में सेमी-क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम और SC120 स्टेज के विकास का नेतृत्व कर रहा है। यह नया चरण LVM3 रॉकेट के वर्तमान L110 चरण की जगह लेगा। तरल ऑक्सीजन और केरोसिन जैसे गैर-विषाक्त प्रणोदकों (Non-toxic propellants) का उपयोग करने वाली यह नई प्रणाली, न केवल उच्च प्रदर्शन प्रदान करने की उम्मीद है। बल्कि यह रॉकेट की पेलोड ले जाने की क्षमता में भी महत्वपूर्ण वृद्धि करेगी।
समय सीमा और बढ़ता दबाव
हालांकि भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए बढ़ती घरेलू और व्यावसायिक मांग के कारण इस परियोजना की समय सीमा (Timelines) पर भारी दबाव पड़ रहा है। भारत वर्तमान में अपने भारी संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए विदेशी लॉन्च प्रदाताओं (जैसे स्पेसएक्स या एरियनस्पेस) पर निर्भर है। इस निर्भरता के कारण देश को न केवल उच्च लागत वहन करनी पड़ती है, बल्कि इससे कई महत्वपूर्ण व्यावसायिक अवसर भी हाथ से निकल जाते हैं।
रणनीतिक अंतरिम समाधान
वर्तमान में LVM3 के लॉन्च ऑर्डर अभी भी छिटपुट (Sporadic) हैं, ऐसे में 'RD-191' इंजन का संभावित अधिग्रहण एक रणनीतिक अंतरिम समाधान (Strategic interim solution) के रूप में कार्य कर सकता है। यह कदम भारत को तब तक अपनी भारी लॉन्च क्षमताओं को बनाए रखने और बढ़ाने में मदद करेगा, जब तक कि स्वदेशी सेमी-क्रायोजेनिक तकनीक पूरी तरह से विकसित और परीक्षणों में सफल नहीं हो जाती।

