
जज का हटने से इनकार, केजरीवाल और हाईकोर्ट के बीच छिड़ी बहस, अब SC करेगा फैसला
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने शराब नीति मामले की सुनवाई से जज के हटने की मांग की थी।
13 अप्रैल को दिल्ली उच्च न्यायालय की एक सुनवाई के दौरान माहौल तब बेहद दिलचस्प और गंभीर हो गया, जब वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने रामायण का प्रसंग छेड़ा। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का प्रतिनिधित्व कर रहे हेगड़े ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के सामने एक रूपक (Analogy) रखा। उन्होंने कहा कि माता सीता को अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्नि से गुजरना पड़ा था, इसलिए नहीं कि भगवान राम को उन पर संदेह था, बल्कि इसलिए क्योंकि समाज की धारणा वैसी थी। हेगड़े का सुझाव था कि एक आधुनिक जज भी उसी स्थिति में हो सकता है, जहाँ उस पर कोई व्यक्तिगत पक्षपात का आरोप नहीं लगा रहा, लेकिन सार्वजनिक धारणा (Public Perception) को देखते हुए उन्हें केस से हट जाना चाहिए।
जस्टिस शर्मा का 'अग्निपरीक्षा' पर पलटवार
20 अप्रैल को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इस पर 115 पन्नों का एक विस्तृत आदेश जारी किया। उन्होंने हेगड़े की इस उपमा को न केवल खारिज किया, बल्कि उसे उलट कर रख दिया। उन्होंने अपने आदेश के समापन खंड में स्पष्ट रूप से शीर्षक दिया—"क्या इस न्यायालय को अग्निपरीक्षा देनी चाहिए?" उन्होंने सवाल किया कि क्या किसी आरोपी के कहने मात्र से एक जज को अग्निपरीक्षा देनी चाहिए? उन्होंने नोट किया कि आरोपी (केजरीवाल और अन्य) को निचली अदालत ने 'डिस्चार्ज' किया है, 'बरी' (Acquit) नहीं।
विवाद की जड़: रिक्यूजल (Recusal) की मांग क्यों?
रिक्यूजल का अर्थ है किसी जज का खुद को किसी मामले से अलग कर लेना। कानून के मुताबिक, आरोपी को वास्तविक पक्षपात साबित करने की जरूरत नहीं होती; केवल यह साबित करना पर्याप्त है कि एक 'तर्कसंगत बाहरी व्यक्ति' के मन में जज की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हो सकता है।
अरविंद केजरीवाल ने स्वयं कोर्ट में पेश होकर जस्टिस शर्मा से हटने का अनुरोध किया था। उन्होंने अपनी आशंकाओं के पीछे चार मुख्य कारण बताए:
वैचारिक पृष्ठभूमि: केजरीवाल का आरोप था कि जस्टिस शर्मा ने 2022 से 2025 के बीच आरएसएस से जुड़े वकीलों के संगठन 'अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद' के चार कार्यक्रमों में शिरकत की थी।
परिवार और हितों का टकराव: जस्टिस शर्मा के बेटे और बेटी केंद्र सरकार के पैनल में वकील हैं। उन्हें काम सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा दिया जाता है, जो इस मामले में सीबीआई की पैरवी कर रहे हैं।
सुनवाई की गति: सीबीआई की अपील सुनने के पहले ही दिन (9 मार्च) जज ने टिप्पणी की थी कि निचली अदालत का डिस्चार्ज ऑर्डर 'प्रथम दृष्टया गलत' लगता है। केजरीवाल का तर्क था कि 40,000 पन्नों के रिकॉर्ड को कुछ ही मिनटों में गलत बता देना निष्पक्षता नहीं है।
फैसलों का पैटर्न: जस्टिस शर्मा ने इस मामले के हर पिछले चरण की सुनवाई की थी। उन्होंने केजरीवाल की गिरफ्तारी को सही ठहराया था, सिसोदिया की जमानत खारिज की थी और केजरीवाल की जमानत याचिका भी। केजरीवाल की दलील थी कि जिस जज ने लगातार उनके खिलाफ फैसला सुनाया हो, वह अंतिम अपील में 'खुले दिमाग' से विचार नहीं कर पाएगा।
न्यायमूर्ति शर्मा का स्पष्टीकरण
जस्टिस शर्मा ने हर चिंता का बिंदुवार जवाब दिया। परिषद के कार्यक्रमों पर उन्होंने कहा कि वे पेशेवर सेमिनार थे, जिनमें कई अन्य जज भी शामिल होते हैं। उनके बच्चों के करियर पर उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि किसी जज के परिवार के मौलिक अधिकार को सिर्फ इसलिए नहीं छीना जा सकता क्योंकि कोई मुवक्किल ऐसा चाहता है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि राजनेताओं के बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, तो जज के बच्चे वकालत क्यों नहीं कर सकते?
9 मार्च की टिप्पणी पर उन्होंने कहा कि वह एक 'अनंतिम' (Provisional) राय थी, जो नोटिस जारी करने के लिए जरूरी थी। वहीं, 'प्रतिकूल आदेशों के पैटर्न' पर उन्होंने उदाहरण दिया कि उन्होंने सह-आरोपी अरुण रामचंद्रन पिल्लई को तीन बार जमानत दी और अमनदीप सिंह ढल्ल को अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज की अनुमति दी।
कानूनी पेच: धारणा बनाम प्रमाण
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'रिक्यूजल' का मानक है। आमतौर पर रिक्यूजल 'धारणा' (Perception) के आधार पर होता है, लेकिन जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में बार-बार 'प्रमाण', 'सबूत' और 'तथ्य' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने पक्षपात का कोई ठोस सबूत नहीं दिया है। कानूनविदों का तर्क है कि धारणा को 'साबित' नहीं किया जा सकता, उसे केवल 'महसूस' किया जाता है। बोझ का यह स्थानांतरण (Shift of Burden) अब सुप्रीम कोर्ट में बहस का मुद्दा बनेगा।
जस्टिस शर्मा का आदेश 2019 के जस्टिस अरुण मिश्रा के उस फैसले से प्रेरित था, जिसमें उन्होंने एक संवैधानिक पीठ से हटने से इनकार कर दिया था। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों मामले अलग हैं। जस्टिस मिश्रा पुराने मामलों के आधार पर चुनौती दिए जा रहे थे, जबकि यहाँ जस्टिस शर्मा उसी मामले के पिछले चरणों के अपने ही फैसलों के आधार पर चुनौती का सामना कर रही हैं।
आदेश की कठोरता और भविष्य की राह
आदेश में केजरीवाल की उन कोशिशों की भी आलोचना की गई जहाँ उनकी टीम ने मामला किसी दूसरी बेंच को ट्रांसफर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। जस्टिस शर्मा ने इसे 'अदालत को गुमराह करने की कोशिश' बताया।
सबसे दिलचस्प बात इस आदेश की लंबाई (115 पन्ने) है। न्यायिक इतिहास में रिक्यूजल के आदेश संक्षिप्त होते रहे हैं। 115 पन्नों का विस्तृत जवाब आरोपी की हर दलील को उसके अपने मैदान पर चुनौती देने जैसा है।
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा। सवाल वही रहेगा—क्या एक ही जज द्वारा लगातार गिरफ्तारी और जमानत खारिज किए जाने के बाद, अंतिम अपील में एक 'तर्कसंगत बाहरी व्यक्ति' को निष्पक्षता पर संदेह होगा या नहीं? जस्टिस शर्मा ने अपनी 'अग्निपरीक्षा' देने से इनकार कर दिया है, अब गेंद देश की सबसे बड़ी अदालत के पाले में है।

