
"लालची जजों को सिस्टम से निकाल फेंको" जस्टिस नागरत्ना का कड़ा संदेश
न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों में वृद्धि पर दूसरे राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है तो 'ऐसे' जजों को सिस्टम से "बाहर" कर देना चाहिए...
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने शनिवार (18 अप्रैल) को कहा कि यदि न्यायाधीश अपने संसाधनों के भीतर रहने में असमर्थ हैं और लालच का शिकार हो जाते हैं, जबकि शीर्ष अदालत ने जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों में वृद्धि पर दूसरे राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग (2nd National Judicial Pay Commission) की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है तो उन्हें सिस्टम से "बाहर (weeded out)" कर दिया जाना चाहिए।
लाइव लॉ द्वारा उद्धृत किए गए उनके बयान के अनुसार, उन्होंने कहा "जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों में पर्याप्त वृद्धि हुई है, जिसका श्रेय वेतन आयोग की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार किए जाने को जाता है।"
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने न्यायाधीशों को "बाहरी दबाव" के प्रति भी आगाह किया और कहा कि वे अपने स्वयं के सहयोगियों से भी इसका सामना कर सकते हैं।
लालच और सहकर्मियों के दबाव के खिलाफ चेतावनी
उन्होंने कहा "ऐसे न्यायाधीश जो अपनी आय के ज्ञात स्रोतों के भीतर रहने में असमर्थ हैं और लालच तथा प्रलोभन का शिकार हो जाते हैं, उन्हें व्यवस्था से बाहर कर दिया जाना चाहिए। मुझे यह भी जोड़ना चाहिए कि न्यायाधीशों को बाहरी दबावों या अपने सहकर्मियों के दबाव से मुक्त होना चाहिए।"
उन्होंने आगे कहा, “उन्हें साहस और स्वतंत्रता विकसित करनी चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई 'तालमेल' (coordination) नहीं हो सकता। एक न्यायाधीश द्वारा लिया गया कलंकित निर्णय उस न्यायाधीश और स्वयं न्यायपालिका पर एक काला धब्बा है। इसलिए आइए हम वादी जनता और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को समझें और उसके प्रति सचेत रहें।”
बेंगलुरु में "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में न्यायपालिका की पुनर्कल्पना" विषय पर आयोजित न्यायिक अधिकारियों के 22वें द्विवार्षिक राज्य स्तरीय सम्मेलन में बोलते हुए, उन्होंने आगे कहा कि उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिला न्यायाधीश अपने कर्तव्यों के निर्वहन में स्वयं को उनके द्वारा संरक्षित और समर्थित महसूस करें।
अनुच्छेद 235 के तहत निष्पक्ष प्रशासन
इसके बाद न्यायमूर्ति नागरत्ना अनुच्छेद 235 के तहत संस्थागत नियंत्रण के प्रश्न की ओर मुड़ीं और जिला न्यायपालिका के भीतर पदोन्नति, पोस्टिंग और स्थानांतरण को संभालने के मामले में उच्च न्यायालयों की कार्यप्रणाली में निरंतरता की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा “जिला स्तर पर न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और मनोबल दोनों को बनाए रखने के लिए उच्च न्यायालयों द्वारा एक निष्पक्ष, पारदर्शी और उत्तरदायी प्रशासन आवश्यक है। मुझे यह भी कहना चाहिए कि जिला न्यायपालिका के साथ व्यवहार करते समय उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री की निष्पक्षता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि किसी भी न्यायिक अधिकारी को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसे केवल इसलिए अधर में छोड़ दिया गया है क्योंकि उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री उनकी वास्तविक शिकायतों को दूर करने के लिए उचित समय पर आवश्यक कदम नहीं उठा रही है।”

