
कैश कांड से इस्तीफे तक, जस्टिस यशवंत वर्मा की पूरी कहानी
नकदी विवाद और जांच के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दिया, उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया की भी चर्चा है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को संबोधित पत्र के जरिए सौंपा है।जस्टिस वर्मा का नाम उस समय चर्चा में आया था जब उनके आवास पर कथित तौर पर नकदी मिलने से जुड़ा विवाद सामने आया था।
इस विवाद के बाद उनका दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में तबादला किया गया था। उनके खिलाफ चल रहे आरोपों को लेकर जांच जारी है। उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को ही हाई कोर्ट के जज के तौर पर शपथ ली थी और अपने कार्यकाल को सम्मान की बात बताया, लेकिन इस्तीफे के पीछे के कारणों का खुलासा नहीं किया। अपने त्यागपत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा कि वे उन कारणों को सार्वजनिक नहीं करना चाहते जिनकी वजह से उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि गहरे दुख के साथ वे तत्काल प्रभाव से अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज और इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश रहे जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा कथित ‘कैश कांड’ मार्च 2025 में सामने आया और देखते ही देखते यह मामला देश की न्यायिक और राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा विवाद बन गया। अंततः 10 अप्रैल 2026 को जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। आइए, इस पूरे घटनाक्रम को क्रमवार समझते हैं—
14 मार्च 2025: आग और कैश कांड का खुलासा
दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना के बाद स्टोर रूम से कथित तौर पर जले हुए 500-500 रुपये के नोटों के बंडल बरामद हुए। बोरे भरकर रखे नोटों की तस्वीरों और वीडियो ने पूरे देश में सनसनी फैला दी।
21–22 मार्च 2025: ट्रांसफर और जांच की शुरुआत
21 मार्च को उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट करने का प्रस्ताव सामने आया।
22 मार्च को तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति गठित की और उन्हें न्यायिक कार्य से दूर रखने का निर्देश दिया। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने कथित कैश से जुड़ा वीडियो भी जारी किया।
23–28 मार्च 2025: जांच तेज, विवाद गहराया
23 मार्च को जांच समिति का औपचारिक गठन हुआ।
24 मार्च को इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
25 मार्च को समिति ने उनके आवास का निरीक्षण किया।
28 मार्च को उन्हें पूछताछ के लिए समन जारी हुआ और FIR की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी।
5 अप्रैल 2025: इलाहाबाद हाई कोर्ट में शपथ
विवाद के बीच जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली, हालांकि उन्हें न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया।
मई 2025: कदाचार की पुष्टि और महाभियोग की मांग
3 मई को सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति ने उन्हें कदाचार का दोषी माना।
5 मई को रिपोर्ट CJI को सौंपी गई।
8 मई को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उनके खिलाफ महाभियोग की मांग की गई, लेकिन वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया।
जुलाई–अगस्त 2025: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
17 जुलाई को जस्टिस वर्मा ने जांच रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
7 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि उनका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता।
संसदीय प्रक्रिया और जांच (2025–2026)
अगस्त 2025 में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की।
जनवरी 2026 में जस्टिस वर्मा ने संसदीय समिति के सामने अपना पक्ष रखा और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
फरवरी 2026 में समिति में बदलाव किया गया और जांच जारी रही।
10 अप्रैल 2026: इस्तीफा
लगातार जांच, न्यायिक टिप्पणियों और महाभियोग की प्रक्रिया के बीच आखिरकार 10 अप्रैल 2026 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
मार्च 2025 में एक आग की घटना से शुरू हुआ यह मामला देश के सबसे बड़े न्यायिक विवादों में बदल गया। जांच, ट्रांसफर, अदालतों की सुनवाई और संसद की कार्यवाही के बाद यह प्रकरण अंततः इस्तीफे पर आकर समाप्त हुआ, लेकिन इसने न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

