PM मोदी डिग्री विवाद: हाई कोर्ट ने तय की अगली तारीख, जानिए कब होगी सुनवाई
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PM मोदी डिग्री विवाद: हाई कोर्ट ने तय की अगली तारीख, जानिए कब होगी सुनवाई

दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (27 अप्रैल) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक (BA) डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग वाली अपीलों पर सुनवाई की। कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) को अपनी आपत्तियां दर्ज करने के लिए अतिरिक्त समय दिया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से जुड़ा विवाद एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट की दहलीज पर है। सोमवार, 27 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई में कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) को उन अपीलों पर अपनी आपत्ति दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है, जिनमें प्रधानमंत्री की डिग्री की जानकारी सार्वजनिक न करने के पिछले आदेश को चुनौती दी गई है।

अदालत की कार्यवाही और DU की दलील

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं (अपीलकर्ताओं) के वकील ने कोर्ट को बताया कि यूनिवर्सिटी को जवाब दाखिल करने के लिए पहले ही काफी समय दिया जा चुका है। पिछली सुनवाई में भी तीन हफ्ते की मोहलत मिली थी, लेकिन अब तक आपत्तियां दर्ज नहीं की गई हैं।

दूसरी ओर, दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि "इस मामले में कुछ भी दम नहीं है" और इसे केवल "सनसनी फैलाने" (Sensationalize) के उद्देश्य से लाया गया है। यूनिवर्सिटी के वकील ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि अगले दो हफ्तों के भीतर जवाब दाखिल कर दिया जाएगा। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त के लिए तय कर दी है।

क्या है पूरा विवाद?

यह कानूनी लड़ाई साल 2016 में शुरू हुई थी जब आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता नीरज ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से उन सभी छात्रों के रिकॉर्ड के निरीक्षण की मांग की थी, जिन्होंने 1978 में बीए (BA) की परीक्षा पास की थी। गौरतलब है कि 1978 वही साल है जब प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक की डिग्री हासिल की थी।

दिसंबर 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी को 1978 के रिकॉर्ड दिखाने का निर्देश दिया गया था। यूनिवर्सिटी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

सिंगल जज का पिछला फैसला

25 अगस्त 2025 को हाई कोर्ट के एक सिंगल जज ने CIC के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें डिग्री दिखाने की बात कही गई थी। जज ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद (Public Office) पर बैठा है, उसकी "व्यक्तिगत जानकारी" को सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं हो जाता।

अदालत ने कहा था कि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना है, न कि "सनसनी फैलाने के लिए मसाला उपलब्ध कराना"। अदालत ने यह भी माना था कि स्नातक की डिग्री किसी सार्वजनिक पद को धारण करने या सरकारी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए कोई अनिवार्य वैधानिक आवश्यकता नहीं है।

अपीलकर्ता कौन हैं?

सिंगल जज के इसी फैसले के खिलाफ अब हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (दो जजों की पीठ) के सामने अपील की गई है। इन अपीलकर्ताओं में आरटीआई कार्यकर्ता नीरज के अलावा आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता संजय सिंह और वकील मोहम्मद इरशाद शामिल हैं। इनका तर्क है कि प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता के बारे में जानना जनता का अधिकार है और इसमें व्यापक सार्वजनिक हित छिपा है।

शिक्षा और निजता पर बहस

यह मामला दो बड़े कानूनी सिद्धांतों के बीच टकराव का केंद्र बन गया है—एक तरफ 'सूचना का अधिकार' (RTI) और दूसरी तरफ 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy)। दिल्ली यूनिवर्सिटी का कहना है कि छात्रों की शैक्षणिक जानकारी 'थर्ड पार्टी इंफॉर्मेशन' होती है और इसे बिना किसी ठोस सार्वजनिक हित के उजागर नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने पहले केंद्रीय गृह मंत्री स्मृति ईरानी की कक्षा 10वीं और 12वीं के रिकॉर्ड्स से जुड़े CIC के आदेश को भी इसी आधार पर रद्द कर दिया था। अब 20 अगस्त को होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि क्या यूनिवर्सिटी को रिकॉर्ड्स दिखाने होंगे या सिंगल जज का फैसला ही बरकरार रहेगा।

फिलहाल, दिल्ली यूनिवर्सिटी को मिली दो हफ्ते की मोहलत ने इस विवाद को कुछ समय के लिए और टाल दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर गरमागरम बहस जारी है, लेकिन कानूनी रूप से गेंद अब DU के पाले में है। अगस्त में होने वाली सुनवाई इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

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