घटिया एबीसी सेंटर्स, तभी बढ़ रहा कुत्तों का आतंक: मेनका
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घटिया एबीसी सेंटर्स, तभी बढ़ रहा कुत्तों का आतंक: मेनका

पशु अधिकार कार्यकर्ता व पूर्व सांसद मेनका गांधी ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का आदेश सही, लेकिन एबीसी सेंटर्स के घटिया रखरखाव और कार्यप्रणाली के कारण गरीब बन रहे कुत्तों का शिकार।


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Maenka Gandhi On Stray Dogs: आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के मंगलवार के कड़े रुख के बाद, देश की जानी-मानी पशु अधिकार कार्यकर्ता और भाजपा नेता मेनका गांधी ने एक चौंकाने वाला जमीनी सच उजागर किया है। उन्होंने शीर्ष अदालत द्वारा आवारा कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और उन्हें शेल्टर होम भेजने की सख्त गाइडलाइन को बरकरार रखने के फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन इसे लागू करने वाले सिस्टम की कड़ी निंदा की। मेनका गांधी ने सीधा आरोप लगाया कि देश भर में आवारा जानवरों की आबादी को नियंत्रित करने वाले 'एबीसी सेंटर्स' को नेताओं-अधिकारियों के रिश्तेदारों में रेवड़ियों की तरह बांट दिया गया है, जो बिना किसी 'तहजीब' और बेहद घटिया तरीके से चलाए जा रहे हैं। इसी प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण बेकसूर गरीब और उनके बच्चे इन कुत्तों का शिकार बन रहे हैं।


"नेताओं-अधिकारियों के रिश्तेदारों को बांट दिए गए एबीसी सेंटर्स"
न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) से बातचीत में पूर्व सांसद मेनका गांधी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के लिए बने नियमों और शेल्टर होम के आदेशों का पालन न होने पर बिल्कुल सही नाराजगी जताई है। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाते हुए कहा:

"हमारा मानना है कि आवारा कुत्तों के लिए एबीसी सेंटर (Animal Birth Control Centers) जरूर बनाए जाएं, लेकिन उन्हें सही तरीके से चलाया जाए, घटिया तरीके से नहीं। तमाम (नेताओं और अधिकारियों के) रिश्तेदारों को ये सेंटर बांट दिए गए हैं, जो इन बेजुबान जानवरों को ठीक से नहीं रखते।"

"पॉश कॉलोनियों से उठाकर गरीब बस्तियों में फेंके जा रहे कुत्ते"
मेनका गांधी ने सोसायटियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन्स (RWA) द्वारा की जाने वाली क्रूरता और लापरवाही को रेखांकित करते हुए कहा कि कुत्तों को उनके मूल इलाके से हटाना ही सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने ग्राउंड रियलिटी बयां करते हुए कहा:

इलाका बदलना गलत: नियमों के खिलाफ जाकर कुत्तों का ऑपरेशन करने के बाद उन्हें पॉश कॉलोनियों से उठाकर गरीब बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में फेंक दिया जाता है।

गरीबों पर हमला: जब कुत्तों का इलाका बदला जाता है, तो वे डरे हुए और आक्रामक हो जाते हैं। इसका खामियाजा उन गरीब लोगों और उनके बच्चों को भुगतना पड़ता है जो सड़कों पर चलते हैं, क्योंकि कुत्ते सबसे ज्यादा उन्हीं को काटते हैं।

चोरी-छिपे उठाना बंद हो: सोसायटियों और आरडब्ल्यूए द्वारा रात के अंधेरे में चोरी-छिपे कुत्तों को उठवाकर इधर-उधर फेंकने का सिलसिला पूरी तरह बंद होना चाहिए। अगर इन्हें अपनी जगह पर रहने दिया जाए, तो सब कुछ ठीक से चलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने एजेंसियों की बेबसी को किया खारिज
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को शेल्टर होम भेजने के अपने पिछले आदेश को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने देश भर के 780 जिलों में एक भी ढंग का शेल्टर न बनने और 54 हजार कॉलेजों, अस्पतालों व रेलवे जैसे बड़े विभागों द्वारा हाथ खड़े कर देने (बेबसी जताने) पर सख्त नाराजगी जताई।

अदालत ने साफ किया कि नागरिकों को 'भयमुक्त जीवन जीने का अधिकार' (Article 21) है और बच्चों-बुजुर्गों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने कुत्तों को पकड़ने और नसबंदी अभियान में लगे नगर निगम के कर्मचारियों को पूरी पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया है ताकि पशु प्रेमियों और एजेंसियों के बीच टकराव को रोका जा सके।


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