पासपोर्ट भी नहीं है आपकी नागरिकता का सबूत,  जानिए फिर कैसे साबित होगा कि आप भारतीय हैं?
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पासपोर्ट भी नहीं है आपकी नागरिकता का सबूत, जानिए फिर कैसे साबित होगा कि आप भारतीय हैं?

विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बड़ा स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि भारतीय पासपोर्ट केवल एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट (यात्रा दस्तावेज) है और इसे भारतीय नागरिकता का अंतिम या अकाट्य कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता।


क्या आप सोचते हैं कि अगर आपके पास भारत सरकार द्वारा जारी किया गया पासपोर्ट है, तो आपकी भारतीय नागरिकता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता? यदि हां, तो आपको अपनी यह धारणा तुरंत बदल लेनी चाहिए। विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्पष्टीकरण जारी किया है। सरकार ने साफ कर दिया है कि एक भारतीय पासपोर्ट कानूनी तौर पर केवल अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने का एक जरिया है। इसे किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम, अकाट्य या एकमात्र standalone (अकेला) सबूत नहीं माना जा सकता है।

विदेश मंत्रालय का यह बयान देश के उन करोड़ों लोगों के लिए एक बड़ी आंखें खोलने वाली खबर है, जो पासपोर्ट को नागरिकता का सबसे बड़ा दस्तावेज मानते आए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भले ही पासपोर्ट जारी करने से पहले बेहद कड़े सुरक्षा और पहचान के टेस्ट किए जाते हैं, फिर भी यह अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाने वाला एक माध्यम मात्र है, नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाणपत्र नहीं।

आखिर क्यों पासपोर्ट नागरिकता का अकाट्य सबूत नहीं है?

विदेश मंत्रालय ने इस फैसले के पीछे बेहद ठोस कानूनी तर्क दिए हैं। पहली बात तो यह है कि पासपोर्ट बुनियादी तौर पर एक 'ट्रैवल डॉक्यूमेंट' के रूप में काम करता है। अगर आप अपने पासपोर्ट के पन्नों को ध्यान से पढ़ेंगे, तो उस पर साफ लिखा होता है कि यह पासपोर्ट भारत सरकार की संपत्ति है। सरकार जब चाहे, किसी भी आपात स्थिति या आदेश के तहत इसे धारक से वापस ले सकती है या सरेंडर करने को कह सकती है।

दूसरी सबसे बड़ी वजह यह है कि पासपोर्ट एक 'डाउनस्ट्रीम दस्तावेज' है। इसका मतलब यह है कि पासपोर्ट खुद किसी बुनियादी रिकॉर्ड के आधार पर बनता है। इसे बनवाने के लिए आप जिन दूसरे पहचान पत्रों (जैसे पैन कार्ड) का इस्तेमाल करते हैं, वे खुद नागरिकता के दस्तावेज नहीं हैं। अदालतें भी इसे नागरिकता के सत्यापन के लिए एक अकाट्य 'रूट डॉक्यूमेंट' (मूल दस्तावेज) नहीं मानती हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अपने एक पुराने फैसले में साफ कहा था कि नागरिकता से जुड़े किसी भी विवाद या सवाल का निपटारा केवल नागरिकता अधिनियम, 1955 के कड़े प्रावधानों के तहत ही किया जा सकता है। केवल पहचान पत्र इसके लिए काफी नहीं हैं।

आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड की असली कानूनी हैसियत क्या है?

इस स्पष्टीकरण के बाद देश के आम नागरिकों के मन में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर उनके पास मौजूद बड़े-बड़े सरकारी कार्ड्स की कानूनी हैसियत क्या है? देश की अदालतों और सरकार ने समय-समय पर इन दस्तावेजों के दायरे को पूरी तरह साफ किया है:

पहचान पत्र: सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) पहले ही अपने ऐतिहासिक फैसलों में कह चुका है कि यह केवल आपकी विशिष्ट पहचान और भारत में रहने का प्रमाण है, इससे नागरिकता का कोई अधिकार नहीं मिलता।

वोटर आईडी कार्ड: यह मुख्य रूप से चुनावों में मतदान करने और आपके स्थानीय निवास को दर्शाने के लिए है। इसे भी नागरिकता का स्वतंत्र सबूत नहीं माना जाता।

पैन कार्ड: यह केवल टैक्स (आयकर) विभाग द्वारा जारी किया गया एक वित्तीय पहचान नंबर है, जिसका नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है।

तो फिर कानूनी रूप से कैसे साबित होगी आपकी भारतीय नागरिकता?

आपको यह जानना बेहद जरूरी है कि भारत में केवल जमीन पर जन्म लेने मात्र से (jus soli) किसी को भी अपने आप नागरिकता नहीं मिल जाती। नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत भारत में नागरिकता मुख्य रूप से आपके जन्म के साल और आपके माता-पिता की कानूनी स्थिति पर तय होती है। कानून की धारा 3 के अनुसार, देश के नागरिकों को तीन अलग-अलग समय के दायरों (विंडोज) में बांटा गया है:

1. 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच जन्मे लोग: यदि आपका जन्म इस समयावधि के बीच भारत में हुआ है, तो आप जन्म से ही भारत के नागरिक हैं। इस स्थिति में आपके माता-पिता की राष्ट्रीयता चाहे जो भी हो, आपका खुद का वैध जन्म प्रमाण पत्र (बर्थ सर्टिफिकेट) ही आपका सबसे प्राथमिक और मजबूत कानूनी सबूत माना जाएगा।

2. 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे लोग: इस अवधि में जन्मे लोगों के लिए नियम थोड़े सख्त हैं। आपके जन्म के समय आपके माता-पिता में से कम से कम किसी एक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है। ऐसे में आपको साबित करने के लिए अपने जन्म प्रमाण पत्र के साथ-साथ अपने माता-पिता के 'लेगेसी डॉक्यूमेंट्स' (जैसे उनके जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल छोड़ने का सर्टिफिकेट या जमीन के पुराने रिकॉर्ड) दिखाने होंगे।

3. 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद जन्मे लोग: इस श्रेणी में नियमों को सबसे ज्यादा कड़ा किया गया है। इस दौरान जन्मे बच्चे के माता-पिता दोनों का भारतीय नागरिक होना जरूरी है। या फिर माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा व्यक्ति अवैध अप्रवासी (illegal immigrant) नहीं होना चाहिए। इसे साबित करने के लिए बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र के साथ माता-पिता की नागरिकता के पुख्ता सरकारी रिकॉर्ड की जरूरत पड़ती है।

साबित करने का जिम्मा सरकार पर नहीं, आप पर है!

भारतीय कानून का एक और सख्त पहलू यह है कि फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 9 के मुताबिक, खुद को भारतीय नागरिक साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (Onus of Proof) हमेशा उस व्यक्ति पर होती है, न कि सरकार पर। यानी अगर कभी आपकी नागरिकता पर सवाल उठता है, तो आपको खुद को भारतीय साबित करने के लिए मूल सरकारी दस्तावेज (Root-Level Documents) पेश करने होंगे। इसके लिए मुख्य रूप से तीन रास्ते हैं:

वैध जन्म प्रमाण पत्र: आपका जन्म प्रमाण पत्र केवल तभी कानूनी रूप से मान्य होगा जब वह 'जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969' के तहत रजिस्टर्ड हो। अगर आपका जन्म प्रमाण पत्र बचपन में नहीं बना था, तो आपको अपने स्थानीय नगर निगम या ग्राम पंचायत से 'नॉन-अवेलेबिलिटी सर्टिफिकेट' (NAC) और फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट के आदेश के जरिए 'डिलीड बर्थ रजिस्ट्रेशन' (विलंबित पंजीकरण) कराना होगा।

डोमिसाइल सर्टिफिकेट (मूल निवास प्रमाण पत्र): यह साबित करता है कि आप किसी राज्य के स्थायी निवासी हैं। इसे आप अपने राज्य के ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल या तहसीलदार कार्यालय से बनवा सकते हैं। इसके लिए आमतौर पर 10 से 15 साल के निरंतर निवास का सबूत (जैसे जमीन की रजिस्ट्री या स्कूल के रिकॉर्ड) देना होता है।

गृह मंत्रालय का नागरिकता प्रमाणपत्र (नियम 29): यह उन लोगों के लिए है जिन्होंने पंजीकरण या नैचुरलाइजेशन (जैसे भारतीय मूल के विदेशी लोग या विदेशी जीवनसाथी) के जरिए नागरिकता हासिल की है। उन्हें गृह मंत्रालय (MHA) के ऑनलाइन पोर्टल के जरिए जिला कलेक्टर की जांच और निष्ठा की शपथ के बाद यह फाइनल सर्टिफिकेट मिलता है।

साफ है कि डिजिटल सुरक्षा और चुनावी सुधारों के इस दौर में अब पहचान पत्र और नागरिकता के दस्तावेजों के बीच का अंतर समझना हर भारतीय के लिए बेहद जरूरी हो गया है।

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