इतिहास से मुगलों को मिटाना क्यों नहीं है इतना आसान?
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इतिहास से मुगलों को मिटाना क्यों नहीं है इतना आसान?

इतिहासकार मणिमुग्ध शर्मा का कहना है कि मुगल भारत की संस्कृति, राजनीति, भाषा और प्रशासन का अहम हिस्सा हैं, जिन्हें इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता।


सच्चे अर्थों में कोई भी राष्ट्रवादी सरकार मुगल साम्राज्य का उत्सव मनाती, क्योंकि हम अक्सर एक बुनियादी गलती करते हैं — हम मुगलों की तुलना अन्य भारतीय शक्तियों से करते हैं, जबकि इतिहासकार उन्हें उनके समय के वैश्विक साम्राज्यों के संदर्भ में देखते हैं। यह कहना है लेखक और इतिहासकार मणिमुग्ध एस शर्मा का। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत ने पानीपत की पहली लड़ाई के 500 वर्ष पूरे होने को याद किया। यह युद्ध बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच लड़ा गया था, जिसमें बाबर विजयी हुआ और मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी। यह अवसर ऐसे दौर में भी आया है जब मुगलों, उनकी विरासत और भारतीय इतिहास में उनके स्थान को लेकर बहस तेज हो गई है।

एक बातचीत में शर्मा ने बताया कि मुगलों ने भारत की राजनीतिक संरचनाओं, सैन्य व्यवस्थाओं, संस्कृति, भाषा और वैश्विक पहचान को किस प्रकार आकार दिया, और क्यों उन्हें इतिहास से मिटाने की कोशिशें गहराई से त्रुटिपूर्ण हैं।

समकालीन भारत में मुगल वंश की भूमिका और योगदान

शर्मा के अनुसार, मुगलों ने भारत के इतिहास, समाज और संस्कृति में असाधारण योगदान दिया। आज भी उत्तर और पश्चिम भारत के विशाल हिस्सों में फैले मुगल स्मारक उस युग की जीवित याद दिलाते हैं। ये स्मारक केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे भारी मात्रा में पर्यटन राजस्व उत्पन्न करते हैं और दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

मुगल प्रभाव भारतीय भोजन, पहनावे, साहित्य और भाषाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मुगल शासन के लगभग 300 वर्षों के दौरान कई भारतीय भाषाओं का विकास हुआ। मुगल राज्य ने विभिन्न भाषाओं के ग्रंथों का फ़ारसी में और फ़ारसी ग्रंथों का अन्य भाषाओं में अनुवाद कराने को प्रोत्साहित किया। बाद में यही ग्रंथ यूरोप पहुँचे, जहाँ उनका अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी में अनुवाद हुआ।

शर्मा कहते हैं कि यदि ये 300 वर्ष भारतीय इतिहास में न होते, तो यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान संभव नहीं हो पाता। उनके अनुसार, किसी भी सच्चे राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को मुगल साम्राज्य की उपलब्धियों को स्वीकार करना चाहिए।इतिहासकार मुगलों की तुलना केवल भारतीय राजवंशों से नहीं करते, बल्कि उस्मानी साम्राज्य, सफ़वीद साम्राज्य, उज़्बेक, फ़्रांसीसी और स्पेनी साम्राज्यों जैसे वैश्विक साम्राज्यों से करते हैं। इस संदर्भ में मुगलों की उपलब्धियाँ असाधारण प्रतीत होती हैं।

शर्मा का कहना है कि मुगल एक अत्यंत भारतीय राजवंश थे। वे यहीं रहे, यहीं मरे और यहीं दफनाए गए। आज भी लोग आसानी से पहले पाँच-छह मुगल बादशाहों के नाम बता सकते हैं, जो अधिकांश अन्य भारतीय राजवंशों के साथ संभव नहीं है। बाबर के आगमन के 500 वर्ष बाद भी मुगलों पर बहस जारी रहना उनकी गहरी ऐतिहासिक उपस्थिति का प्रमाण है।

पानीपत की पहली लड़ाई और सैन्य परिवर्तन

शर्मा बताते हैं कि भारत में बारूद का उपयोग मुगलों से पहले भी हो रहा था। इतिहासकार इक़्तिदार आलम ख़ान ने दिखाया है कि बाबर के आने से पहले भी कई भारतीय राजवंश आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल करते थे।हालाँकि, बाबर की सबसे बड़ी विशेषता थी युद्धक्षेत्र में तोपखाने का प्रभावी उपयोग। 21 अप्रैल 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई में उसने तोपों और बंदूकधारियों का अत्यंत संगठित तरीके से प्रयोग किया। उसने यह रणनीति उस्मानी साम्राज्य से सीखी थी।

बाबर स्वयं अपनी सैन्य पद्धति को “रूमी दस्तूरी” कहता था, जो उस्मानी प्रभाव को दर्शाती है।उसने यूरोपीय शैली के वैगन-लागर ढाँचे को अपनाया, जिसमें गाड़ियों को जंजीरों से बाँधा जाता था। इनके बीच तोपें रखी जाती थीं और पीछे पैदल सैनिक तैनात होते थे, ताकि दुश्मन की घुड़सवार सेना सीधे हमला न कर सके।इसके साथ ही बाबर ने “तुलुग़मा” नामक मध्य एशियाई घुड़सवार रणनीति अपनाई। हल्के घुड़सवार तीरंदाज़ दुश्मन के दोनों किनारों पर लगातार हमला करते, जिससे सेना भीतर की ओर सिमट जाती और फिर भारी हथियारों से लैस घुड़सवार केंद्रीय हमला करते।

हालाँकि भारतीय शक्तियों ने शीघ्र ही इन रणनीतियों को सीख लिया। शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को हराया और अन्य भारतीय शासकों ने भी मुगलों का प्रतिरोध किया। शर्मा का कहना है कि बाबर ने नई तकनीक नहीं लाई, बल्कि पुरानी तकनीकों का अधिक प्रभावी उपयोग दिखाया।

मिश्रित भारतीय संस्कृति का निर्माण

शर्मा बताते हैं कि मुगल किसी खाली सांस्कृतिक भूमि पर नहीं आए थे। उनसे पहले दिल्ली सल्तनत के शासक भी मिश्रित संस्कृति के निर्माण में योगदान दे चुके थे। मुगलों ने इस प्रक्रिया को और व्यापक बना दिया।फ़ारसी पहले से ही दरबारी भाषा थी, लेकिन मुगलों ने भारतीय भोजन, वस्त्र और रीति-रिवाजों को तेज़ी से अपनाया। जब हुमायूँ ने सफ़वीद दरबार में शरण ली, तब शाह तहमास्प ने उनसे भारतीय भोजन की माँग की। हुमायूँ के रसोइयों ने खिचड़ी और दाल खुशका जैसे व्यंजन तैयार किए, जो मुगल खानपान का हिस्सा बन चुके थे।

दूसरी ओर, मुगल अपने साथ मध्य एशियाई प्रभाव भी लाए। ईरान और मध्य एशिया से कलाकार, रसोइये, चित्रकार, राजमिस्त्री और शिल्पकार भारत आए और यहीं बस गए। इससे एक विशिष्ट हिंदुस्तानी या इंडो-फ़ारसी संस्कृति का निर्माण हुआ।मुगलों का साम्राज्य पहले की सल्तनतों से कहीं अधिक विस्तृत था, इसलिए उनकी प्रशासनिक प्रणाली, दरबारी संस्कृति और कला शैली बंगाल, बिहार और अन्य क्षेत्रों तक फैल गई। यहाँ तक कि जो शक्तियाँ मुगलों का विरोध करती थीं, वे भी मुगल परंपराओं को अपनाने लगीं।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी मुगल राजनीतिक संस्कृति से प्रेरित शाही उपाधियों का प्रयोग किया। इसी दौर में दिल्ली हिंदुस्तान के प्रतीकात्मक केंद्र के रूप में उभरी।

यूरोपीय शक्तियों के साथ संबंध

पुर्तगाली भारत में मुगलों से पहले आ चुके थे। 1510 में उन्होंने गोवा पर कब्ज़ा कर लिया था। अकबर के समय तक वे समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण रखते थे और मुगल जहाज़ अक्सर उनकी सुरक्षा पर निर्भर रहते थे।ब्रिटिश बाद में जहाँगीर के शासनकाल में आए। 1615 में सर थॉमस रो मुगल दरबार पहुँचे और व्यापार की अनुमति माँगी। शुरुआत में मुगलों ने अंग्रेज़ों को गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि पुर्तगाली अधिक शक्तिशाली माने जाते थे।परिस्थिति तब बदली जब अंग्रेज़ों ने पुर्तगाली नौसेना को हराया। इसके बाद अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने की अनुमति मिली। आगे चलकर अंग्रेज़ मद्रास और कलकत्ता तक फैल गए।

ब्रिटिश स्वयं को मुगलों का उत्तराधिकारी दिखाने लगे। 1857 तक ईस्ट इंडिया कंपनी नाममात्र के लिए मुगल बादशाह के नाम पर शासन करती रही।

आधुनिक प्रशासन पर मुगल प्रभाव

शर्मा के अनुसार, आधुनिक भारत की प्रशासनिक और राजस्व प्रणालियों में मुगल प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। ब्रिटिशों ने शुरुआती दौर में मुगल ढाँचे को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसी को अपनाया।1830 के दशक तक फ़ारसी प्रशासनिक भाषा बनी रही। भूमि राजस्व प्रणाली भी मुगल पद्धति पर आधारित थी। आज भी बंगाल और असम के कुछ हिस्सों में मुगल प्रशासन से निकले राजस्व शब्दों का उपयोग होता है।

ब्रिटिशों ने एक ओर मुगल प्रशासन से वैधता प्राप्त की, वहीं दूसरी ओर स्वयं को “मुस्लिम अत्याचार” से मुक्ति दिलाने वाला शासक भी बताया। यही दोहरी नीति औपनिवेशिक इतिहास-लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

अकबर और औरंगज़ेब की तुलना

शर्मा का कहना है कि अकबर और औरंगज़ेब की तुलना मुख्यतः औपनिवेशिक सोच की देन है। ब्रिटिशों ने अकबर को “अच्छा मुस्लिम शासक” और औरंगज़ेब को “बुरा मुस्लिम शासक” के रूप में प्रस्तुत किया।लेकिन आधुनिक इतिहासलेखन केवल “महान व्यक्तियों” पर केंद्रित नहीं है। आज इतिहासकार शासन-व्यवस्था, सामाजिक प्रक्रियाओं और संरचनाओं का अध्ययन करते हैं।

अकबर और औरंगज़ेब ने बिल्कुल अलग परिस्थितियों में शासन किया। अकबर साम्राज्य निर्माण के शुरुआती दौर में था और उसे लगातार गठबंधन बनाने पड़े। दूसरी ओर औरंगज़ेब को पहले से स्थापित विशाल साम्राज्य विरासत में मिला।

मंदिर विध्वंस पर बहस

शर्मा मानते हैं कि मंदिर विध्वंस हुआ था। इतिहासकार रिचर्ड ईटन और ऑड्री ट्रश्के ने इस विषय पर विस्तार से लिखा है।हालाँकि, इसे केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। मध्यकालीन भारत में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि वे राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के केंद्र भी थे। किसी प्रतिद्वंद्वी शासक से जुड़े मंदिर को नष्ट करना उसकी राजनीतिक वैधता को कमजोर करने का तरीका था।यह केवल मुस्लिम शासकों तक सीमित नहीं था। कई हिंदू राजाओं ने भी प्रतिद्वंद्वी हिंदू राजवंशों से जुड़े मंदिरों को नष्ट किया।

शर्मा का कहना है कि समकालीन मुसलमानों को सदियों पहले के शासकों के कार्यों के लिए दोषी ठहराना अनुचित है। हर शासक अपने समय की राजनीतिक आवश्यकताओं और मानकों के अनुसार कार्य करता था।

मुगलों को इतिहास से मिटाना क्यों असंभव है

शर्मा के अनुसार, मुगल भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। उनके स्मारक, संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ आज भी भारतीय समाज को प्रभावित करती हैं।यहाँ तक कि मुगलों की आलोचना भी उनकी स्थायी ऐतिहासिक उपस्थिति को दर्शाती है। महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे व्यक्तित्वों की ऐतिहासिक महत्ता भी काफी हद तक मुगल साम्राज्य के विरोध के संदर्भ में समझी जाती है।

शर्मा अंत में कहते हैं कि इतिहास और स्मृति अलग-अलग चीजें हैं। स्मृति राजनीति के साथ बदल सकती है, लेकिन इतिहास अतीत के पुनर्निर्माण की एक अनुशासित प्रक्रिया है। इसलिए मुगलों और भारत को आकार देने में उनकी भूमिका को इतिहास से मिटाना संभव नहीं है।

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