TCS विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, भाजपा की मांग हिंदुओं को मिले नौकरी
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टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (फाइल फोटो)

TCS विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, भाजपा की मांग 'हिंदुओं को मिले नौकरी'

TCS के नासिक ऑफिस में हिंदू महिलाओं से यौन उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण के आरोपों के बाद कानूनी कार्यकर्ताओं ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा। उठाई ये मांग...


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नई दिल्ली: नासिक में स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में धार्मिक धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद, गुरुवार (16 अप्रैल) को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इस याचिका के माध्यम से धोखाधड़ी और छल-कपट के जरिए किए जाने वाले धार्मिक धर्मांतरण पर नियंत्रण पाने के लिए आवश्यक निर्देश देने की मांग की गई है।

यह याचिका नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की एक बीपीओ (BPO) यूनिट में आठ महिला कर्मचारियों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों और जबरन धार्मिक धर्मांतरण के दावों की पृष्ठभूमि में दायर की गई है। इन महिला कर्मचारियों ने कंपनी के भीतर उनके साथ हुए दुर्व्यवहार और धर्म बदलने के लिए डाले गए दबाव के संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी।

जब यह पूरा मामला और इससे जुड़े तथ्य पहली बार सार्वजनिक हुए, तब टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने इस पर संज्ञान लिया था। कंपनी ने कार्रवाई करते हुए अपने नासिक कार्यालय के उन सात अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था, जिन पर ये आरोप लगे थे।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और "कॉर्पोरेट जिहाद" का दावा

इस बीच, महाराष्ट्र की राजनीति में भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। महाराष्ट्र के मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कद्दावर नेता नितेश राणे ने राज्य में "कॉर्पोरेट जिहाद" (Corporate Jihad) के उभरने का दावा किया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि ऐसी "जिहादी गतिविधियों" को रोकने के लिए अब केवल हिंदू उम्मीदवारों को भर्ती करने में प्राथमिकता देना "समय की मांग" है।

भाजपा नेता नितेश राणे ने जोर देकर कहा कि इस तरह की घटनाओं को रोकने और कार्यस्थलों को सुरक्षित बनाने के लिए "हिंदू-प्रथम" (Hindu-first) की नियुक्ति नीति अपनाना आवश्यक हो गया है। उन्होंने निजी क्षेत्र की कंपनियों और उनके भर्ती तंत्र पर सवाल उठाते हुए इसे सुरक्षा और धर्म की रक्षा से जोड़कर पेश किया है।

याचिकाकर्ताओं और कानूनी कार्यकर्ताओं का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही देश भर के कार्यस्थलों पर जबरन धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर अपराधों को रोकने के लिए एक ठोस नीति तैयार की जा सकती है।

नासिक मामले में कानून का शिकंजा कसता जा रहा है। पुलिस ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के कुल आठ कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया है। इन गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों में सात पुरुष कर्मचारी और एक महिला ऑपरेशंस मैनेजर शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, एक अन्य महिला कर्मचारी अभी भी फरार है, जिसकी तलाश पुलिस सरगर्मी से कर रही है।

इसी बीच, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने भी इस मामले का संज्ञान लिया है। आयोग ने बुधवार को घोषणा की कि उसने कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न के कथित मामलों की गहराई से जांच करने के लिए एक 'तथ्य-खोज समिति' (Fact-finding Committee) का गठन किया है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका और संवैधानिक तर्क

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में बेहद गंभीर संवैधानिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि धोखाधड़ीपूर्ण तरीके से किया जाने वाला धार्मिक धर्मांतरण न केवल देश की संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है, बल्कि यह बंधुत्व, मानवीय गरिमा, एकता और राष्ट्रीय अखंडता के लिए भी एक बड़ा संकट है।

अधिवक्ता अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि वे धार्मिक धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए कठोर और दंडात्मक कदम उठाएं।

विशेष अदालतों और कठोर सजा की मांग

याचिका में केंद्र और राज्यों को निम्नलिखित निर्देश देने की भी अपील की गई है...

धार्मिक धर्मांतरण के मामलों से निपटने के लिए विशेष अदालतों (Special Courts) की स्थापना की जाए।

यह घोषित किया जाए कि धोखाधड़ीपूर्ण धर्मांतरण के लिए दी जाने वाली सजा 'निरंतर' (Consecutive) होनी चाहिए, न कि 'समवर्ती' (Concurrent)। इसका अर्थ यह है कि यदि दोषी को अलग-अलग धाराओं में सजा मिलती है, तो वे एक साथ चलने के बजाय एक के बाद एक लागू होनी चाहिए, जिससे सजा की अवधि बढ़ जाए।

अनुच्छेद 25 और मौलिक अधिकारों की व्याख्या

याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार (Right to Freedom of Religion) का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी, बल प्रयोग, जबरदस्ती या धोखे से दूसरों का धर्मांतरण करने का अधिकार मिल जाए।

याचिका के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की आजादी देता है, लेकिन यह अधिकार 'लोक व्यवस्था' (Public Order), 'स्वास्थ्य' (Health) और 'नैतिकता' (Morality) के अधीन है। याचिका में विस्तार से समझाया गया है:

"सभी व्यक्तियों को धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार होगा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी व्यक्तियों को धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार (पूर्ण रूप से) होगा। इसका तात्पर्य है कि धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार हर किसी के लिए स्वतंत्र है। लेकिन इसका प्रयोग पूर्ण रूप से या निरपेक्ष रूप से नहीं किया जा सकता।"

याचिका में आगे कहा गया है कि धर्म के नाम पर कार्य करने की स्वतंत्रता पूर्ण या निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति धर्म के नाम पर वह सब कुछ करने के लिए स्वतंत्र है जो वह चाहता है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हर किसी को धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार तो है। लेकिन यह स्वतंत्रता स्वयं भी उचित प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) के अधीन है।

नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) से जुड़े मामले ने एक ओर जहां कानूनी मोड़ ले लिया है, वहीं दूसरी ओर इस पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पिछली टिप्पणियां और वर्तमान राजनीतिक बयानबाजी इस मुद्दे की संवेदनशीलता को और गहरा रही हैं।

धर्मांतरण एक 'गंभीर मुद्दा': सुप्रीम कोर्ट का रुख

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने धोखाधड़ीपूर्ण धार्मिक धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्यों को कड़े कदम उठाने का निर्देश देने की मांग करते हुए अपनी लंबित याचिका के साथ यह नया आवेदन दायर किया है। गौरतलब है कि साल 2023 में ही शीर्ष अदालत ने इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी। अदालत ने तब अवलोकन किया था कि धार्मिक धर्मांतरण एक अत्यंत 'गंभीर मुद्दा' है, जिसे किसी भी कीमत पर 'राजनीतिक रंग' नहीं दिया जाना चाहिए। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से इस याचिका पर सहायता भी मांगी थी।

'नौकरियों में हिंदुओं को प्राथमिकता': नितेश राणे का कड़ा रुख

नासिक के TCS मामले का हवाला देते हुए, महाराष्ट्र के मत्स्य पालन मंत्री और भाजपा नेता नितेश राणे ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि नौकरियों और रोजगार के अवसरों का दुरुपयोग धार्मिक धर्मांतरण के एक औजार के रूप में किया जा रहा है।

पत्रकारों से बात करते हुए राणे ने कहा, "अगर व्यापार से लेकर कॉर्पोरेट कार्यालयों तक, हर प्लेटफॉर्म का उपयोग विभिन्न प्रकार के 'जिहाद' के माध्यम से हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। तो अब समय आ गया है कि इसका कड़ा जवाब दिया जाए।"

आर्थिक बहिष्कार और हिंदू समुदाय की भावना

मंत्री ने दावा किया कि इस तरह की घटनाओं के कारण हिंदू समुदाय के भीतर एक नई भावना पनप रही है। उन्होंने कहा कि अपने हितों की रक्षा के लिए हिंदू अब केवल अपने ही समुदाय के लोगों के साथ आर्थिक लेन-देन और रोजगार के संबंध रखने की ओर झुक रहे हैं।

नितेश राणे ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कंपनियां जल्द ही ऐसी "जिहादी गतिविधियों" को रोकने के लिए केवल हिंदुओं को काम पर रखने की नीति अपना सकती हैं।

'हिंदू राष्ट्र' और रोजगार पर बयान

राणे ने अपने तर्कों को विस्तार देते हुए आगे कहा, "हम समाज को विभाजित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि जमीनी स्तर पर जो अनुभव हो रहे हैं, उन पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। यदि आजीविका के लिए दिया गया रोजगार धार्मिक धर्मांतरण की ओर मोड़ा जाता है, तो 'हिंदू राष्ट्र' को मजबूत करने के लिए हिंदू उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।"

उन्होंने अंत में जोर देकर कहा कि यदि रोजगार को आजीविका का साधन मानने के बजाय 'जिहाद' भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तो अब इस पर स्टैंड लेने का समय आ गया है।

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