NCERT कार्टून विवाद फिर गरमाया, ‘इम्प्रेशनबल माइंड्स’ पर बहस तेज
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NCERT कार्टून विवाद फिर गरमाया, ‘इम्प्रेशनबल माइंड्स’ पर बहस तेज

एनसीईआरटी किताबों में कार्टून पर फिर विवाद छिड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट और सरकार के ‘इम्प्रेशनबल माइंड्स’ तर्क पर नई बहस शुरू हो गई है।


पिछले सप्ताह सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में कार्टून की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क था कि “प्रभावित होने वाली उम्र” यानी कम उम्र के बच्चों को ऐसे कार्टून नहीं पढ़ाए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भी इस बात पर सहमति जताई कि एनसीईआरटी की किताबों में कार्टूनों की उपयुक्तता की जांच की जानी चाहिए।

इसके लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज इंदु मल्होत्रा (Indu Malhotra) की अध्यक्षता में बनी समिति को यह जिम्मेदारी दी गई है। यह समिति पहले से ही कक्षा 8 की न्यायपालिका से जुड़े अध्याय की समीक्षा कर रही थी, जिस पर फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। अब यही समिति किताबों में शामिल कार्टूनों की भी समीक्षा करेगी।

2012 का शंकर कार्टून विवाद फिर चर्चा में

यह बहस नई नहीं है। लगभग 14 साल पहले, 2012 में भी ऐसा ही विवाद सामने आया था। उस समय कक्षा 11 की राजनीतिक विज्ञान की किताब Indian Constitution at Work में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर पिल्लई का 1949 का एक कार्टून शामिल था।कार्टून में बी आर अंबेडकर एक घोंघे पर बैठे दिखाए गए थे, जबकि जवाहर लाल नेहरु उनके पीछे चाबुक लिए खड़े थे। इस कार्टून को लेकर बड़ा विरोध हुआ।तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने लोकसभा में कहा था कि यह पाठ्यपुस्तक वापस ली जाएगी क्योंकि इसका “प्रभावित होने वाले दिमागों पर असर पड़ सकता है।”आज, 14 साल बाद भी वही शब्दावली दोहराई जा रही है “इम्प्रेशनबल माइंड्स” यानी आसानी से प्रभावित होने वाले युवा मन।

क्या बच्चों को सोचने से बचाया जा रहा है?

मुख्य सवाल यही है कि बच्चों को आखिर किससे बचाया जा रहा है? सोचने से? राजनीतिक बहस से? व्यंग्य से?राजनीतिक मनोविज्ञान में “इम्प्रेशनबल इयर्स हाइपोथीसिस” नाम का एक सिद्धांत है, जिसके अनुसार किशोरावस्था और युवावस्था वह समय होता है जब लोगों की राजनीतिक सोच आकार लेती है। बाद में विचार अधिक स्थायी हो जाते हैं।

1989 में जॉन क्रॉसनिक और डुआने एल्विन के शोध ने इस सिद्धांत को मजबूत आधार दिया। लेकिन यह शोध सरकार के तर्क का समर्थन नहीं करता, बल्कि उसका विरोध करता है। क्योंकि जिस आयु वर्ग को सरकार बचाना चाहती है, वही उम्र राजनीतिक समझ विकसित करने की सबसे महत्वपूर्ण उम्र मानी जाती है।लेख के अनुसार, बच्चों को कार्टून या राजनीतिक व्यंग्य से दूर रखना उन्हें विचार बनाने से नहीं रोकता। वे अपने विचार कहीं और से बना लेंगे सोशल मीडिया, इंटरनेट या बिना किसी शैक्षणिक मार्गदर्शन के।

पाठ्यपुस्तकों का असली काम क्या है?

Indian Constitution at Work पुस्तक 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे के तहत तैयार की गई थी। इसके मुख्य सलाहकार सुहास पल्सिकर और योगेंद्र यादव थे। उन्होंने छात्रों के नाम लिखे पत्र में स्पष्ट कहा था कि किताब में कार्टून “मनोरंजन” के लिए नहीं, बल्कि राजनीति की कमजोरियों, आलोचनाओं और विफलताओं को समझाने के लिए शामिल किए गए हैं। उद्देश्य छात्रों को राजनीति के बारे में सोचना सिखाना था।लेख में कहा गया है कि किसी भी गंभीर लोकतंत्र में पाठ्यपुस्तकों का काम कठिन सवालों से बचाना नहीं, बल्कि छात्रों को उनके बारे में सोचने के लिए तैयार करना होता है।

हर कार्टून समान नहीं होता

हर कार्टून उचित नहीं होता। कुछ कार्टून आहत भी कर सकते हैं। 2012 में दलित संगठनों ने शंकर कार्टून पर आपत्ति जताई थी क्योंकि बिना संदर्भ के इसे संविधान निर्माता आंबेडकर का मजाक समझा जा सकता था।लेकिन लेखक के अनुसार, समाधान कार्टून हटाना नहीं था, बल्कि बेहतर संदर्भ देना था — जैसे एक विस्तृत कैप्शन, शिक्षक के लिए नोट्स या छात्रों के लिए चर्चा आधारित अभ्यास।

अदालतों ने भी व्यंग्य की आजादी को माना

2019 में Indibility Creative Pvt Ltd बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस D. Y. Chandrachud ने व्यंग्य को संवैधानिक रूप से संरक्षित अभिव्यक्ति बताया था।इसी तरह 2020 में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस G. R. Swaminathan ने कहा था कि कानून एक “संतुलित व्यक्ति” की कल्पना करता है, न कि अत्यधिक संवेदनशील व्यक्ति की। तर्क है कि अगर वयस्क नागरिकों पर यह भरोसा किया जा सकता है, तो युवाओं पर क्यों नहीं?

क्या राज्य तय करेगा बच्चे क्या पढ़ें?

एक बड़ा संवैधानिक सवाल है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस विचार पर आधारित है कि पाठ्यक्रम तय करने में सरकार अंतिम निर्णायक नहीं होनी चाहिए। इसलिए पाठ्यक्रम निर्माण को एक स्वायत्त प्रक्रिया माना गया है।लेकिन सॉलिसिटर जनरल के हस्तक्षेप और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया से यह स्वायत्तता कमजोर होती दिख रही है।

“इम्प्रेशनबल माइंड्स” जैसी शब्दावली अब सरकारी सोच का हिस्सा बन चुकी है, जिसका इस्तेमाल बच्चों को कठिन राजनीतिक सवालों और आलोचनात्मक सोच से दूर रखने के लिए किया जा रहा है।इस शब्दावली को अब सरकारी भाषा से हटा देना चाहिए, क्योंकि यह न केवल वैज्ञानिक शोध की गलत व्याख्या करती है, बल्कि भारतीय पाठ्यपुस्तकों को भी लंबे समय से नुकसान पहुंचा रही है।

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