डांसिंग गर्ल से नैतिकता तक, एक तस्वीर ने छेड़ दी राष्ट्रीय बहस
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डांसिंग गर्ल से नैतिकता तक, एक तस्वीर ने छेड़ दी राष्ट्रीय बहस

NCERT की किताब में सिंधु सभ्यता की ‘डांसिंग गर्ल’ मूर्ति की तस्वीर बदलने पर विवाद छिड़ गया। विशेषज्ञों ने इसे इतिहास, महिला स्वायत्तता और सेंसरशिप से जुड़ा मुद्दा बताया।


करीब साढ़े चार हजार वर्षों से वह एक हाथ कमर पर टिकाए, ठुड्डी ऊंची किए और कंधों तक चूड़ियां पहने आत्मविश्वास के साथ खड़ी है। उसका व्यक्तित्व किसी पुरातात्विक अवशेष से अधिक आधुनिक प्रतीत होता है। उसके आसपास साम्राज्य बने और बिखरे, धर्मों का उदय हुआ और वे समय के साथ बदलते गए। वह धरती के नीचे दफन रहने, औपनिवेशिक दौर की खुदाई, संग्रहालयों की प्रदर्शनी और पीढ़ियों के स्कूली बच्चों की जिज्ञासु निगाहों से बच गई। लेकिन जिस चीज़ से वह शायद नहीं बच पाई, वह है 21वीं सदी की तथाकथित “शालीनता”।

हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने अपनी एक पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा की तस्वीर में उसके खुले ऊपरी हिस्से को डिजिटल रूप से ढक दिया। यह 10.5 सेंटीमीटर ऊंची कांस्य प्रतिमा 2300 से 1750 ईसा पूर्व के बीच की मानी जाती है। आलोचनाओं के बाद खबरें सामने आईं कि NCERT संशोधित तस्वीर हटाकर मूल तस्वीर को फिर से शामिल करेगा। हालांकि इस कदम ने एक पुरानी राष्ट्रीय बहस को फिर से जगा दिया।

पहली नजर में यह विवाद नग्नता का लगता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि असली मुद्दा कुछ और है। सांस्कृतिक इतिहासकारों और मनोचिकित्सकों के अनुसार यह बहस शक्ति, नियंत्रण और नजरिये की है। सवाल यह है कि देखने का अधिकार किसे है? किसे देखा जाता है? किसी छवि पर नियंत्रण किसका होता है? और आखिर हजारों वर्षों बाद भी एक महिला का शरीर समाज में असहजता और चिंता का कारण क्यों बन जाता है?

पुणे की सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहासकार डॉ. वृंदा बलसारा कहती हैं कि अधिकांश संस्कृतियों में नग्नता को वर्जित माना गया है और यही बात उसे अधिक आकर्षक बनाती है। उनके अनुसार इतिहास बताता है कि अक्सर यह आकर्षण महिलाओं को नियंत्रित करने और उन्हें कमजोर करने की कोशिशों में बदल जाता है। समय बदलता है, लेकिन विवाद का स्वरूप केवल नया रूप धारण कर लेता है। हर पीढ़ी को लगता है कि वह नग्नता पर नई चर्चा कर रही है, जबकि वास्तव में वह नियंत्रण और सत्ता से जुड़ी पुरानी बहस को दोहरा रही होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरी कहानी का केंद्र “नजर” है। इंसान हमेशा से जिज्ञासा, सम्मान, इच्छा, ईर्ष्या, निर्णय और भय के साथ दूसरों को देखता आया है। बदलती हैं तो केवल वे सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं, जो इस नजर को आकार देती हैं।मनोचिकित्सक डॉ. राजेंद्र बर्वे बताते हैं कि बचपन से ही लोगों को सिखाया जाता है कि शरीर के कुछ हिस्सों को छिपाना चाहिए। किशोरावस्था में यह शिक्षा यौन जिज्ञासा से टकराती है और आकर्षण तथा निषेध के बीच एक स्थायी तनाव पैदा हो जाता है।

दरअसल, प्राचीन भारत नग्नता से अपरिचित नहीं था। मध्य प्रदेश के खजुराहो, ओडिशा के कोणार्क और कर्नाटक के बेलूर-हलेबीडु के मंदिरों की मूर्तियां इच्छा, प्रेम और मानवीय शरीर को जिस आत्मविश्वास से प्रस्तुत करती हैं, वह आज भी आधुनिक लगता है।इतिहास बताता है कि जिस चीज़ को समाज जितना छिपाने की कोशिश करता है, वह उतनी ही अधिक चर्चा और आकर्षण का विषय बन जाती है। सेंसरशिप का इतिहास कई मायनों में नैतिकता के आवरण में छिपे आकर्षण का इतिहास है।

आज के आधुनिक समाज भी इसी विरोधाभास से भरे हुए हैं। विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग शरीर और आकर्षण का इस्तेमाल कर अरबों डॉलर कमाते हैं। जूते से लेकर स्मार्टफोन तक बेचने के लिए सुंदरता और शरीर का सहारा लिया जाता है। लेकिन जैसे ही शरीर स्वीकृत दायरों से बाहर दिखाई देता है, समाज असहज हो उठता है।

डॉ. बर्वे कहते हैं कि यह समझने के लिए देखना होगा कि किसे देखा जा रहा है, कौन देख रहा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि छवि पर नियंत्रण किसका है। यहीं “मेल गेज” यानी पुरुष दृष्टि की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।

डॉ. बलसारा के अनुसार महिलाओं को केवल देखा ही नहीं जाता, बल्कि उन्हें खुद को दूसरों की नजरों से देखने के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है। उनका शरीर लगातार निगरानी, मूल्यांकन और निर्णय का विषय बना रहता है। यदि वे बहुत अधिक ढकी हों तो उन्हें दबा हुआ माना जाता है और यदि अधिक दिखाई दें तो उन पर ध्यान आकर्षित करने का आरोप लगाया जाता है।

उनका मानना है कि ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर को ढकना भी महिलाओं के शरीर को नियंत्रित करने की उसी लंबी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें धर्म, सरकारें, स्कूल और परिवार सभी शामिल रहे हैं। भाषा कभी शालीनता, कभी संस्कृति और कभी परंपरा की हो सकती है, लेकिन मूल उद्देश्य नियंत्रण ही रहता है।

यहीं नग्नता और पितृसत्ता की बहस एक-दूसरे से जुड़ती है। समस्या अक्सर नग्न शरीर नहीं होता, बल्कि यह तथ्य होता है कि वह शरीर उस व्यक्ति का अपना है और उस पर उसका अधिकार है।महिला नग्नता पर काम करने वाली फोटोग्राफर एंड्रिया फर्नांडीस मानती हैं कि असली मुद्दा प्रतिनिधित्व और स्वायत्तता का है। उनके अनुसार सवाल यह नहीं है कि महिला नग्न है या नहीं, बल्कि यह है कि उसे किस तरह और किसके द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है।

वह एक महिला के फोटोशूट का उदाहरण देती हैं, जो हाई हील्स, लिंगरी और चमकदार मेकअप के साथ आई थी। उसे लगता था कि आकर्षक दिखने के लिए एक विशेष तरह का प्रदर्शन जरूरी है। लेकिन शूट के दौरान धीरे-धीरे यह दिखावटीपन खत्म हो गया। बाद में उस महिला ने बताया कि उसने तस्वीरें अपने प्रेमी को देने के बजाय खुद के लिए रखने का फैसला किया, क्योंकि पहली बार उसे बिना किसी की स्वीकृति के खुद को सुंदर महसूस हुआ।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार रवि जाधव ने अपनी फिल्म ‘न्यूड’ (2018) में इसी विरोधाभास को दिखाया था। उनका कहना है कि पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं से आकर्षक होने की अपेक्षा करता है, लेकिन इतना नहीं कि वे अपनी आकर्षकता पर खुद नियंत्रण रखने लगें। यही समाज महिलाओं की छवियों से लाभ कमाता है, लेकिन जब महिलाएं अपनी शर्तों पर अपनी पहचान प्रस्तुत करती हैं, तो उनका विरोध करता है।

महिलाओं का शरीर फैशन, विज्ञापन, फिल्म और सोशल मीडिया जैसे विशाल उद्योगों का आधार है। लेकिन जैसे ही महिलाएं अपनी दृश्यता पर अधिकार जताने लगती हैं, समाज असहज हो जाता है। शरीर का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन उसकी स्वायत्तता स्वीकार नहीं की जाती।

पुरुष नग्नता के संदर्भ में यह विरोधाभास और स्पष्ट हो जाता है। लंदन के फोटोग्राफर डायलन रोसर, जो वर्षों से नग्न पुरुषों की तस्वीरें खींच रहे हैं, कहते हैं कि शरीर अपने आप में अश्लील नहीं होता। उसे अर्थ समाज देता है। उनके अनुसार नग्नता यौन हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह अश्लील भी हो।

डॉ. बर्वे भी मानते हैं कि संदर्भ सबसे महत्वपूर्ण है। एक नागा साधु का नग्न शरीर किसी में श्रद्धा, असहजता या उदासीनता जगा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह यौन आकर्षण पैदा करे।इसी तरह अभिनेत्री पूजा भट्ट ने भी कहा था कि यदि आपकी मंशा ईमानदार है तो लोग उसे समझ लेते हैं, और यदि उद्देश्य केवल उत्तेजना पैदा करना है तो वह भी स्पष्ट हो जाता है।

इतिहास गवाह है कि समाज सभी नग्न शरीरों को एक समान नहीं देखता। स्तनपान कराती मां, एक साधु, पुरातात्विक मूर्ति, शास्त्रीय कला और फैशन फोटोग्राफी — सभी अलग-अलग सांस्कृतिक संदर्भों में रखे जाते हैं। बदलता शरीर नहीं, बल्कि उसके बारे में सुनाई जाने वाली कहानी होती है।

मॉडल और अभिनेता मिलिंद सोमन ने भी इस दोहरे मानदंड का अनुभव किया। 1995 के चर्चित टफ शूज़ विज्ञापन में वह और मधु सप्रे दोनों साथ दिखाई दिए थे, लेकिन सार्वजनिक आलोचना का बड़ा हिस्सा मधु सप्रे पर केंद्रित रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं को दृश्यता की कहीं अधिक सामाजिक कीमत चुकानी पड़ती है।

फोटोग्राफरों का कहना है कि कई महिलाएं वर्षों की आत्म-निगरानी के साथ उनके पास आती हैं। वे अपने शरीर की हर कमी और हर कोण को लेकर चिंतित रहती हैं, क्योंकि समाज ने उन्हें लगातार खुद पर नजर रखने की आदत सिखाई है। पितृसत्ता की सबसे प्रभावी चाल सेंसरशिप नहीं, बल्कि महिलाओं को स्वयं अपना सेंसर बना देना है।

और यही हमें फिर से ‘डांसिंग गर्ल’ की ओर ले जाता है। उसकी तस्वीर को डिजिटल रूप से ढकना प्राचीन सभ्यता के बारे में कम और आधुनिक समाज की असहजता के बारे में अधिक बताता है। यह मान लिया गया कि एक महिला का शरीर केवल एक पुरातात्विक विरासत का हिस्सा नहीं हो सकता। यह पहले से ही उस नजर की कल्पना करता है जो उसे यौन दृष्टि से देख सकती है और फिर समस्या का समाधान उस नजर की जांच करने के बजाय महिला की छवि को नियंत्रित करके खोजता है।

सेंसरशिप असहजता को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे उजागर कर देती है।किसी संग्रहालय में आज भी ‘डांसिंग गर्ल’ वैसी ही खड़ी है जैसी वह हजारों साल पहले थी—निर्भीक, निस्संकोच और हमारी नैतिक घबराहटों से पूरी तरह बेपरवाह।असहजता उसकी नहीं, हमारी है। साढ़े चार हजार साल बाद भी एक ऐसा समाज, जो स्त्री शक्ति की बात करता है, एक महिला को उसके अपने शरीर के साथ सहज देखकर विचलित हो जाता है। शायद यही कारण है कि हम बार-बार उसे ढकने की कोशिश करते हैं।उसे ढकने की जरूरत नहीं है। बल्कि वह आज भी हमें आईना दिखा रही है।

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