विपक्ष में बिखराव से NDA को फायदा, क्या खुलेगा परिसीमन का रास्ता?
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विपक्ष में बिखराव से NDA को फायदा, क्या खुलेगा परिसीमन का रास्ता?

टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) में टूट के बाद एनडीए का संख्याबल बढ़ा है। परिसीमन बिल के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचने की कोशिश तेज हो गई है।


पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति में हाल के घटनाक्रमों ने राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण बदल दिया है। विपक्षी दलों में बढ़ती अंदरूनी कलह, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और शिवसेना (यूबीटी) में कथित टूट तथा कुछ सांसदों के पाला बदलने की अटकलों ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को नया राजनीतिक आत्मविश्वास दिया है।

एनडीए खेमे को उम्मीद है कि संसद के आगामी मानसून सत्र तक उसका संख्याबल इतना मजबूत हो सकता है कि वह परिसीमन (Delimitation) से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंच जाए। हालांकि मौजूदा स्थिति में सरकार अभी भी उस जादुई आंकड़े से कुछ दूरी पर है।

अप्रैल में क्यों गिर गया था परिसीमन विधेयक?

अप्रैल 2026 में महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया से जुड़े परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन (131वां) विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया था।लोकसभा की कुल प्रभावी सदस्य संख्या 543 है, लेकिन तीन सीटें रिक्त होने के कारण प्रभावी संख्या 540 मानी जा रही थी। ऐसे में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 सांसदों का बनता था।

हालांकि 17 अप्रैल 2026 को हुए मतदान के दौरान 12 सांसद अनुपस्थित रहे और केवल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया। इस स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आवश्यक आंकड़ा घटकर 352 वोट रह गया।

मतदान का परिणाम इस प्रकार रहा:

पक्ष में वोट: 298

विपक्ष में वोट: 230

इस तरह सरकार आवश्यक संख्या से 54 वोट पीछे रह गई और विधेयक पारित नहीं हो सका।

टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) से मिला नया समर्थन

अप्रैल की स्थिति को आधार मानें तो तब से राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं। एनडीए को अब कथित तौर पर टीएमसी के 20 सांसदों, शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों यानी कुल 26 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन मिलने की संभावना दिखाई जा रही है। यदि इन सांसदों का समर्थन सरकार को मिलता है तो अप्रैल में रही 54 वोटों की कमी घटकर 28 तक रह जाएगी।

क्या डीएमके बन सकती है गेमचेंजर?

एनडीए की नजर अब तमिलनाडु की राजनीति पर भी टिकी हुई बताई जा रही है।राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि केंद्र सरकार और डीएमके के बीच संवाद जारी है। यदि डीएमके परिसीमन के मुद्दे पर अपना रुख बदलती है और समर्थन देती है, तो उसके 22 सांसदों का सहयोग सरकार के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है।ऐसी स्थिति में लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का अंतर घटकर केवल 6 सांसदों तक रह सकता है।हालांकि डीएमके ने आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है, इसलिए फिलहाल यह राजनीतिक अटकलों के दायरे में ही है।

छोटे दलों पर भी एनडीए की नजर

सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार एनडीए को भरोसा है कि विपक्षी गठबंधन के भीतर असंतोष का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है।कुछ छोटे और क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जो परिस्थितियों के अनुसार अपना रुख बदल सकते हैं। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के कुछ दलों पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर बनी हुई है।अगर इनमें से कुछ दल सरकार के पक्ष में आते हैं तो लोकसभा में बहुमत का गणित और आसान हो सकता है।

राज्यसभा में क्या है स्थिति?

लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी एनडीए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटा हुआ है।राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 है। दो-तिहाई बहुमत के लिए यहां 164 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है।हालांकि हाल ही में टीएमसी के तीन सांसदों के इस्तीफे के बाद प्रभावी संख्या घट गई है, जिससे दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा घटकर 162 हो गया है।मौजूदा समय में एनडीए के पास लगभग 150 सांसदों का समर्थन माना जा रहा है।यदि डीएमके के 8 राज्यसभा सांसद भी सरकार के पक्ष में आते हैं तो एनडीए की संख्या 158 तक पहुंच सकती है।ऐसी स्थिति में सरकार दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से केवल 4 सांसद दूर रह जाएगी।

राज्यसभा चुनाव भी बदल सकते हैं तस्वीर

18 जून 2026 को होने वाले राज्यसभा चुनावों के बाद भी उच्च सदन का गणित बदल सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के बाद एनडीए की संख्या घटने की संभावना कम है। यदि गठबंधन कुछ अतिरिक्त सीटें हासिल कर लेता है तो राज्यसभा में उसका लक्ष्य और आसान हो सकता है।ऐसे में सरकार के लिए कुछ छोटे दलों या निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटाकर आवश्यक संख्या तक पहुंचना मुश्किल नहीं माना जा रहा।

क्या मानसून सत्र में बदलेगा राजनीतिक गणित?

फिलहाल स्पष्ट है कि अप्रैल की तुलना में मोदी सरकार की संसदीय स्थिति पहले से अधिक मजबूत हुई है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है।आने वाले हफ्तों में विपक्षी दलों के भीतर होने वाले घटनाक्रम, संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण और राज्यसभा चुनावों के परिणाम यह तय करेंगे कि क्या सरकार वास्तव में परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाती है या नहीं।मानसून सत्र से पहले संसद का यह संख्यात्मक और राजनीतिक गणित देश की राजनीति का सबसे बड़ा विषय बनने जा रहा है।

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