पेपर लीक माफिया के आगे बेबस NTA? छात्रों में गुस्सा बढ़ा
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पेपर लीक माफिया के आगे बेबस NTA? छात्रों में गुस्सा बढ़ा

NEET 2026 पेपर लीक के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई। एक तरफ छात्रों में नाराजगी तो दूसरी तरफ, NTA पर सवाल है।


नीट यूजी 2026 परीक्षा बड़े पैमाने पर पेपर लीक के बाद रद्द होने के कुछ ही दिनों बाद कोचिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष केशव अग्रवाल ने चेतावनी देते हुए कहा, “पेपर लीक माफिया ने फिर से नेटवर्किंग शुरू कर दी है।” लाखों अभ्यर्थियों के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं थी, बल्कि एक बार फिर लौट आया डरावना सपना था।

परीक्षा रद्द होने और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा के बावजूद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) पर छात्रों का भरोसा वापस नहीं लौट पाया है। देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक आयोजित करने की जिम्मेदारी जिस संस्था पर है, वही लगातार सवालों के घेरे में है। इस पूरे मामले को समझने के लिए द फेडरल ने कोचिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष केशव अग्रवाल, विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग के कुलपति प्रो. चंद्र भूषण शर्मा और नीट 2026 अभ्यर्थी शिवम तिवारी से बातचीत की। बातचीत में यह समझने की कोशिश की गई कि आखिर यह समस्या बार-बार क्यों सामने आती है और इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या हो सकता है।

एक छात्र का दर्द

शिवम तिवारी ने 3 मई को परीक्षा देने के बाद जैसे ही राहत की सांस ली, वैसे ही अफवाहें फैलनी शुरू हो गईं। शिवम बताते हैं, “मुझे लगा कि 2024 की तरह लोग मजाक में ऐसा कह रहे होंगे। लेकिन फिर खबरों में आया कि पेपर बहुत बड़े स्तर पर लीक हुआ है।”इसके बाद जो हुआ, उसे शिवम “अचानक लगा सदमा” बताते हैं। दो साल की मेहनत एक झटके में बेकार होती नजर आने लगी। जब परीक्षा पूरी तरह रद्द होने की घोषणा हुई तो उन्होंने दोबारा किताबें निकाल लीं, लेकिन समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर आगे क्या करें।उन्होंने कहा, “दो साल की पढ़ाई के बाद अब फिर से शुरुआत करनी पड़ रही है। मुझे यह समझने में ही दो-तीन दिन लग गए कि आगे क्या करना है।”

शिवम अकेले नहीं हैं। नीट यूजी 2026 में 24 लाख से ज्यादा छात्रों ने परीक्षा दी थी। हर छात्र अपने साथ वर्षों की मेहनत, परिवार की उम्मीदें और आर्थिक त्याग लेकर परीक्षा हॉल में पहुंचा था। लेकिन 2021, 2024, 2025 और अब 2026 — लगातार कई वर्षों में परीक्षा रद्द या विवादित होने से छात्रों का भरोसा टूट चुका है।

‘21 जून समाधान नहीं, सिर्फ प्रतिक्रिया है’

21 जून को होने वाली दोबारा परीक्षा को लेकर केशव अग्रवाल ने साफ कहा कि यह स्थायी समाधान नहीं है। उन्होंने कहा, “21 जून की परीक्षा सिर्फ इस लीक पर प्रतिक्रिया है, कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं। छात्रों के साथ धोखा हुआ है। 4 मई को छात्रों को लगा था कि उनकी सबसे बड़ी परीक्षा खत्म हो गई, लेकिन अगली सुबह पता चला कि कुछ भी खत्म नहीं हुआ।”

उन्होंने यह भी कहा कि दोबारा परीक्षा से पहले ही संदिग्ध गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं। अग्रवाल के मुताबिक, “फिर से मैसेज आने लगे हैं — ‘पेपर चाहिए?’ पेपर लीक माफिया फिर सक्रिय हो गया है। अब लोगों के मन में भरोसे से ज्यादा शक है। लोग NTA को ‘नेशनल ठग एजेंसी’ और ‘नेशनल ट्रॉमा एजेंसी’ कहने लगे हैं।”

प्रो. चंद्र भूषण शर्मा ने भी दोबारा परीक्षा को केवल संकट प्रबंधन बताया। उन्होंने कहा कि सरकार और एजेंसियां इस समस्या को गंभीरता से नहीं ले रही हैं। उनके अनुसार, “अब यह संकेत मिल रहे हैं कि 2025 का पेपर भी उसी नेटवर्क ने लीक किया था। यानी सिर्फ एक नहीं, कई परीक्षा चक्र प्रभावित हुए हैं।”

गलत लोगों के हाथ में जिम्मेदारी

केशव अग्रवाल और प्रो. शर्मा दोनों इस बात पर सहमत दिखे कि NTA का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में है जो परीक्षा प्रणाली की तकनीकी और शैक्षणिक समझ नहीं रखते।अग्रवाल ने कहा, “एक महीने पहले किसी AI बैकग्राउंड वाले व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाता है, जबकि इस परीक्षा का AI या टेक्नोलॉजी से कोई लेना-देना नहीं है।”

प्रो. शर्मा ने इससे भी ज्यादा स्पष्ट शब्दों में कहा, “NTA का डायरेक्टर जनरल ऐसा व्यक्ति है जो अकादमिक नहीं है और मूल्यांकन प्रणाली को नहीं समझता। हर बार किसी IAS अधिकारी को NTA का प्रमुख बना दिया जाता है। यह प्रशासनिक नहीं बल्कि तकनीकी जिम्मेदारी है।”

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वह राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के अध्यक्ष थे, तब राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में परीक्षा केंद्र पूरी तरह रद्द कर दिए गए थे क्योंकि वहां माफिया को नियंत्रित करना मुश्किल था। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या NTA को यह भी नहीं पता कि देश के कौन से इलाके सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं?”

प्रो. शर्मा ने प्रधानमंत्री द्वारा संसद में कही गई उस बात का भी उल्लेख किया जिसमें विशेषज्ञता आधारित नेतृत्व की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। उन्होंने कहा, “आयुष मंत्रालय में आयुर्वेद विशेषज्ञ को सचिव बनाया गया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय में गैर-IAS सचिव हैं और उसका प्रदर्शन बेहतर है। लेकिन NTA पूरी तरह नौकरशाही संस्था बन चुकी है।”

पेपर लीक की असली कड़ी

केशव अग्रवाल ने विस्तार से बताया कि पेपर आखिर लीक कैसे होता है। उन्होंने कहा, “NTA पूरी तरह कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम पर चलता है। टाइपिस्ट बाहर से, पेपर सेट करने वाला बाहर से और प्रिंटर भी बाहर से होता है। इतने सारे छेद होंगे तो पेपर अंदर से बाहर जाएगा ही।”उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि IIT-JEE और UPSC जैसी परीक्षाओं के पेपर शायद ही कभी लीक होते हैं। उन्होंने कहा, “कोचिंग माफिया या पेपर माफिया उन परीक्षाओं का पेपर क्यों नहीं लीक कर पाते? कहीं न कहीं समस्या NTA की व्यवस्था में ही है।”

प्रो. शर्मा ने 2006 की एक घटना का जिक्र किया जब मुंबई में मेडिकल प्रवेश परीक्षा का पेपर प्रिंटिंग चरण में लीक हो गया था। उन्होंने बताया कि CBSE के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक संयम भारद्वाज ने एक सप्ताह के भीतर स्थिति संभाल ली थी। उन्होंने कहा, “व्यवस्था चलाने वाले लोग और सिस्टम दोनों मौजूद हैं, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति नहीं है।”

ऑनलाइन परीक्षा: समाधान या भ्रम?

सरकार ने घोषणा की है कि 2027 से नीट परीक्षा कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) मोड में कराई जाएगी। शिवम तिवारी ने इस विचार का स्वागत किया। उन्होंने कहा, “इससे पेपर लीक की संभावना कम होगी। और CBT में अगर गलती से कोई उत्तर गलत मार्क हो जाए तो उसे बदला जा सकता है, जबकि OMR शीट में ऐसा संभव नहीं होता।”

हालांकि केशव अग्रवाल इससे पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। उन्होंने कहा, “देश के हर हिस्से में अभी इतनी मजबूत इंटरनेट और तकनीकी व्यवस्था नहीं है कि परीक्षा बिना गड़बड़ी के हो सके। बाहर बैठे हैकर्स सिस्टम हैक कर सकते हैं। 24 लाख छात्रों की ऑनलाइन परीक्षा एक दिन में कराना भी संभव नहीं, इसमें 15-20 दिन लगेंगे।”

प्रो. शर्मा ने भी माना कि भारत को भविष्य में पूरी तरह ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली की ओर जाना चाहिए, लेकिन फिलहाल आधारभूत ढांचा तैयार नहीं है। उन्होंने बताया कि NIOS में ऑन-डिमांड परीक्षा के दौरान केवल 65 केंद्रों पर भी नेटवर्क और बिजली की समस्याएं आई थीं।

‘बिग बॉस हाउस’ जैसा समाधान

केशव अग्रवाल ने पेपर लीक रोकने के लिए एक अनोखा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि पेपर तैयार करने वाले लोगों को परीक्षा से 15 दिन पहले पूरी तरह सुरक्षित और निगरानी वाले स्थान पर रखा जाए, जहां उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क न हो।उनका सुझाव था कि प्रश्नपत्र परीक्षा वाले दिन ही, परीक्षा केंद्र पर, परीक्षा शुरू होने से एक घंटे पहले प्रिंट किया जाए।

उन्होंने कहा, “जो लोग पेपर बना रहे हैं, वे उसी जगह बंद रहेंगे। कोई बाहर नहीं जाएगा। पेपर डेढ़ घंटे पहले तैयार होगा और तब तक छात्र परीक्षा हॉल में बैठ चुके होंगे। अगर लीक भी हुआ तो जाएगा कहां? इस्तेमाल कौन करेगा?”उनके अनुसार, “असल लीक प्रिंटिंग और ट्रांसपोर्ट के दौरान होता है। इस मॉडल से दोनों को न्यूनतम किया जा सकता है।”

सीटें बढ़ाने की जरूरत

सभी विशेषज्ञ इस बात पर सहमत दिखे कि समस्या का असली समाधान सिर्फ परीक्षा प्रणाली सुधारना नहीं, बल्कि सरकारी मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ाना भी है।केशव अग्रवाल ने कहा, “60 हजार सरकारी सीटों के लिए 24 लाख छात्र प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यही इस पूरे संकट की जड़ है। CLAT जैसी परीक्षाएं इसलिए लीक नहीं होतीं क्योंकि वहां दांव इतना बड़ा नहीं है। पिछले आठ वर्षों में पर्याप्त सीटें नहीं बढ़ाई गईं।”

प्रो. शर्मा ने सुझाव दिया कि IIT-JEE की तरह नीट में भी प्रयासों की संख्या सीमित होनी चाहिए। उन्होंने दो चरणों वाली परीक्षा प्रणाली — पहले स्क्रीनिंग और फिर मुख्य परीक्षा — लागू करने की भी बात कही।उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में अधिकतम आयु सीमा क्यों नहीं है। उनके शब्दों में, “क्या आप चाहेंगे कि 52 साल का व्यक्ति मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले? IAS में आयु सीमा है, तो मेडिकल में क्यों नहीं?”

शिवम की उम्मीद

अंत में जब शिवम से पूछा गया कि वह क्या सोचते हैं, तो उन्होंने उम्मीद भरे स्वर में कहा, “अगर इन दोनों विशेषज्ञों की बातों पर NTA ध्यान दे, तो छात्रों का भरोसा वापस आ सकता है। कम से कम मुझे यह भरोसा होगा कि जो परीक्षा मैं दे रहा हूं वह 100 प्रतिशत ईमानदार है और हर छात्र को उसका परिणाम उसकी मेहनत से मिलेगा, पैसे देकर खरीदे गए पेपर से नहीं।”

अब पूरे देश की नजर 21 जून पर है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि परीक्षा बिना लीक के हो पाएगी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या करोड़ों भारतीय युवाओं के सपनों की रक्षा करने वाली संस्थाएं आखिरकार अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगी।

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