सख्त कानून भी बेअसर? NEET लीक ने सिस्टम पर उठाए सवाल
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सख्त कानून भी बेअसर? NEET लीक ने सिस्टम पर उठाए सवाल

NEET-UG 2026 रद्द होने के बाद NTA, पेपर लीक रोकने वाले कानून और परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं, जबकि लाखों छात्र असमंजस में हैं।


12 मई को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने NEET-UG परीक्षा रद्द कर दी। एजेंसी ने अपनी आंतरिक समीक्षा के बाद माना कि 9 दिन पहले आयोजित हुई यह परीक्षा अब वैध नहीं मानी जा सकती। 22 लाख से ज्यादा छात्रों को बताया गया कि परीक्षा की नई तारीख बाद में घोषित की जाएगी और मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई है।

यह NTA के आठ साल के इतिहास में पहली बार है जब NEET-UG परीक्षा रद्द की गई है। दिलचस्प बात यह है कि 2024 में इसी एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट में बिल्कुल उल्टा तर्क दिया था। तब पटना-हजारीबाग पेपर लीक मामले को “स्थानीय स्तर तक सीमित” बताया गया था। एजेंसी ने कहा था कि उसके डेटा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का कोई सबूत नहीं है और 23 लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही दलील स्वीकार करते हुए परीक्षा रद्द करने से इनकार कर दिया था।

लेकिन 12 मई 2026 की अधिसूचना में लगभग समान परिस्थितियों पर NTA ने ठीक उल्टा निष्कर्ष निकाला। यहीं से NTA की कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा होता है।

NTA क्यों बनाई गई थी?

NTA की स्थापना नवंबर 2017 में शिक्षा मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी। इसका मकसद साफ था — देश की प्रवेश परीक्षाओं को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाना।उस समय CBSE पर लगातार सवाल उठ रहे थे। 2015 की ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) परीक्षा सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी थी, क्योंकि अभ्यर्थियों के कपड़ों में छिपे SIM कार्ड के जरिए उत्तर भेजे जा रहे थे। इसके बाद माना गया कि एक विशेष एजेंसी इस व्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाल पाएगी।

अब 12 मई 2026 की FIR उसी वादे की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है। सवाल यह है कि क्या नया कानून और नई एजेंसी उस समस्या को हल कर पाए, जिसके समाधान के लिए उन्हें बनाया गया था?

तीन NEET परीक्षाएं लीक से प्रभावित

शिक्षा राज्यमंत्री सुकांत मजूमदार ने 22 जुलाई 2024 को लोकसभा में बताया था कि 2018 से NTA ने 240 से ज्यादा परीक्षाएं आयोजित की हैं और 5.4 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों का परीक्षण किया है।लेकिन NEET-UG के आठ चक्रों में से तीन पेपर लीक या समझौते के शिकार रहे:

2021 — जयपुर

2024 — पटना-हजारीबाग

2026 — सीकर

इनमें सिर्फ 2026 की परीक्षा रद्द की गई।

इन सभी मामलों में एक समान पैटर्न दिखा। बहुराज्यीय संगठित गिरोह, मेडिकल सीटों की डील, और प्रति सीट 30 से 50 लाख रुपये तक की वसूली।

सिर्फ NEET नहीं, कई परीक्षाओं में गड़बड़ी

मामला सिर्फ मेडिकल प्रवेश परीक्षा तक सीमित नहीं है।

2024 में आयोजित UGC-NET परीक्षा को एक दिन बाद ही रद्द करना पड़ा, क्योंकि सरकार को सूचना मिली कि “परीक्षा की पवित्रता प्रभावित हुई है।” इसके अलावा Joint CSIR-UGC-NET स्थगित हुई, NEET-PG टाली गई, JEE Main 2025 में 12 सवाल उत्तर कुंजी से हटाने पड़े

CUET-UG को 15 शहरों में टालना पड़ा

श्रीनगर के एक केंद्र पर दो शिफ्ट की परीक्षा ही नहीं हो सकी। संसद की समिति ने भी सवाल उठाए। दिसंबर 2025 में संसद की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति ने NTA के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए।राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समिति की 371वीं रिपोर्ट 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पेश की गई।

रिपोर्ट में कहा गया कि 2024 में NTA द्वारा आयोजित 14 प्रमुख परीक्षाओं में से कम से कम 5 परीक्षाएं “गंभीर समस्याओं” से प्रभावित थीं। इनमें शामिल थे:

परीक्षा स्थगित होना

पेपर लीक

परिणाम में देरी

उत्तर कुंजी में गलतियां

448 करोड़ रुपये पड़े रहे बेकार

समिति ने NTA की वित्तीय व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।

रिपोर्ट के अनुसार, छह साल में एजेंसी ने परीक्षा फीस के रूप में करीब 3,512.98 करोड़ रुपये जुटाए। लेकिन परीक्षाएं आयोजित करने में 3,064.77 करोड़ रुपये ही खर्च हुए।यानी 448 करोड़ रुपये का अधिशेष बिना इस्तेमाल के पड़ा रहा।समिति ने सुझाव दिया कि इस रकम का इस्तेमाल NTA की अपनी क्षमता बढ़ाने या निजी एजेंसियों की निगरानी मजबूत करने में किया जाना चाहिए।

निजी कंपनियों पर सवाल

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई निजी कंपनियां, जिन्हें एक सरकारी एजेंसी पहले ही ब्लैकलिस्ट कर चुकी थी, वे दूसरी जगह सरकारी ठेके हासिल करती रहीं।कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं के लिए समिति ने सुझाव दिया कि सिर्फ सरकारी या सरकारी नियंत्रण वाले केंद्रों का उपयोग किया जाए, निजी केंद्रों का नहीं।समिति ने यह भी कहा कि पेन-पेपर मोड ज्यादा सुरक्षित है। CBSE और UPSC जैसे संस्थान वर्षों से इस मॉडल पर बिना लीक के परीक्षाएं करा रहे हैं।

नया कानून, पुरानी समस्या

पेपर लीक रोकने के लिए केंद्र सरकार ने “Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024” बनाया था।इस कानून को 12 फरवरी 2024 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। इसमें संगठित पेपर लीक के लिए 3 से 10 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। NTA भी इसी कानून के दायरे में आती है।लेकिन यह कानून 21 जून 2024 से लागू हुआ, जबकि पटना-हजारीबाग लीक उससे छह हफ्ते पहले हो चुका था। इसलिए उस मामले में यह कानून लागू ही नहीं हो सका।

CBI की 20 सितंबर 2024 की चार्जशीट में सिर्फ IPC और भ्रष्टाचार निरोधक कानून का इस्तेमाल हुआ।2026 की FIR इस कानून की पहली बड़ी परीक्षा। 12 मई 2026 को सीकर पेपर लीक मामले में दर्ज FIR में पहली बार नए Public Examinations Act का इस्तेमाल किया गया है।इस FIR में आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), भ्रष्टाचार निरोधक कानून और Public Examinations Act के तहत धाराएं लगाई गई हैं।अब असली सवाल यह है कि क्या यह कानून उन राज्य कानूनों से अलग साबित होगा, जो पहले से मौजूद थे लेकिन पेपर लीक नहीं रोक सके?

राज्यों के कानून भी नाकाम रहे

केंद्र के इस कानून से पहले भी आठ राज्यों में पेपर लीक विरोधी कानून मौजूद थे।

इनमें शामिल हैं:

ओडिशा (1988)

गुजरात

उत्तराखंड

आंध्र प्रदेश

उत्तर प्रदेश

झारखंड

छत्तीसगढ़

राजस्थान

लेकिन इन कानूनों के बावजूद पेपर लीक रुक नहीं सके। जानकारों का मानना है कि सिर्फ सख्त सजा से समस्या हल नहीं होगी। असली चुनौती दोषियों को सजा दिलाने की व्यवस्था है — और वह अब भी कमजोर बनी हुई है।सीकर पेपर लीक की FIR अब यह तय करेगी कि नया केंद्रीय कानून वास्तव में कितना प्रभावी साबित होता है, या यह भी पुराने कानूनों की तरह सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा।

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