आधुनिक हथियार, नई रणनीति और मजबूत सेना, नए CDS का बड़ा मिशन
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एन एस राजा सुब्रमणि नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ होंगे।

आधुनिक हथियार, नई रणनीति और मजबूत सेना, नए CDS का बड़ा मिशन

नए CDS जनरल राजा सुब्रमणि के सामने सेना आधुनिकीकरण, थिएटर कमांड, ड्रोन निर्माण और रक्षा बजट बढ़ाने जैसी बड़ी चुनौतियां होंगी।


रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले तथा पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीमित संघर्ष ने दुनिया भर की सैन्य रणनीतियों और युद्ध सिद्धांतों को बदल कर रख दिया है। ऐसे समय में भारत के नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी, जिनसे उन्हें मजबूती से निपटना होगा।

जनरल एनएस राजा सुब्रमणि इस सप्ताह के अंत में जनरल अनिल चौहान की जगह भारत के तीसरे सीडीएस के रूप में तीन साल का कार्यकाल संभालेंगे। उनका सबसे बड़ा दायित्व होगा कि भारत चीन और पाकिस्तान की बढ़ती संयुक्त चुनौती का मुकाबला करने के लिए एक एकीकृत, बहु-आयामी और किफायती युद्ध प्रणाली विकसित करे।

राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की जरूरत

सबसे पहले भारत को तत्काल एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) की आवश्यकता है, जो दीर्घकालिक राष्ट्रीय और भू-राजनीतिक लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करे। इसके जरिए विभिन्न सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए एक स्पष्ट और व्यापक रोडमैप तैयार किया जा सकेगा।लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में तदर्थ फैसलों और रणनीतिक योजना की कमी ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर किया है।

सीडीएस और इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड

हालांकि सीडीएस केवल सरकार को एनएसएस की आवश्यकता पर सलाह दे सकता है, लेकिन उन्हें सीधे तौर पर इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड (आईटीसी) की स्थापना का नेतृत्व करना होगा।आईटीसी व्यवस्था के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के संसाधनों और सैनिकों को विशेष भौगोलिक क्षेत्रों या मिशनों के लिए एकीकृत कमांडरों के अधीन रखा जाएगा।जनरल सुब्रमणि को पहले सीडीएस दिवंगत जनरल बिपिन रावत की आक्रामक शीर्ष-से-नीचे रणनीति और जनरल अनिल चौहान की सहमति आधारित नीचे-से-ऊपर रणनीति के बीच संतुलन बनाना होगा।

सशस्त्र बलों के इस बड़े पुनर्गठन का खाका अब तैयार हो चुका है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की मंजूरी मिलने के बाद इसे जमीन पर लागू होने में कम से कम 12 से 18 महीने लग सकते हैं।“थिएटराइजेशन” को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब खत्म होनी चाहिए। इसका उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त क्षमता विकसित कर देश की युद्ध क्षमता को बढ़ाना है।

साइबर और अंतरिक्ष युद्ध की तैयारी

भारत अब अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्रों के लिए पूर्ण विकसित कमांड स्थापित करने में और देरी नहीं कर सकता।रियल टाइम निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और सुरक्षित संचार के लिए अंतरिक्षीय संसाधनों का उपयोग बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। इससे सैन्य निर्णय लेने की प्रक्रिया — ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट (OODA) — को तेज किया जा सकेगा।

वहीं साइबर युद्ध क्षमता भी बेहद जरूरी है, क्योंकि दुश्मन किसी भी वास्तविक सैन्य कार्रवाई से पहले साइबर हमलों के जरिए महत्वपूर्ण ढांचों को नुकसान पहुंचा सकता है।हालिया संघर्षों ने यह भी साबित कर दिया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सेंसर, आधुनिक हथियार, ड्रोन, सुरक्षित कनेक्टिविटी और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स जैसी तकनीकों को तेजी से सेना में शामिल करना जरूरी है।

लंबी दूरी के हथियार और ड्रोन निर्माण

भारत को अपने पारंपरिक लंबी दूरी के सटीक हमले करने वाले हथियारों को भी मजबूत करना होगा। इसके लिए क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों, गाइडेड रॉकेट और अन्य हथियार प्रणालियों से लैस एक इंटीग्रेटेड रॉकेट फोर्स (आईआरएफ) की जरूरत होगी।हालांकि लड़ाकू विमान अब भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दुश्मन के अंदरूनी इलाकों में हमला करने के लिए कम लागत वाली स्टैंडऑफ फायरपावर भी उतनी ही जरूरी हो गई है।

भारत को छोटे लोइटरिंग म्यूनिशन, स्वार्म ड्रोन, एफपीवी ड्रोन और यूसीएवी जैसे सभी प्रकार के ड्रोन खुद डिजाइन और निर्मित करने चाहिए। विदेशी आयातों या महंगे घरेलू “स्क्रूड्राइवर असेंबली” मॉडल पर निर्भरता खत्म करनी होगी।इसके साथ ही दुश्मन के ड्रोन, मिसाइलों और लोइटरिंग हथियारों के बड़े हमलों को रोकने के लिए मजबूत और बहु-स्तरीय एयर एंड मिसाइल डिफेंस नेटवर्क भी देश में ही विकसित करना होगा।

रक्षा उत्पादन और युद्ध भंडार

इन सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत को एकीकृत सैन्य क्षमता विकास योजनाएं तैयार करनी होंगी, रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी और लंबे युद्धों के लिए मजबूत आपूर्ति श्रृंखला विकसित करनी होगी।यह याद रखना होगा कि ऑपरेशन सिंदूर केवल 88 घंटे तक चला सीमित संघर्ष था। आधुनिक युद्धों ने साबित कर दिया है कि अतिरिक्त उत्पादन क्षमता और युद्धकालीन भंडार बेहद आवश्यक हैं।

सैन्य कमियों को दूर करना जरूरी

सीडीएस को सेना की कई महत्वपूर्ण कमियों को भी प्राथमिकता के आधार पर दूर करना होगा। इनमें रात में युद्ध क्षमता, एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन से लैस आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां, पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ लड़ाकू विमान और हल्के उपयोगी हेलीकॉप्टर शामिल हैं।साथ ही गैर-जरूरी प्रशासनिक ढांचे को कम करना और कैडर समीक्षा करना भी जरूरी होगा।

अग्निपथ योजना में बदलाव की जरूरत

नए सीडीएस को 2022 में लागू की गई विवादित अग्निपथ योजना में भी सुधार की वकालत करनी चाहिए।इस योजना के तहत चार साल की सेवा पूरी करने वाले 75 प्रतिशत अग्निवीरों को इस वर्ष के अंत से सेवा से मुक्त किया जाना शुरू होगा।विशेषज्ञों का मानना है कि अग्निवीरों की स्थायी नियुक्ति दर को कम से कम 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए।

एनएफयू और वेतन आयोग का मुद्दा

सैन्य अधिकारियों में इस बात को लेकर भी असंतोष है कि सरकार उन्हें गैर-कार्यात्मक उन्नयन (एनएफयू) देने से लगातार इनकार कर रही है। यह सुविधा केंद्रीय सेवाओं और अर्धसैनिक बलों के अधिकारियों को मिलती है।आठवें केंद्रीय वेतन आयोग में सैन्य प्रतिनिधित्व की कमी ने भी अधिकारियों की चिंताओं को बढ़ाया है।

रक्षा बजट बढ़ाने की मांग

सैन्य आधुनिकीकरण, युद्ध तैयारी और वेतन-पेंशन के खर्चों को पूरा करने के लिए सीडीएस को रक्षा बजट को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के कम से कम 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग करनी चाहिए।वर्तमान में भारत का रक्षा बजट जीडीपी का लगभग 1.9 प्रतिशत ही है।

बड़ी जिम्मेदारियों के साथ नई भूमिका

सेना, नौसेना और वायुसेना प्रमुखों के बीच “फर्स्ट अमंग इक्वल्स” की भूमिका निभाने वाले जनरल सुब्रमणि के सामने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होंगी।उन्हें राजनीतिक नेतृत्व के प्रमुख सैन्य सलाहकार और सैन्य मामलों के विभाग के सचिव के रूप में भी काम करना होगा।जनरल सुब्रमणि को एक ऐसी भविष्य-तैयार सेना तैयार करनी होगी, जो पारंपरिक और असममित दोनों तरह के युद्धों के लिए सक्षम हो। उनका लक्ष्य स्पष्ट है, लेकिन चुनौतियां बेहद बड़ी और जटिल हैं।

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