एनीमिया मुक्त भारत या डेटा मुक्त भारत? NFHS-6 पर विवाद
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एनीमिया मुक्त भारत या डेटा मुक्त भारत? NFHS-6 पर विवाद

NFHS-6 रिपोर्ट से एनीमिया, शिशु मृत्यु दर और अन्य अहम स्वास्थ्य आंकड़े गायब हैं। विपक्ष और विशेषज्ञ सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं।


मार्च 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनीमिया मुक्त भारत (AMB) मिशन की शुरुआत की थी। "नरिश, प्रिवेंट, प्रोटेक्ट" यानी "पोषण, रोकथाम और सुरक्षा" के नारे के साथ शुरू किए गए इस अभियान में प्रधानमंत्री ने एनीमिया को खत्म करने के लिए अपनी 6X6X6 रणनीति का प्रचार किया था। इस रणनीति के तहत छह प्रकार के हस्तक्षेप, छह लाभार्थी समूहों और छह संस्थागत तंत्रों के माध्यम से एनीमिया से लड़ने का लक्ष्य रखा गया था।

उसी वर्ष सितंबर में आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से नमो ऐप के जरिए बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री ने एक और महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा। उन्होंने कहा कि देश में एनीमिया की दर में हर साल 3 प्रतिशत की कमी लाई जाएगी, जबकि उस समय भारत में यह कमी औसतन केवल 1 प्रतिशत प्रतिवर्ष दर्ज की जा रही थी।

एनीमिया मुक्त नहीं, एनीमिया डेटा मुक्त भारत?

समय बीतने के साथ यह चमकदार अभियान लगभग खामोशी में खो गया।आठ साल बाद भारत अभी भी एनीमिया से मुक्त नहीं हो पाया है। लेकिन 29 मई को देश ने एक अलग तरह की उपलब्धि जरूर हासिल कर ली। तीन दशक से अधिक समय में पहली बार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) की रिपोर्ट से एनीमिया संबंधी पूरा खंड ही गायब कर दिया गया।शुक्रवार को जारी NFHS-6 (2023-24) फैक्ट शीट में देश में एनीमिया की व्यापकता से जुड़े आंकड़े प्रकाशित ही नहीं किए गए।

इसका मतलब यह हुआ कि भारत भले ही एनीमिया मुक्त न हुआ हो, लेकिन देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले आंकड़ों को "एनीमिया डेटा मुक्त" जरूर बना दिया गया है।

NFHS-5 ने सरकार को किया था असहज

NFHS-6 की यह संक्षिप्त रिपोर्ट करीब पांच साल बाद आई है। इससे पहले 2019-21 की NFHS-5 रिपोर्ट ने सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया था।उस रिपोर्ट ने यह दिखाया था कि एनीमिया के खिलाफ सरकार के बड़े-बड़े दावों और जमीनी हकीकत के बीच भारी अंतर मौजूद है।

आलोचकों का आरोप है कि सरकार पर पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि वह या तो असुविधाजनक आंकड़ों को दबा देती है या फिर ऐसे डेटा को सार्वजनिक नहीं करती जो उसके सुशासन के दावों से मेल नहीं खाते।

कई महत्वपूर्ण सूचकांक भी गायब

सिर्फ एनीमिया ही नहीं, NFHS-6 रिपोर्ट से कई अन्य महत्वपूर्ण सूचकांक भी हटा दिए गए हैं। जहां NFHS-5 में 131 संकेतकों को शामिल किया गया था, वहीं NFHS-6 में यह संख्या घटाकर केवल 101 कर दी गई है।

नई रिपोर्ट में निम्नलिखित विषयों से जुड़े पूरे खंड हटा दिए गए हैं—

एनीमिया की व्यापकता

शिशु मृत्यु दर

बाल मृत्यु दर

कैंसर स्क्रीनिंग

एचआईवी जागरूकता

उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत से जुड़े आंकड़े भी नहीं

NFHS-5 ने सरकार के कई दावों पर सवाल खड़े किए थे।उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को लेकर सरकार दावा करती रही कि लगभग हर घर तक एलपीजी गैस पहुंचा दी गई है।लेकिन NFHS-5 के अनुसार 2019-21 के दौरान केवल 58.6 प्रतिशत परिवार ही स्वच्छ ईंधन का उपयोग कर रहे थे।ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा केवल 43.2 प्रतिशत था।

इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के दावों पर भी NFHS-5 के आंकड़ों ने सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के अनुसार केवल 70.2 प्रतिशत परिवारों के पास बेहतर स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध थीं।अब NFHS-6 में ये सूचकांक भी दिखाई नहीं देते।

आईआईपीएस निदेशक का निलंबन और विवाद

NFHS सर्वेक्षण का संचालन मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) करता है।जुलाई 2023 में केंद्र सरकार ने इसके तत्कालीन निदेशक के.एस. जेम्स को निलंबित कर दिया था।उस समय ऐसी अटकलें लगाई गईं कि यह कार्रवाई NFHS-5 के असहज आंकड़ों को प्रकाशित करने और बाद में उन्हें संशोधित करने से इनकार करने के कारण की गई।अगले ही महीने जेम्स ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

एनीमिया के आंकड़े आज भी सरकार का पीछा कर रहे

NFHS-5 के आंकड़ों ने दिखाया था कि भारत में एनीमिया की स्थिति बेहद गंभीर है।कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने उस समय कहा था कि सरकार के एनीमिया से लड़ने के दावों की पोल उसके अपने आंकड़ों ने खोल दी है।उन्होंने यह भी कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी का गृह राज्य गुजरात भी एनीमिया से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल है।विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने महिलाओं में एनीमिया की दर को 2012 के स्तर की तुलना में 2025 तक 50 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखा था। बाद में इस लक्ष्य को 2030 तक बढ़ा दिया गया।

WHO ने भारत में एनीमिया की उच्च दर को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए केंद्र सरकार से "साहसिक और तत्काल कदम" उठाने की अपील की है।

पांच वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी एनीमिया मुक्त भारत मिशन (AMB) की प्रगति को लेकर सवाल लगातार उठते रहे। संसद के हालिया बजट सत्र के दौरान सत्तारूढ़ भाजपा समेत विभिन्न दलों के सांसदों ने लोकसभा और राज्यसभा में कई बार यह जानना चाहा कि मिशन की वास्तविक स्थिति क्या है और क्या प्रधानमंत्री द्वारा तय किया गया हर वर्ष एनीमिया में 3 प्रतिशत कमी का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा।लेकिन सरकार की ओर से मिले जवाब बेहद सीमित और औपचारिक रहे।लिखित उत्तरों में एनीमिया मुक्त भारत मिशन की उपलब्धियों या चुनौतियों का कोई विस्तृत विवरण नहीं दिया गया। अधिकांश जवाबों में केवल वही जानकारी दोहराई गई जो 2018 में मिशन की घोषणा के समय जारी प्रेस विज्ञप्तियों में दी गई थी।

अनूप्रिया पटेल ने नहीं दिया स्पष्ट जवाब

कई सांसदों ने यह भी पूछा कि NFHS-5 में सामने आए चिंताजनक आंकड़ों के बाद सरकार प्रधानमंत्री के 3 प्रतिशत वार्षिक कमी के लक्ष्य को कैसे हासिल करेगी।हालांकि स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने इन सवालों के जवाब दिए, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कौन-सी नई रणनीति अपना रही है।इसके बावजूद एक अन्य बीमारी से जुड़े आंकड़े छिपाए नहीं जा सके।

सिकल सेल एनीमिया की बढ़ती चुनौती

अनुप्रिया पटेल ने 13 फरवरी को लोकसभा में जानकारी दी कि 3 फरवरी तक 17 राज्यों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में 6.83 करोड़ लोगों की सिकल सेल एनीमिया के लिए जांच की गई।जांच में 2.37 लाख से अधिक लोग बीमारी से पीड़ित पाए गए। 19.32 लाख से अधिक लोग इसके वाहक (Carrier) पाए गए।सिकल सेल रोग एनीमिया का एक आनुवंशिक रूप है, जो विशेष रूप से आदिवासी आबादी में अधिक पाया जाता है। यदि समय रहते इसकी पहचान और इलाज न हो तो यह विशेषकर पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

सरकार और IIPS से जवाब नहीं मिला

लेख के अनुसार, NFHS-6 से एनीमिया, शिशु मृत्यु दर, बाल मृत्यु दर, कैंसर स्क्रीनिंग और HIV जागरूकता से जुड़े आंकड़े हटाने के कारण जानने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय और IIPS के वर्तमान निदेशक डॉ. देवराम ए. नागदेवे से कई बार संपर्क किया गया।लेकिन इन सवालों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली।

क्या सर्वेक्षण पद्धति बदलने की तैयारी थी?

इस विवाद के बीच एक और महत्वपूर्ण संदर्भ सामने आता है।साल 2023 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की सदस्य और अर्थशास्त्री शामिका रवि ने एक लेख में भारत के प्रमुख सर्वेक्षणों की पद्धति पर सवाल उठाए थे।उन्होंने कहा था कि—

NFHS

PLFS (Periodic Labour Force Survey)

NSS (National Sample Survey)

जैसे सर्वेक्षण पुराने सैंपलिंग ढांचे का उपयोग करते हैं।उनके अनुसार ये सर्वेक्षण भारत की वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रगति को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करते और कई मामलों में देश की उपलब्धियों को कम करके दिखाते हैं।रवि ने सुझाव दिया था कि भारत में डेटा संग्रहण के लिए "बड़े पैमाने पर सैंपलिंग सुधार" किए जाने चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति को बेहतर तरीके से दर्शाया जा सके।

क्या NFHS-6 में वही बदलाव लागू हुए?

यह स्पष्ट नहीं है कि NFHS-6 में डेटा संग्रह की पद्धति में कोई बड़ा बदलाव किया गया या नहीं।केंद्र सरकार ने इस बारे में भी कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया है।लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि सर्वेक्षण पद्धति बदली भी गई हो, तब भी एनीमिया, कैंसर स्क्रीनिंग या बाल मृत्यु दर जैसे महत्वपूर्ण संकेतकों को पूरी तरह हटाना सवाल खड़े करता है।उनका मानना है कि डेटा को संशोधित करने और डेटा को पूरी तरह गायब कर देने में बड़ा अंतर होता है। और यहीं से सरकार की मंशा पर संदेह पैदा होता है।

NFHS-6 से महत्वपूर्ण आंकड़ों के गायब होने पर विपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।कांग्रेस प्रवक्ता और पूर्व सांसद डॉ. अजय कुमार का कहना है कि पिछले 12 वर्षों से विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए या तो आंकड़ों में हेरफेर करती है या फिर उन्हें सार्वजनिक ही नहीं करती। उनका कहना है "इसीलिए हम इस सरकार को 'नो डेटा अवेलेबल (NDA)' सरकार कहते हैं। NFHS-5 एक अपवाद था, और सब जानते हैं कि उस रिपोर्ट के बाद IIPS के तत्कालीन निदेशक के.एस. जेम्स के साथ क्या हुआ।"

डॉ. कुमार के अनुसार, महत्वपूर्ण संकेतकों को सार्वजनिक न करना देश के साथ अन्याय है क्योंकि इन आंकड़ों का उपयोग केवल सरकार ही नहीं, बल्कि शोधकर्ता, सामाजिक संगठन, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नीति निर्माता भी करते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पांडेय का विश्लेषण

सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में तीन दशकों से रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पांडेय इस पूरे मामले को एक अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।उनका कहना है कि यदि NFHS-5 की तुलना NFHS-4 (2015-16) और NFHS-3 (2005-06) से की जाए तो कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेतकों पर भारत की प्रगति धीमी हुई या पीछे गई दिखाई देती है।

पांडेय के अनुसार NFHS-3 उस समय हुआ था जब यूपीए सरकार को सत्ता में आए केवल दो वर्ष हुए थे। इसलिए उस समय के कई सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतक पूर्ववर्ती NDA सरकार की विरासत को भी दर्शाते थे। NFHS-4 के दौरान कई संकेतकों में सुधार दिखाई दिया, जिसका श्रेय वे यूपीए शासनकाल में किए गए कार्यों को देते हैं।

भाजपा शासित राज्यों पर सवाल

महेंद्र पांडेय का दावा है कि NFHS-5 के आंकड़ों में एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों पर सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में कई ऐसे राज्य शामिल थे जहां लंबे समय से भाजपा या उसके सहयोगी दल सत्ता में रहे हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर गुजरात,बिहार,मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ असम जैसे राज्यों का उल्लेख किया।उनका कहना है कि यदि राज्यवार आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो कई चिंताजनक प्रवृत्तियां सामने आती हैं।

क्या मुफ्त राशन भी समस्या हल नहीं कर पाया?

पांडेय का तर्क है कि एनीमिया का सबसे बड़ा कारण कुपोषण और पोषण की कमी है।वह कहते हैं कि यदि करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन देने के बावजूद NFHS-5 में पांच वर्ष से कम आयु के 67 प्रतिशत बच्चे और लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से प्रभावित पाई गईं, तो यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी नहीं बल्कि पोषण नीतियों की सीमाओं को भी उजागर करता है।

उनके अनुसार यह सवाल उठता है कि क्या मुफ्त अनाज वितरण से केवल भूख की समस्या कम होती है, जबकि संतुलित पोषण का मुद्दा अभी भी अनसुलझा रह जाता है।

क्या NFHS-6 की तस्वीर और भी खराब थी?

महेंद्र पांडेय एक और संभावना व्यक्त करते हैं।उनका कहना है कि हो सकता है NFHS-6 के आंकड़े NFHS-5 से भी अधिक चिंताजनक रहे हों।उनके अनुसार यदि ऐसा हुआ होगा तो सरकार ने नकारात्मक छवि बनने से बचने के लिए उन संकेतकों को पूरी तरह प्रकाशित न करने का फैसला किया होगा।हालांकि इस दावे का कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा स्पष्टीकरण न दिए जाने से संदेह और बढ़ जाता है।

सबसे बड़ा सवाल

पूरा विवाद अंततः एक मूल प्रश्न पर आकर ठहर जाता है यदि देश में एनीमिया, बाल मृत्यु दर, कैंसर स्क्रीनिंग और HIV जागरूकता जैसे संकेतक वास्तव में बेहतर हुए हैं, तो फिर उन्हें सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?और यदि इन क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक है, तो क्या डेटा को छिपाने से समस्या समाप्त हो जाएगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं होते, बल्कि वे करोड़ों लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं। इसलिए NFHS-6 से महत्वपूर्ण संकेतकों का गायब होना केवल एक सांख्यिकीय या तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और नीति निर्माण से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न बन गया है।यही कारण है कि एनीमिया मुक्त भारत मिशन से कहीं अधिक चर्चा अब इस बात की हो रही है कि आखिर भारत "एनीमिया डेटा मुक्त" कैसे हो गया।

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