देश की महिलाओं में 7% बढ़ा मोटापा, हर तीसरी महिला पार्टनर की हिंसा का शिकार, NFHS-6 की रिपोर्ट में बड़े खुलासे
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देश की महिलाओं में 7% बढ़ा मोटापा, हर तीसरी महिला पार्टनर की हिंसा का शिकार, NFHS-6 की रिपोर्ट में बड़े खुलासे

देश में स्वास्थ्य और सामाजिक बदलावों को दर्शाने वाली 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2023-24' (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट जारी हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सकारात्मक और चिंताजनक दोनों तरह के बदलाव दिखे हैं।


देश के परिवारों की सेहत, सामाजिक स्थिति और महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर सरकार ने 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे' (NFHS-6) के ताजा आंकड़े जारी कर दिए हैं। इस रिपोर्ट में देश की बदलती तस्वीर के कई दिलचस्प और आंखें खोलने वाले पहलू सामने आए हैं। रिपोर्ट बताती है कि भारत की बुनियादी सुविधाओं में भारी सुधार हुआ है और महिलाओं की आजादी भी बढ़ी है। लेकिन दूसरी तरफ, खान-पान की गलत आदतें, बच्चों में कुपोषण और अस्पतालों की मनमानी ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। आइए इस विस्तृत रिपोर्ट के जरिए समझते हैं कि भारत के स्वास्थ्य और समाज में क्या-क्या बदला है।

मोटापा बढ़ा, सिजेरियन डिलीवरी ने तोड़े रिकॉर्ड

स्वास्थ्य के मोर्चे पर रिपोर्ट में कुछ डराने वाले आंकड़े सामने आए हैं। साल 2019-21 के मुकाबले देश की महिलाओं में मोटापे की समस्या 7% तक बढ़ गई है। आज के समय में वजन बढ़ना और शारीरिक रूप से एक्टिव न रहना महिलाओं की सेहत के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा प्रसव (Delivery) को लेकर आया है। देश के निजी (प्राइवेट) अस्पतालों में होने वाली सिजेरियन यानी ऑपरेशन से होने वाली डिलीवरी का आंकड़ा 54.1% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर सिजेरियन डिलीवरी होना नॉर्मल नहीं है, और यह चिंता का विषय है। इसके साथ ही, नवजात बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी एक और बुरी खबर है। शुरुआती 6 महीनों तक शिशुओं को 'केवल स्तनपान' (Exclusive Breastfeeding) कराने की दर 63.7% से गिरकर अब 55.8% पर आ गई है, जो कि शिशुओं की इम्युनिटी के लिए ठीक नहीं है।

घरेलू हिंसा और बाल विवाह में आई बड़ी राहत

इस रिपोर्ट का सबसे सकारात्मक पहलू सामाजिक कुरीतियों में आई कमी है। देश में वर्षों से चली आ रही घरेलू हिंसा और बाल विवाह के मामलों में अच्छी गिरावट दर्ज की गई है।

घरेलू हिंसा: भारत में घरेलू हिंसा की दर पहले 29.2% थी, जो अब घटकर 22.3% पर आ गई है।

बाल विवाह: देश में बाल विवाह का कुल आंकड़ा भी 23.3% से कम होकर 20.1% रह गया है।

हालांकि ये आंकड़े अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन ग्राफ का नीचे आना यह दिखाता है कि समाज में कानून और शिक्षा का असर हो रहा है। इसके साथ ही आत्मनिर्भर महिलाओं की संख्या बढ़ी है। देश में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 25.4% से बढ़कर अब 30.8% तक पहुंच गया है।

इंटरनेट और मकान-जमीन पर बढ़ा महिलाओं का हक

डिजिटल इंडिया और महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर देश ने लंबी छलांग लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं में इंटरनेट का उपयोग लगभग दोगुना होकर 64.3% पर पहुंच गया है। आज देश की आधे से ज्यादा महिलाएं ऑनलाइन दुनिया से जुड़ चुकी हैं।

इसके अलावा, आर्थिक रूप से भी महिलाएं मजबूत हो रही हैं। देश के कुल 18.8% परिवारों में अब महिलाओं के पास अपने मकान या जमीन का मालिकाना हक है। पिछले सर्वे (2021) में यह आंकड़ा महज 14.0% था। दिलचस्प बात यह है कि शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के पास प्रॉपर्टी का मालिकाना हक ज्यादा है। गांवों में यह दर 19.1% है, जबकि शहरों में 18.2% है। बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो देश के 98.3% घरों में बिजली और 96.5% घरों में साफ पीने का पानी पहुंच चुका है।

85% बच्चों को नहीं मिल रहा सही पोषण, कम हुआ परिवार नियोजन

बच्चों की सेहत को लेकर रिपोर्ट मिली-जुली रही। एक तरफ कुपोषित बच्चों में नाटेपन (Stunting) का आंकड़ा 35.5% से घटकर 29.3% पर आ गया है, जो कि 6.2 प्रतिशत की एक बहुत बड़ी और राहत देने वाली सुधार है। लेकिन दूसरी तरफ, देश में बच्चों की डाइट को लेकर एक खौफनाक सच सामने आया है।

रिपोर्ट के अनुसार, 6 महीने से 2 साल तक के उम्र के केवल 15.3% बच्‍चों को ही सही, समय पर और संतुलित खाना मिल पा रहा है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि देश के करीब 85% बच्‍चों को उनकी उम्र के हिसाब से जरूरी पोषण नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है। वहीं, एक और चौंकाने वाली बात यह रही कि परिवार नियोजन (Family Planning) के आधुनिक तरीके जैसे- कंडोम, गर्भनिरोधक गोलियां या नसबंदी अपनाने वाली महिलाओं की संख्या 56.4% से घटकर अब केवल 52.7% रह गई है।

राज्यों का हाल: बिहार में सबसे ज्यादा हिंसा, केरल सबसे सुरक्षित

अगर राज्यों के हिसाब से इस डेटा को देखें, तो देश के अलग-अलग कोनों से बहुत अलग तस्वीरें मिलती हैं:

बाल विवाह और वैवाहिक हिंसा: बाल विवाह के मामले में केरल केवल 2.9% के साथ देश का सबसे सुरक्षित राज्य है, जबकि पश्चिम बंगाल (36.4%) और बिहार (34.6%) सबसे खराब स्थिति में हैं। वहीं, पतियों या पार्टनर द्वारा की जाने वाली वैवाहिक हिंसा के मामले में हिमाचल प्रदेश (4.3%) सबसे सुरक्षित है, जबकि बिहार में स्थिति सबसे भयावह है, जहां 36.1% महिलाओं को इसका दर्द झेलना पड़ता है।

मोटापे का जाल: महिलाओं में मोटापे की सबसे ज्यादा समस्या आंध्र प्रदेश (48%), सिक्किम (48%) और केरल (46.7%) में पाई गई है। वहीं, मेघालय (13.8%) और झारखंड (16.9%) की महिलाएं इस मामले में सबसे फिट या कम मोटापे का शिकार हैं।

WHO की डरावनी रिपोर्ट: हर तीसरी महिला पार्टनर की हिंसा का शिकार

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के साथ-साथ वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की एक वैश्विक रिपोर्ट ने भी भारत को लेकर कड़े सवाल खड़े किए हैं। WHO के मुताबिक, भारत में लगभग 30% महिलाएं इंटीमेट पार्टनर वॉयलेंस (Intimate Partner Violence) का शिकार हुई हैं। यानी उन्हें अपने पति या पार्टनर के हाथों मानसिक, आर्थिक, शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है।

रिपोर्ट कहती है कि 15 से 49 साल के उम्र की हर पांचवीं महिला इस दर्द से गुजर रही है। वहीं वैश्विक स्तर पर स्थिति और भी बदतर है, जहां दुनिया की करीब 84 करोड़ महिलाओं ने अपनी जिंदगी में कभी न कभी अपने पार्टनर की तरफ से सेक्शुअल एब्यूज झेला है। साल 2000 के बाद से इस वैश्विक आंकड़े में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। अगर गैर-पार्टनर (Non-Partner) की बात की जाए, तो भारत में 15 साल से ऊपर की करीब 4% महिलाओं को किसी ऐसे बाहरी व्यक्ति से यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है जो उनका पार्टनर नहीं था।

NFHS-6 की यह रिपोर्ट साफ करती है कि भारत बदल रहा है। महिलाएं इंटरनेट चला रही हैं, प्रॉपर्टी खरीद रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। बाल विवाह जैसी कुरीतियां भी कम हो रही हैं। लेकिन जब तक हम महिलाओं की सुरक्षा, उनके स्वास्थ्य (मोटापा और सिजेरियन डिलीवरी पर रोक) और हमारे बच्चों के सही पोषण पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक एक पूर्ण विकसित और स्वस्थ भारत का सपना अधूरा ही रहेगा।

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