
NFHS-6: देश में डिजिटल और आर्थिक रूप से मजबूत हुईं महिलाएं, लेकिन बढ़ी चिंता
छठी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-6) रिपोर्ट जारी। महिलाओं में इंटरनेट का इस्तेमाल दोगुना हुआ और बैंक खाते 89% पहुंचे, पर आधुनिक गर्भनिरोधकों में आई कमी।
NFHS-6 Report: केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी छठी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-6) की रिपोर्ट ने देश में महिलाओं की बदलती सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी तस्वीर को लेकर बेहद दिलचस्प, विस्तृत और महत्वपूर्ण आंकड़े सामने रखे हैं। शुक्रवार (29 मई) को नई दिल्ली में जारी इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत की महिलाएं पहले के मुकाबले कहीं अधिक स्वस्थ, डिजिटल रूप से कनेक्टेड और आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं।
लेकिन इस चौतरफा सकारात्मक प्रगति और विकास के बीच एक ऐसी चौंकाने वाली और विरोधाभासी बात भी सामने आई है जिसने जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। देश में शादीशुदा महिलाओं के बीच परिवार नियोजन के लिए आधुनिक गर्भनिरोधक तरीकों के इस्तेमाल में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि इसके विपरीत पारंपरिक और कम सुरक्षित तरीकों पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है।
1. डिजिटल और फाइनेंशियल एम्पावरमेंट: इंटरनेट और तकनीक पर बढ़ी पकड़
साल 2023-24 के दौरान देश के 715 जिलों के 6.79 लाख घरों में किए गए इस व्यापक सर्वे में महिलाओं की डिजिटल और वित्तीय प्रगति के ऐतिहासिक आंकड़े सामने आए हैं। इस सर्वे की नोडल एजेंसी के रूप में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेज (IIPS), मुंबई ने काम किया है।
रिपोर्ट के विस्तृत आंकड़े बताते हैं कि भारतीय समाज में महिलाओं की तकनीकी और वित्तीय स्वायत्तता किस तेजी से बढ़ रही है:
इंटरनेट का इस्तेमाल: पिछले सर्वे (NFHS-5, 2019-21) के दौरान देश में कम से कम एक बार इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का आंकड़ा महज 33.3% था, जो अब NFHS-6 (2023-24) की अवधि में लगभग दोगुना होकर 64.3% पर पहुंच गया है। यह बदलाव ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता के प्रसार को दर्शाता है।
निजी मोबाइल फोन का स्वामित्व: आज के दौर में मोबाइल सिर्फ संवाद का साधन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का जरिया है। सर्वे के अनुसार, अपना निजी मोबाइल फोन रखने वाली महिलाओं की संख्या 54% से बढ़कर अब 63.6% हो गई है। यानी अब महिलाएं सूचनाओं और सेवाओं तक सीधी पहुंच रख रही हैं।
बैंक खातों में अभूतपूर्व हिस्सेदारी: महिलाओं के वित्तीय समावेशन में सबसे बड़ी उछाल देखी गई है। महिलाओं के अपने बैंक या बचत खाते होने का ग्राफ जो NFHS-5 में 78.6% था, वह अब सीधे 89% पर जा पहुंचा है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश की लगभग 90% महिलाओं के पास अब अपनी खुद की बचत और बैंकिंग प्रणाली तक पहुंच है।
2. मातृ और शिशु स्वास्थ्य: संस्थागत प्रसव 90% के पार
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में लगातार किए गए सुधारों और सरकारी निवेश का सीधा असर मातृ स्वास्थ्य (Maternal Health) के संकेतकों पर दिखाई दे रहा है। भारत अब सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के बेहद करीब पहुंच रहा है:
अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव: देश में स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में होने वाले प्रसव का आंकड़ा 2019-21 के 88.6% से बढ़कर अब 2023-24 में 90.6% हो गया है। डॉक्टरों और प्रशिक्षित चिकित्सा पेशेवरों की देखरेख में होने वाले इन प्रसवों के कारण मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने में बड़ी सफलता मिल रही है।
प्रसव पूर्व देखभाल: गर्भावस्था के दौरान देखभाल के मामले में भी जागरूकता बढ़ी है। देश में एंटीनेटल केयर कवरेज 95.9% के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में ही डॉक्टर के पास जांच के लिए जाने वाली महिलाओं की संख्या 70% से बढ़कर 76.2% हुई है। वहीं, गर्भावस्था के दौरान कम से कम 4 बार अनिवार्य एएनसी विजिट करने वाली माताएं भी 58.5% से बढ़कर 65.2% हो गई हैं।
पूरक पोषण और प्रसव बाद देखभाल: गर्भ के दौरान कम से कम 100 दिनों या उससे अधिक समय तक आयरन और फोलिक एसिड की गोलियों का सेवन करने वाली माताओं की संख्या में भी बड़ी वृद्धि हुई है, जो 44.1% से बढ़कर अब 54.9% हो गई है। इसके अलावा, प्रसव के शुरुआती दो दिनों के भीतर मिलने वाली पोस्टनेटल केयर में भी 79.1% से 85.3% का सुधार देखा गया है।
सिजेरियन प्रसव में उछाल: एक नया ट्रेंड
स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार के साथ-साथ इस सर्वे ने एक ऐसे ट्रेंड की तरफ भी इशारा किया है जो चिकित्सा जगत के लिए बहस का विषय है। देश में सिजेरियन (ऑपरेशन के जरिए) होने वाले प्रसवों की संख्या 21.5% से बढ़कर 27.2% हो गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह ट्रेंड सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी स्वास्थ्य केंद्रों में बहुत ज्यादा है। निजी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव का आंकड़ा 54.1% है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह महज 16.9% है, हालांकि बढ़ोतरी दोनों क्षेत्रों में देखी गई है।
मंत्रालय का कहना है कि मातृ स्वास्थ्य के इन तमाम आंकड़ों में आए व्यापक सुधार के पीछे सरकार की प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं जैसे 'जननी सुरक्षा योजना' (JSY), 'जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम' (JSSK), 'सुरक्षित मातृत्व आश्वासन' (SUMAN), और 'प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना' (PMMVY 2.0) बेहद मददगार साबित हुई हैं।
3. मासिक धर्म स्वच्छता में सुधार
देश के किशोरों और युवा महिलाओं में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के सरकारी प्रयासों का असर भी जमीन पर दिख रहा है। 15 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की युवतियों और महिलाओं में सुरक्षित और स्वच्छ मासिक धर्म सुरक्षा तरीकों को अपनाने की दर 77.6% से बढ़कर अब 79.2% हो गई है।
राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) के तहत चलाई जा रही 'मासिक धर्म स्वच्छता योजना' (MHS) और 'प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना' के माध्यम से अत्यंत किफायती दरों पर सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने जैसी कड़ियों ने इस दिशा में ग्रामीण भारत की सोच और आदतों को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है।
4. चिंता का विषय: आधुनिक गर्भनिरोधकों से क्यों दूर हो रही हैं महिलाएं?
तमाम सकारात्मक पहलुओं के बीच, इस राष्ट्रीय सर्वे का सबसे विवादास्पद और चिंताजनक पहलू परिवार नियोजन के तरीकों में आया बदलाव है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कुल गर्भनिरोधक उपयोग (जिसमें आधुनिक और पारंपरिक दोनों तरीके शामिल हैं) 66.7% से बढ़कर 69.1% हुआ है। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय कपल्स अब परिवार नियोजन को लेकर पहले से अधिक सचेत हैं और अपने परिवार का आकार अपनी शर्तों पर तय कर रहे हैं।
लेकिन पेंच इस बात में है कि वे इसके लिए आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से दूर हो रहे हैं:
आधुनिक तरीकों में गिरावट: 15-49 आयु वर्ग की वर्तमान में विवाहित भारतीय महिलाओं में आधुनिक गर्भनिरोधक तरीकों (जैसे कंडोम, गर्भनिरोधक गोलियां, आईयूडी आदि) का इस्तेमाल 56.4% से घटकर अब केवल 52.7% रह गया है।
पारंपरिक तरीकों पर बढ़ती निर्भरता: इसके विपरीत, रिदम और विड्रॉल जैसे पारंपरिक, प्राकृतिक और बेहद कम सुरक्षित तरीकों पर निर्भरता 10.3% से तेजी से बढ़कर सीधे 16.4% पर जा पहुंची है। इन तरीकों में गर्भधारण की विफलता की संभावना बहुत अधिक होती है।
नसबंदी का स्टेटस: भारत में परिवार नियोजन का सबसे आम और लोकप्रिय तरीका महिला नसबंदी रहा है, जिसमें इस बार आंशिक गिरावट देखी गई है और यह 37.9% से घटकर 36.5% रह गया है। वहीं दूसरी ओर, पुरुष नसबंदी की भागीदारी देश में अभी भी नगण्य यानी महज 0.5% पर टिकी हुई है, जो यह दर्शाती है कि परिवार नियोजन की जिम्मेदारी आज भी पूरी तरह महिलाओं के कंधों पर ही है।
पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की चेतावनी
इस ट्रेंड पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए 'पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया' की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा ने कहा, "NFHS-6 के इन आंकड़ों को एक गंभीर चेतावनी (Warning) की तरह पढ़ा जाना चाहिए। आधुनिक गर्भनिरोधकों में आई यह कमी और पारंपरिक तरीकों में आई भारी उछाल केवल स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी या सप्लाई चेन का मुद्दा नहीं है; बल्कि यह सीधे तौर पर महिलाओं की 'एजेंसी' (निर्णय लेने की स्वतंत्रता और क्षमता) से जुड़ा मामला है।"
मुत्तरेजा ने आगे विश्लेषण करते हुए कहा कि यह बदलाव स्वास्थ्य केंद्रों पर सही काउंसलिंग की कमी, आधुनिक दवाओं या तरीकों के साइड इफेक्ट्स (दुष्प्रभावों) को लेकर महिलाओं के मन में बैठे डर, दो बच्चों के बीच अंतर रखने वाले साधनों की सीमित उपलब्धता और समाज की उस रूढ़िवादी सोच को उजागर करता है जो गर्भनिरोधक का पूरा बोझ सिर्फ और सिर्फ महिलाओं पर डाल देती है। सिर्फ गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कर देना काफी नहीं है, बल्कि महिलाओं को मानसिक और सामाजिक रूप से सक्षम बनाना भी जरूरी है।
5. प्रजनन दर में स्थिरता
इन तमाम उतार-चढ़ाव के बीच देश के जनसांख्यिकीय ढांचे के लिए एक अच्छी और राहत देने वाली खबर यह है कि भारत की कुल प्रजनन दर पूरी तरह से स्थिर बनी हुई है। NFHS-5 की तरह ही NFHS-6 में भी देश की टीएफआर 2.0 बच्चे प्रति महिला दर्ज की गई है।
यह आंकड़ा इस बात की पुष्टि करता है कि भारत ने जनसंख्या नियंत्रण के मामले में 'रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी' (यानी 2.1 का वह स्तर जिस पर जनसंख्या खुद को प्रतिस्थापित करती है और स्थिर हो जाती है) से नीचे का स्तर सफलतापूर्वक बनाए रखा है। यानी देश में जनसंख्या विस्फोट का खतरा अब पीछे छूट चुका है और देश स्थिरता की ओर बढ़ रहा है।
(एजेंसी इनपुट के साथ)
Next Story

