NGT का बड़ा एक्शन: प्रदूषण फंड का हिसाब नहीं दिया तो 6 राज्यों पर लगेगा भारी जुर्माना
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NGT का बड़ा एक्शन: प्रदूषण फंड का हिसाब नहीं दिया तो 6 राज्यों पर लगेगा भारी जुर्माना

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भारत के छह राज्यों को वायु प्रदूषण रोकने के लिए आवंटित धन का सही उपयोग न करने पर कड़ी चेतावनी दी है। ट्रिब्यूनल ने पाया कि कर्नाटक और विशेष रूप से बेंगलुरु में फंड का बहुत कम हिस्सा खर्च किया गया है।


नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने दक्षिण भारत के छह राज्यों—कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी—को सख्त लहजे में चेतावनी दी है। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि यदि ये राज्य 'नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम' (NCAP) के तहत आवंटित धन का सही और प्रभावी ढंग से उपयोग करने में विफल रहते हैं, तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। चेन्नई स्थित एनजीटी की दक्षिणी पीठ ने शनिवार (2 मई) को एक रिपोर्ट के माध्यम से राज्यों को निर्देश दिया कि वे अपने 'स्टेट एक्शन प्लान' (SAP) को समय सीमा के भीतर और सख्ती से लागू करें।

फंड का खराब प्रबंधन और लापरवाही

एनजीटी की पीठ ने पाया कि दक्षिण भारत के राज्यों में स्वच्छ हवा के लिए मिलने वाले फंड का या तो उपयोग नहीं हो रहा है या फिर उसका इस्तेमाल गलत तरीके से किया जा रहा है। ट्रिब्यूनल ने इस आदेश के जरिए दक्षिण भारत में वायु प्रदूषण शासन (Pollution Governance) की कमियों को उजागर किया है। यह मामला 28 अप्रैल को तीन अलग-अलग लेकिन जुड़े हुए मामलों की सुनवाई के बाद निपटाया गया।

इस मामले की शुरुआत 2021 में चेन्नई के शोधकर्ता धर्मेश शाह की एक याचिका से हुई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और दक्षिणी राज्य NCAP के तहत कार्य योजना तैयार करने और उन्हें लागू करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। इसके साथ ही, कर्नाटक में फंड के खराब उपयोग और ग्रीनपीस (Greenpeace) की उस रिपोर्ट को भी शामिल किया गया जिसमें बेंगलुरु सहित दक्षिण के कई शहरों में बढ़ते प्रदूषण का दावा किया गया था।

कर्नाटक और बेंगलुरु की स्थिति सबसे खराब

रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक को 2019-20 से 2023-24 के बीच कुल 597.54 करोड़ रुपये मिले थे। इसमें से अकेले बेंगलुरु को 541.1 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि अक्टूबर 2024 तक बेंगलुरु ने इस भारी-भरकम राशि का केवल 13 प्रतिशत ही खर्च किया था। एनजीटी ने इस पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जब जनता प्रदूषण से जूझ रही है, तब फंड का इस्तेमाल न करना प्रशासनिक विफलता है।

हालांकि, सितंबर 2025 तक दक्षिण भारतीय राज्यों को जारी किए गए कुल फंड का 76 प्रतिशत उपयोग हो चुका था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इसके "असंतुलित खर्च" (Skewed Spending) पैटर्न पर सवाल उठाए।

खर्च करने का तरीका 'अतार्किक'

NGT ने फंड के बंटवारे को "अतार्किक" करार दिया। आंकड़ों से पता चला कि:

86 प्रतिशत फंड: केवल सड़क की धूल (Road Dust) को नियंत्रित करने पर खर्च किया गया।

मात्र 6.6 प्रतिशत: वाहनों से होने वाले उत्सर्जन (Vehicular Emissions) को रोकने के लिए इस्तेमाल हुआ।

सिर्फ 4.1 प्रतिशत: बायोमास जलाने (Biomass Burning) से होने वाले प्रदूषण को रोकने में खर्च किया गया।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों, जैसे वाहनों का धुआं और कचरा जलाना, पर ध्यान देने के बजाय सारा पैसा केवल सड़क की धूल पर खर्च करना संसाधनों की बर्बादी है। ट्रिब्यूनल ने मांग की है कि इस खर्च के पैटर्न को तार्किक बनाया जाए और उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाए जिनसे वास्तव में वायु गुणवत्ता में सुधार हो।

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