
चुनावी मंथन के बाद एक्शन में कांग्रेस, कलह निपटाने के बाद अब पूरे देश में 'ऑपरेशन क्लीन' की तैयारी
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह समझ आ चुका है कि बिना कड़े और कड़वे फैसले लिए सांगठनिक जड़ता को खत्म नहीं किया जा सकता। सालों की देरी और आधे-अधूरे मन से किए जाने वाले हस्तक्षेपों के दौर को पीछे छोड़ते हुए, कांग्रेस अब एक दुर्लभ और अप्रत्याशित जल्दबाजी के साथ आगे बढ़ रही है।
जिस कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक गलियारों में अपनी 'सुस्ती', 'फैसले न ले पाने की कमजोरी' और 'अंदरूनी कलह को टालने की आदत' के लिए जाना जाता था, वही कांग्रेस इन दिनों अचानक एक बिल्कुल नए और आक्रामक अवतार में नजर आ रही है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के बाद से पार्टी हाईकमांड ने अपने सांगठनिक मामलों को सुलझाने में जो असाधारण तेजी दिखाई है, उसने पार्टी के भीतर और बाहर सबको चौंका दिया है। कांग्रेस नेतृत्व अब पुराने विवादों को पालने के बजाय, उन्हें तुरंत और सर्जिकल अंदाज में खत्म करने के मूड में दिख रहा है।
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, यानी मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने पिछले कुछ हफ्तों में जो फैसले लिए हैं, वे इस बात का गवाह हैं। तमिलनाडु में जैसे ही राजनीतिक हवा बदली, कांग्रेस हाईकमांड ने बिना वक्त गंवाए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रमुक (DMK) का पुराना दामन छोड़ दिया और चुनाव जीतकर उभरे अभिनेता जोसेफ विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) के साथ नया गठबंधन सील कर दिया। वहीं केरल में, हालांकि मुख्यमंत्री का नाम तय करने में 10 दिन का समय लगा, लेकिन उसके तुरंत बाद वीडी सतीशन के मंत्रिमंडल और मंत्रियों की सूची को फाइनल करने में हाईकमांड ने एक दिन की भी देरी नहीं की।
कर्नाटक का दंगल: सिद्धारमैया को दिल्ली में सम्मान, डीके शिवकुमार को बेंगलुरु की कमान
कांग्रेस की इस नई और तेज कार्यशैली का सबसे बड़ा उदाहरण कर्नाटक में देखने को मिला है। पिछले एक साल से अधिक समय से कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता की गद्दी को लेकर शह-मात का खेल चल रहा था। हाईकमांड इस फैसले को लगातार टाल रहा था, लेकिन इस हफ्ते आखिरकार नेतृत्व ने एक स्पष्ट पक्ष चुन लिया। पार्टी ने डीके शिवकुमार के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सजाने का फैसला किया, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि राज्य के सबसे बड़े ओबीसी (OBC) नेता सिद्धारमैया बगावत का झंडा न उठाएं।
इस पूरी स्क्रिप्ट को बेहद चालाकी से लिखा गया। मंगलवार की देर रात अचानक सिद्धारमैया को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) का सदस्य नियुक्त कर दिया गया, जो कांग्रेस की सबसे बड़ी नीति-निर्धारक संस्था है। इस फैसले की टाइमिंग बहुत कुछ बयां करती है। नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह से ठीक कुछ घंटे पहले सिद्धारमैया को दिल्ली की हाई-टेबल पर जगह देना देश को यह संदेश था कि भले ही हाईकमांड ने अपने इकलौते ओबीसी मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग लिया हो, लेकिन पार्टी में उनके कद और अनुभव का सम्मान आज भी बरकरार है। इसके साथ ही, केरल की तर्ज पर कर्नाटक कैबिनेट के मंत्रियों की पहली सूची भी तुरंत तैयार कर ली गई, ताकि 3 जून के शपथ ग्रहण के साथ ही नई सरकार काम पर लग सके।
संगठन का बड़ा ओवरहाल: राज्यों में बदलेंगे चेहरे
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह फेरबदल सिर्फ कर्नाटक या केरल तक सीमित नहीं है। खड़गे और राहुल गांधी की जोड़ी पिछले कई दिनों से पर्दे के पीछे एक बहुत बड़े सांगठनिक कायाकल्प (Organizational Overhaul) के ब्लूप्रिंट पर काम कर रही है। मकसद साफ है— अगले दो साल में होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की मशीनरी को एकदम चुस्त-दुरुस्त करना।
AICC के एक महासचिव ने 'द फेडरल' को नाम न छापने की शर्त पर बताया, "आने वाले दिनों में आप अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) और विभिन्न राज्यों की इकाइयों में बहुत बड़े और चौंकाने वाले बदलाव देखने वाले हैं।" इस बड़े बदलाव की आहट पिछले हफ्ते ही मिल गई थी जब कर्नाटक के संकट को सुलझाने के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अचानक गिरिश चोडनकर को फिर से गोवा कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। चोडनकर पिछले साल फरवरी से तमिलनाडु और पुडुचेरी के प्रभारी के रूप में काम कर रहे थे। वे उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने राहुल गांधी को स्टालिन की DMK का साथ छोड़कर विजय की TVK से हाथ मिलाने की सलाह दी थी। हालांकि, पी. चिदंबरम और के. सेल्वपेरुन्थगई जैसे राज्य के वरिष्ठ नेता इसके खिलाफ थे। लेकिन जब 4 मई के चुनावी नतीजों ने तमिलनाडु में विजय की सरकार तय कर दी, तो हाईकमांड ने चोडनकर की रणनीति पर मुहर लगा दी। अब चोडनकर को तमिलनाडु की जिम्मेदारी से मुक्त कर पूरी तरह गोवा विधानसभा चुनाव की तैयारियों में झोंक दिया गया है।
पंजाब, राजस्थान और यूपी में गिर सकती है गाज
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, तमिलनाडु के प्रदेश अध्यक्ष सेल्वपेरुन्थगई को भी जल्द ही बदला जा सकता है, क्योंकि पार्टी अब किसी ऐसे चेहरे को आगे लाना चाहती है जिसके संबंध नए सहयोगी विजय के साथ बेहतर हों। लेकिन सबसे बड़ा और धमाकेदार फेरबदल पंजाब में होने की उम्मीद है, जिसकी घोषणा अगले कुछ दिनों में ही हो सकती है।
पंजाब का संकट: पंजाब में अगले साल चुनाव हैं और वहां कांग्रेस गुटबाजी के दलदल में धंसी हुई है। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग (जो राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं) के कार्यकाल में पार्टी लगातार कई उपचुनाव और नगर निकाय चुनाव हारी है। चुनावी रणनीतिकार सुनील कानूगोलू की रिपोर्ट के आधार पर हाईकमांड ने पंजाब के लिए नया फॉर्मूला तैयार किया है। इसके तहत पूर्व दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया जा सकता है, जबकि राजा वडिंग (जट सिख) की जगह एक हिंदू चेहरे विजय इंदर सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष की कमान दी जा सकती है। यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल ही में बीजेपी ने भी सुनील जाखड़ (हिंदू) को हटाकर केवल सिंह ढिल्लों (जट सिख) को अपना पंजाब अध्यक्ष बनाया है।
राजस्थान में सचिन पायलट की वापसी?: राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत वापसी की कोशिश कर रहे थे, उन्हें आखिरकार गोविंद सिंह डोटासरा की जगह राजस्थान कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती है। यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि 2020 में जब पायलट ने अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत की थी, तब उनसे अध्यक्ष पद छीनकर डोटासरा को ही दिया गया था।
उत्तर प्रदेश और केरल: यूपी में अजय राय पिछले तीन साल से अध्यक्ष हैं। पार्टी अब उनकी जगह किसी मजबूत 'दलित' चेहरे को लाने पर विचार कर रही है ताकि समाजवादी पार्टी के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और मजबूत किया जा सके। वहीं केरल में मौजूदा अध्यक्ष सनी जोसेफ के मंत्री बनने के बाद नए अध्यक्ष की तलाश तेज हो गई है।
दिल्ली (AICC) के दरबार में भी चलेगी कैंची
इस बदलाव की आंच सिर्फ राज्यों तक ही सीमित नहीं रहने वाली है, बल्कि दिल्ली में 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में भी कई बड़े प्रवक्ताओं, महासचिवों और राज्य प्रभारियों की परफॉर्मेंस का रिव्यू चल रहा है। राहुल गांधी और खड़गे ने उन पदाधिकारियों की एक लिस्ट तैयार की है जिनकी शिकायतें लगातार राज्यों से आ रही थीं या जो अपने काम में नाकाम रहे हैं।
केरल सरकार में मंत्री बनने के बाद दिग्गज नेता रमेश चेन्निथला महाराष्ट्र के प्रभारी का पद छोड़ेंगे। असम में पिछले महीने मिली करारी हार के बाद महासचिव जितेंद्र सिंह पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। इसके अलावा, बिहार में राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले कृष्ण अल्लावारु को हटाने की मांग लंबे समय से चल रही है, जबकि गुजरात में मुकुल वासनिक के ढीले कामकाज से हाईकमांड नाराज है। हरियाणा के प्रभारी बीके हरिप्रसाद को भी हटाया जा सकता है क्योंकि उन पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पक्ष में पक्षपात करने के आरोप लगे हैं। हरिप्रद्याद को कर्नाटक कैबिनेट के विस्तार में जगह देकर हरियाणा की जिम्मेदारी से मुक्त किया जा सकता है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी को आखिरकार यह समझ आ गया है कि जिन युवाओं या करीबियों को उन्होंने बार-बार चेतावनियों के बावजूद महासचिव या प्रभारी बनाया था, अगर उनके भरोसे रहे तो पार्टी का चुनावी ग्राफ कभी ऊपर नहीं जाएगा। राहुल अब युवा, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और आक्रामक चेहरों को टीम में लाना चाहते हैं, लेकिन वे उन पुराने कद्दावर नेताओं को भी बनाए रखने के पक्ष में हैं जिनके पास राजनीतिक अनुभव और सूझबूझ है।
दो सबसे बड़े सवाल: केसी वेणुगोपाल और प्रियंका गांधी का क्या होगा?
इस पूरे सांगठनिक महा-अभियान में कांग्रेस के तमाम नेताओं की नजरें दो सबसे बड़े फैसलों पर टिकी हुई हैं:
क्या केसी वेणुगोपाल की ज़िम्मेदारी कम होगी?: साल 2019 से संगठन महासचिव का पद संभाल रहे केसी वेणुगोपाल के कामकाज से पार्टी का एक बड़ा धड़ा बेहद असंतुष्ट है। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे हिंदी पट्टी की जमीनी हकीकत को नहीं समझते और राज्यों के आपसी झगड़ों को सुलझाने के बजाय केवल राहुल गांधी के 'गेटकीपर' के रूप में काम करते हैं। हाल ही में केरल में मुख्यमंत्री पद के लिए वीडी सतीशन और वेणुगोपाल के बीच चली 10 दिन की खींचतान के बाद माना जा रहा है कि राहुल गांधी अब वेणुगोपाल के पर कतर सकते हैं और उनकी जगह किसी नए संगठन महासचिव की नियुक्ति हो सकती है।
प्रियंका गांधी की नई भूमिका: पार्टी के भीतर प्रियंका गांधी को एआईसीसी (AICC) में एक स्पष्ट और बड़ी जिम्मेदारी देने की मांग लगातार उठती रही है। हाईकमांड के पास काफी समय से एक प्रस्ताव लंबित है, जिसके तहत प्रियंका गांधी के नेतृत्व में एक विशेष 'इलेक्शन स्ट्रैटेजी डिपार्टमेंट' (चुनाव रणनीति विभाग) बनाया जाना है। अब देखना यह है कि खड़गे और राहुल इस प्रस्ताव को हरी झंडी देते हैं या फिर प्रियंका बिना किसी तय पोर्टफोलियो के केवल सामान्य महासचिव बनी रहती हैं।
कुल मिलाकर कहानी बिल्कुल साफ है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह समझ आ चुका है कि बिना कड़े और कड़वे फैसले लिए सांगठनिक जड़ता को खत्म नहीं किया जा सकता। सालों की देरी और आधे-अधूरे मन से किए जाने वाले हस्तक्षेपों के दौर को पीछे छोड़ते हुए, कांग्रेस अब एक दुर्लभ और अप्रत्याशित जल्दबाजी के साथ आगे बढ़ रही है। हालांकि, यह सांगठनिक फेरबदल वोटों और चुनावी जीत में कितना बदल पाएगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस अब 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

