सिर्फ अधिकार नहीं, देश की जरूरत, क्यों भारत की प्रगति के लिए अनिवार्य है महिलाओं का नेतृत्व?
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सिर्फ अधिकार नहीं, देश की जरूरत, क्यों भारत की प्रगति के लिए अनिवार्य है महिलाओं का नेतृत्व?

आजादी के बाद से अब तक भारत ने केवल 18 महिला मुख्यमंत्री देखी हैं। 1960 के दशक में सुचेता कृपलानी से शुरू हुआ यह सिलसिला नंदिनी सत्पथी, जयललिता, मायावती, सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, उमा भारती, वसुंधरा राजे और ममता बनर्जी तक पहुँचा है।


भारत की राजनीति इस समय 'महिला आरक्षण' की आग में तप रही है। 17 अप्रैल को लोकसभा में 2029 से लागू होने वाले आरक्षण बिल के गिर जाने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर 'नारी शक्ति' के अपमान का आरोप लगा रहे हैं। सरकार इसे विपक्ष की नकारात्मकता बता रही है, तो विपक्ष इसे 'परिसीमन' के जरिए दक्षिण भारतीय राज्यों की आवाज दबाने की साजिश। लेकिन इन बहसों के शोर के बीच एक बुनियादी सवाल दबा रह गया। भारतीय राजनीतिक दलों ने अपनी महिला नेताओं को आगे बढ़ने के कितने वास्तविक मौके दिए हैं? और जिन महिलाओं ने मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय किया, उन्होंने देश के शासन और संघवाद (Federalism) पर क्या प्रभाव डाला?

पंचायतों में भागीदारी, पर शीर्ष पर सन्नाटा

एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिलाएं स्थानीय निकायों (पंचायतों और नगर पालिकाओं) में सक्रिय हैं। यह संख्या दिखाती है कि जमीनी स्तर पर बदलाव आया है। लेकिन विडंबना देखिए, जैसे-जैसे हम सत्ता के ऊंचे पायदानों यानी विधानसभा और संसद की ओर बढ़ते हैं, महिलाओं की संख्या कम होती जाती है। आज भी अधिकांश महिला प्रतिनिधियों को 'किसी की पत्नी', 'बेटी' या 'शिष्य' के तौर पर ही पेश किया जाता है। वे अक्सर एक पितृसत्तात्मक ढांचे की छाया में काम करने को मजबूर हैं।

18 महिला मुख्यमंत्री: कांटों भरा सफर

आजादी के बाद से अब तक भारत ने केवल 18 महिला मुख्यमंत्री देखी हैं। 1960 के दशक में सुचेता कृपलानी से शुरू हुआ यह सिलसिला नंदिनी सत्पथी, जयललिता, मायावती, सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, उमा भारती, वसुंधरा राजे और ममता बनर्जी तक पहुँचा है। इन सभी नेताओं में एक बात समान रही। इनके लिए सत्ता की सीढ़ी चढ़ना कभी आसान नहीं था। इन्हें न केवल अपने विरोधियों से लड़ना पड़ा, बल्कि अपनी ही पार्टी के पुरुष प्रधान सिस्टम से भी लोहा लेना पड़ा।

जयललिता, मायावती और ममता: राष्ट्रीय राजनीति की धुरी

इन तीन नेताओं ने क्षेत्रीय राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय की।

जयललिता (तमिलनाडु): 'अम्मा' के नाम से मशहूर जयललिता ने तमिलनाडु में महिलाओं को एक निर्णायक 'वोट बैंक' में बदल दिया। उनके 'अम्मा ब्रांड' शासन मॉडल की नकल आज पूरे देश में की जाती है। 1999 में उन्होंने चेन्नई में बैठकर दिल्ली की वाजपेयी सरकार को गिराकर अपनी ताकत का अहसास कराया था।

मायावती (उत्तर प्रदेश): कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती ने 2007 में 'सोशल इंजीनियरिंग' के जरिए दलित-ब्राह्मण गठबंधन बनाकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। उन्होंने भाजपा और सपा जैसी पार्टियों के 'पुरुष वर्चस्व' को चुनौती देते हुए दलित अस्मिता को चुनावी राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।

ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल): ममता के पास जयललिता (MGR) या मायावती (कांशीराम) जैसा कोई मार्गदर्शक नहीं था। उन्होंने अकेले दम पर कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और बंगाल में 34 साल पुराने वामपंथी किले को ढहा दिया। आज 70 साल की उम्र में भी वे केंद्र की सत्ता के खिलाफ सबसे मजबूत 'स्ट्रीट फाइटर' मानी जाती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इन तीनों नेताओं पर 1990 के दशक में उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा शारीरिक हमले किए गए थे, लेकिन इन हमलों ने उनके संकल्प को और मजबूत किया।

कुशल प्रशासक: शीला दीक्षित और वसुंधरा राजे

जहाँ ममता और मायावती को 'जुझारू' नेता माना जाता है, वहीं शीला दीक्षित और वसुंधरा राजे ने खुद को 'कुशल प्रशासक' के रूप में स्थापित किया।

शीला दीक्षित: उन्होंने 15 साल तक दिल्ली पर राज किया। कांग्रेस के भीतर अंदरूनी कलह के बावजूद उन्होंने दिल्ली का चेहरा बदल दिया। कॉमनवेल्थ घोटालों के बावजूद उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई थी, लेकिन अंततः वे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की भेंट चढ़ गईं।

वसुंधरा राजे: राजस्थान में भाजपा की सबसे बड़ी संपत्ति रही वसुंधरा ने 'भामाशाह योजना' जैसे महिला सशक्तिकरण के कामों से पहचान बनाई। हालांकि, बाद में पार्टी आलाकमान और आरएसएस से मतभेदों के कारण उनकी भूमिका सीमित कर दी गई।

आकस्मिक और 'स्टॉप-गैप' मुख्यमंत्री

बिहार में राबड़ी देवी का नाम अक्सर 'डमी सीएम' के तौर पर लिया जाता है, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में न केवल सरकार चलाई बल्कि पार्टी को भी बिखरने से बचाया। वहीं, दिल्ली में सुषमा स्वराज को केवल दो महीने के लिए सीएम बनाया गया, वह भी तब जब पार्टी की हार निश्चित दिख रही थी। वे भाजपा की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन उनका असली निखार बाद में केंद्र में विदेश मंत्री के तौर पर हुआ।

हाल ही में दिल्ली में आतिशी और रेखा गुप्ता जैसे नाम सामने आए हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इन्हें 'स्टॉप-गैप' (अस्थायी) व्यवस्था के तौर पर देखते हैं। जब भी कोई पार्टी संकट में होती है या उसे अपनी छवि साफ करनी होती है, तो अक्सर महिलाओं को आगे कर दिया जाता है, लेकिन असली ताकत पर्दे के पीछे पुरुषों के पास ही रहती है।

वामपंथ और महिला नेतृत्व का अभाव

हैरानी की बात यह है कि प्रगतिशीलता का दावा करने वाले वामपंथी दलों (Left) ने आज तक भारत में एक भी महिला मुख्यमंत्री नहीं दी। केरल में के.आर. गौरी अम्मा और के.के. शैलजा जैसी कद्दावर नेता रहीं, लेकिन उन्हें कभी शीर्ष पद तक नहीं पहुँचने दिया गया। बंगाल में भी लेफ्ट अक्सर ममता के खिलाफ नई महिला चेहरों को उतारता है, लेकिन नेतृत्व में महिलाओं को जगह देने में वे अब भी पीछे हैं।

महिला आरक्षण बिल का पास होना या न होना एक कानूनी प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन असली सवाल 'नीयत' का है। जब तक राजनीतिक दल अपनी आंतरिक संरचना में महिलाओं को बराबरी का स्थान नहीं देंगे, तब तक आरक्षण भी केवल 'प्रॉक्सी' (किसी और की जगह काम करने वाली) महिला नेताओं को ही जन्म देगा। जयललिता, ममता और मायावती ने साबित किया है कि महिलाएं सत्ता चला भी सकती हैं और सत्ता पलट भी सकती हैं। अब बारी सिस्टम की है कि वह उन्हें 'रास्ता' देता है या उन्हें अपना रास्ता खुद बनाने के लिए फिर से संघर्ष करना होगा।

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