
संख्या नहीं, सियासी रणनीति हारी, महिला आरक्षण पर खुला खेल
लोकसभा में संशोधन बिल गिरने से महिला आरक्षण बरकरार है, पर परिसीमन और राजनीति के चलते इसके लागू होने पर अनिश्चितता बनी हुई है।
महिला आरक्षण संशोधन बिल पर विपक्ष ने एकजुट होकर मोदी सरकार को लोकसभा में मात दे दी। इस विषय पर कैपिटल बीट एपिसोड में द फेडरल के राजनीतिक संपादक पुनीत निकोलस यादव और सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने महिला आरक्षण अधिनियम के क्रियान्वयन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक की हार पर विस्तार से चर्चा की। यह विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका—इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। इससे महिला आरक्षण, परिसीमन (डिलिमिटेशन) और चुनावी रणनीति पर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
संशोधन विधेयक की हार और उसका असर
चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि इस संशोधन विधेयक की हार का मतलब यह नहीं है कि 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम रद्द हो गया है। यह कानून अब भी संविधान का हिस्सा बना हुआ है, हालांकि इसके क्रियान्वयन से जुड़े प्रस्तावित बदलाव खारिज हो गए हैं। विशेष सत्र में सरकार द्वारा लाए गए तीन परस्पर जुड़े विधेयकों में से, संविधान संशोधन विधेयक के असफल होने के बाद बाकी दो विधेयक भी स्वतः अप्रभावी हो गए।
संशोधन विधेयक का उद्देश्य
पुनीत यादव के अनुसार, इस विधेयक के तीन मुख्य उद्देश्य थे। पहला, लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 850 करना। दूसरा, परिसीमन प्रक्रिया लागू करना, जिसे निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण के रूप में समझा जाता है। तीसरा, इन दोनों के बाद महिला आरक्षण को लागू करना।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने इस विधेयक को महिला आरक्षण को तेज़ी से लागू करने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन इसके प्रावधान उससे कहीं अधिक व्यापक थे।
विधेयक क्यों पास नहीं हुआ
विधेयक के असफल होने का मुख्य कारण सरकार के पास पर्याप्त संख्या का अभाव था। 540 सदस्यों वाली लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 वोट जरूरी थे, जबकि सरकार के पास केवल 293 सदस्य थे। विपक्ष के समर्थन के बिना संविधान संशोधन संभव नहीं था।विपक्षी दलों ने बहस के दौरान गंभीर चिंताएं जताईं और सामूहिक रूप से विधेयक के खिलाफ मतदान किया।
महिला आरक्षण की वर्तमान स्थिति
विधेयक की हार के बावजूद महिला आरक्षण अधिनियम पूरी तरह प्रभावी बना हुआ है। जैसा कि यादव ने स्पष्ट किया, “महिला आरक्षण खत्म नहीं हुआ है।” यह कानून 2023 में पारित होकर पहले ही संविधान का हिस्सा बन चुका है।हालांकि, इसका वास्तविक क्रियान्वयन परिसीमन और नए चुनावों पर निर्भर करता है। सरकार ने 16 अप्रैल से इसे लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी है, लेकिन इसका तत्काल प्रभाव संभव नहीं है क्योंकि इसके लिए नए चुनाव आवश्यक हैं।
क्रियान्वयन की चुनौतियां
महिला आरक्षण के तहत एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन मौजूदा विधानसभाओं में इसे लागू करने के लिए परिसीमन अनिवार्य है।एक और चिंता यह है कि आरक्षण की अवधि 15 साल तय की गई है, जिसमें से कुछ समय बिना लागू हुए ही बीत सकता है।
अन्य विधेयकों का भविष्य
संविधान संशोधन विधेयक के असफल होने के कारण उससे जुड़े अन्य दो विधेयक भी प्रभावहीन हो गए हैं। ये दोनों विधेयक उसी संशोधन पर आधारित थे, इसलिए पूरा विधायी पैकेज विफल माना जा रहा है।
विपक्ष का रुख
शबनम हाशमी ने स्पष्ट किया कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह इसे परिसीमन से अलग करना चाहता है। उनके अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया पहले से तय और सुनियोजित थी।उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को पहले से पता था कि उसके पास आवश्यक बहुमत नहीं है।
राजनीतिक संदेश और चुनावी असर
चर्चा में यह भी सामने आया कि सरकार इस हार को राजनीतिक रूप से भुना सकती है और इसे विपक्ष द्वारा महिला आरक्षण रोकने के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।हाशमी के अनुसार, चुनावों में इस नैरेटिव का इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां जनता को बताया जाएगा कि विपक्ष ने आरक्षण लागू नहीं होने दिया।
परिसीमन पर जारी बहस
दोनों वक्ताओं ने माना कि परिसीमन का मुद्दा अभी भी बेहद महत्वपूर्ण और विवादित बना हुआ है। यादव ने इसे एक “जारी खतरा” बताया, क्योंकि भविष्य में होने वाला परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकता है।
आगे की चुनौतियां
पुनीत निकोलस यादव ने कहा कि विपक्ष को इस मुद्दे पर मजबूत अभियान चलाने और जन आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। वहीं, हाशमी ने जनता को जागरूक करने और गलत सूचनाओं का मुकाबला करने को सबसे बड़ी चुनौती बताया।यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि महिला आरक्षण का मुद्दा केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें परिसीमन, राजनीतिक रणनीति और जनधारणा जैसे कई जटिल पहलू जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में यह विषय भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।

