विपक्ष का सबसे गंभीर आरोप यह है कि प्रधानमंत्री ने एक आधिकारिक और राष्ट्रीय मंच का उपयोग अपनी पार्टी के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने और विरोधियों पर कीचड़ उछालने के लिए किया।
मल्लिकार्जुन खड़गे का तीखा हमला: '12 साल की नाकामियों का पर्दा'
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर प्रधानमंत्री के संबोधन की धज्जियां उड़ाईं। खड़गे ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री "हताश और निराश" हैं क्योंकि पिछले 12 वर्षों के शासन में उनके पास जनता को दिखाने के लिए कोई वास्तविक उपलब्धि नहीं है।
खड़गे ने किया प्रहार:
चुनावी भाषण का मुखौटा: खड़गे ने कहा कि यह राष्ट्र के नाम संबोधन नहीं, बल्कि सरासर झूठ और विरोधियों के प्रति नफरत से भरा एक राजनीतिक भाषण था।
कांग्रेस बनाम महिला मुद्दे: उन्होंने डेटा का हवाला देते हुए बताया कि पीएम मोदी ने अपने भाषण में 59 बार 'कांग्रेस' का नाम लिया, जबकि महिलाओं का जिक्र बमुश्किल कुछ ही बार आया। यह स्पष्ट करता है कि उनकी प्राथमिकता महिलाएं नहीं, बल्कि विपक्षी दलों को नीचा दिखाना है।
भाजपा का 'महिला विरोधी' चेहरा: खड़गे ने हाथरस, उन्नाव और हरियाणा की महिला पहलवानों के साथ हुए व्यवहार की याद दिलाते हुए पूछा कि भाजपा इन पर चुप क्यों है? उन्होंने बिलकिस बानो के दोषियों की रिहाई और अपराधियों के सम्मान का मुद्दा उठाकर भाजपा के 'नारी शक्ति' के दावों को खोखला बताया।
चुनाव आयोग को खुली चुनौती: 'खर्च भाजपा के खाते में जुड़े'
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य साकेत गोखले ने इस मामले में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनमें साहस है, तो उन्हें प्रधानमंत्री के इस टीवी संबोधन के खर्च को भाजपा के चुनावी खर्च में जोड़ना चाहिए।
गोखले का तर्क है कि जब दो राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और आदर्श आचार संहिता (MCC) प्रभावी है, तब सरकारी संसाधनों का उपयोग करके विपक्ष पर हमला करना एक गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने इसे "गिरती हुई साख" का प्रतीक बताया और कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह की पकड़ अब ढीली हो रही है।
दक्षिण भारत के साथ अन्याय: डीएमके की गंभीर आपत्ति
डीएमके प्रवक्ता टी.के.एस. एलंगोवन ने महिला आरक्षण बिल के पीछे छिपे 'परिसीमन' के खतरे को उजागर किया। उन्होंने भाजपा पर जनता को धोखा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह बिल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ाकर दक्षिण भारत की राजनीतिक आवाज को दबाने की एक साजिश है।
डीएमके का तर्क:
सीटों का असंतुलन: एलंगोवन ने कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत दक्षिण के राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) की सीटें घटकर अनुपात में बेहद कम रह जाएंगी, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व 680 सीटों तक पहुँच जाएगा।
विपक्ष का रुख: उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष ने कभी महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया, बल्कि आरक्षण को लागू करने के लिए अपनाई जा रही संदिग्ध प्रक्रिया का विरोध किया है।
संसदीय गरिमा का पतन: वामपंथी दलों का कड़ा रुख
सीपीआई (एम) के राज्यसभा नेता जॉन ब्रिटास ने इसे भारतीय संसदीय इतिहास का एक काला अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि आज तक किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन जैसे गरिमामय मंच का उपयोग विपक्ष को "भ्रूण हत्या" जैसे शब्दों से संबोधित करने के लिए नहीं किया। ब्रिटास के अनुसार, लोकसभा में संविधान संशोधन बिल पर मिली विधायी पटखनी के बाद सरकार अपना संतुलन खो चुकी है।
सीपीआई (एम) महासचिव एम.ए. बेबी ने प्रधानमंत्री के इस संबोधन को "थिएट्रिक्स" (नाटकबाजी) करार दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति अब काम नहीं करेगी और प्रधानमंत्री का असली चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो चुका है।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी?
विपक्ष का यह संयुक्त प्रहार यह संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ेगा। मुद्दा केवल एक भाषण का नहीं है, बल्कि उस परिपाटी का है जिसके तहत सरकारी संस्थानों और राष्ट्रीय प्रसारण का उपयोग चुनावी लाभ के लिए किया जा रहा है। अब सबकी नजरें चुनाव आयोग पर हैं कि क्या वह इस मामले में कोई संज्ञान लेगा या फिर इसे 'रूटीन संबोधन' मानकर नजरअंदाज कर देगा।