‘मैसेंजर’ बना पाकिस्तान, क्या भारत के लिए खतरे का संकेत?
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‘मैसेंजर’ बना पाकिस्तान, क्या भारत के लिए खतरे का संकेत?

US-ईरान तनाव में पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका और अमेरिका से नजदीकी भारत के लिए चिंता का कारण है। जानकारों का कहना है कि भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।


अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त Sharat Sabarwal का मानना है कि जब भी पाकिस्तान का अमेरिका के साथ लेन-देन आधारित (ट्रांजैक्शनल) रिश्ता मजबूत होता है, वह भारत के प्रति अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है।

‘मैसेंजर’ की भूमिका में पाकिस्तान

सबरवाल के अनुसार, मौजूदा हालात में पाकिस्तान की भूमिका एक ‘मैसेंजर’ या संदेशवाहक की रही है। उसने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने, संदेश पहुंचाने और इस्लामाबाद में बैठक आयोजित कराने में मदद की। हालांकि, वह किसी भी निर्णय लेने या प्रभाव डालने वाली भूमिका में नहीं था, सिवाय इसके कि उसने चीन के माध्यम से ईरान को प्रभावित करने की कोशिश की हो।

बैठक से कुछ दिन पहले पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री Ishaq Dar बीजिंग गए थे, जहां उन्होंने संभवतः अमेरिकी सहमति से चीनी नेतृत्व को जानकारी दी।

पाकिस्तान को यह भूमिका कैसे मिली?

इस भूमिका के पीछे कई कारण बताए गए हैं। एक बड़ा कारण अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump और पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir के बीच बेहतर संबंध हैं। ट्रंप ने मुनीर को अपना “पसंदीदा फील्ड मार्शल” तक बताया है।इसके अलावा, पाकिस्तान के ईरान के साथ स्थिर संबंध हैं, जबकि वह सार्वजनिक रूप से इजराइल के खिलाफ सख्त रुख रखता है। साथ ही, सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा संबंध भी मजबूत हैं। पाकिस्तान नहीं चाहता कि उसे ईरान के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य मदद करनी पड़े, जिससे उसके अंदर सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।

भारत के लिए बढ़ी चिंता

भारत के नजरिए से चिंता की बात यह है कि पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका के साथ नए तरह के रणनीतिक रिश्ते में आ रहा है। हाल के महीनों में यह रिश्ता व्यापार, रेयर अर्थ मिनरल्स और पश्चिम एशिया में रणनीतिक सहयोग के जरिए मजबूत हुआ है।इतिहास बताता है कि जब-जब पाकिस्तान अमेरिका के करीब हुआ है, उसने भारत के खिलाफ जोखिम भरे कदम उठाए हैं। हालांकि, सबरवाल कहते हैं कि यह जरूरी नहीं कि इतिहास खुद को दोहराए, लेकिन भारत को सतर्क रहना होगा।

वैश्विक नजरिए में बदलाव

सबरवाल के अनुसार, दुनिया पाकिस्तान को भारत से अलग नजरिए से देखती है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान आर्थिक और राजनीतिक संकट से उबरकर फिर से वैश्विक मंच पर सक्रिय हुआ है। Asim Munir के नेतृत्व में सत्ता स्थिर हुई है और IMF, चीन व सऊदी अरब से आर्थिक समर्थन मिला है।हालांकि, देश में अब भी आतंकवाद, सांप्रदायिकता और सैन्य-नागरिक असंतुलन जैसी समस्याएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान की वैश्विक प्रासंगिकता फिर बढ़ रही है।

क्या बढ़ेगा टकराव?

अमेरिका और इजराइल के बीच भी इस मुद्दे पर पूरी तरह एकराय नहीं है। Benjamin Netanyahu के लिए संघर्ष जारी रखना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है, जबकि Donald Trump के लिए यह संघर्ष आर्थिक दबाव और चुनावी चुनौती बनता जा रहा है।तेल की कीमतों में उछाल, वैश्विक बाजार में गिरावट और बढ़ती महंगाई ने अमेरिका पर दबाव बढ़ाया है। वहीं, ईरान भी नुकसान और आर्थिक असर के चलते तनाव कम करना चाहता है।

खतरे की ओर बढ़ते हालात

इस्लामाबाद वार्ता के असफल रहने और अमेरिका द्वारा नाकाबंदी जैसे कदमों की घोषणा से हालात और बिगड़ सकते हैं। ईरान की जवाबी कार्रवाई की चेतावनी से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।

क्या पाकिस्तान फिर जोखिम उठाएगा?

इतिहास के उदाहरण बताते हैं कि जब पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन मिला, उसने जोखिम भरे सैन्य कदम उठाए—जैसे 1965 का युद्ध और 1971 का संकट। हर बार उसे नुकसान हुआ, लेकिन भारत को भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सबरवाल के मुताबिक, यह जरूरी नहीं कि वैसा फिर हो, लेकिन पाकिस्तान की सैन्य नेतृत्व की अप्रत्याशित नीतियों को देखते हुए किसी भी घटना जैसे आतंकी हमला—से हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।

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