Controversy On Pashupati Seal: सिंधु घाटी सभ्यता की करीब 4,300 साल पुरानी एक ऐतिहासिक धरोहर इस समय भारत और वैश्विक इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और सांस्कृतिक विचारकों के बीच एक बड़े विवाद का केंद्र बन गई है। यह पूरा विवाद तब भड़का, जब अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई इतिहास की प्रोफेसर ऑड्रे ट्रशके ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा 'पशुपति सील' (Pashupati Seal) की गई व्याख्या को सोशल मीडिया पर सीधे तौर पर चुनौती दे दी। यह बहस केवल एक प्राचीन मुहर (Artefact) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत की सभ्यता की निरंतरता, हिंदू परंपराओं की उत्पत्ति और भारत के प्राचीन अतीत की व्याख्या के अधिकार जैसे संवेदनशील और बड़े वैचारिक मुद्दों से जुड़ी है।
संस्कृति मंत्रालय का दावा 'पशुपति सील' भारत की अटूट सभ्यता का प्रतीक
विवाद की शुरुआत 27 मई को हुई, जब भारत के संस्कृति मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर 'पशुपति सील' (जिसे सील 420 भी कहा जाता है) की तस्वीर साझा की। मंत्रालय ने इसे भारत की "अटूट और अखंड सभ्यतागत निरंतरता" (Unbroken Civilisational Continuity) का एक कालातीत प्रतीक बताया। सरकार का तर्क है कि मुहर पर योग मुद्रा में बैठे पुरुष, उनके चारों ओर मौजूद जानवरों और आध्यात्मिक दृश्यों का संबंध बाद की हिंदू परंपराओं, विशेष रूप से शैव मत (Shaivism) से है। मंत्रालय ने इस आकृति को 'शिव-पशुपति' के रूप में चिह्नित करते हुए कहा कि ये सांस्कृतिक तत्व आज भी भारत की धार्मिक और आध्यात्मिक प्रथाओं में जीवित हैं।
ऑड्रे ट्रशके का तर्क 'यह शिव नहीं, यूरेशिया का लॉर्ड ऑफ एनिमल्स मोटिफ है'
हमेशा अपने बयानों को लेकर विवादों में रहने वाली अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रशके ने सरकार के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रशके का तर्क है कि जब तक सिंधु घाटी की लिपि (Indus Script) को पूरी तरह से पढ़ा नहीं जाता, तब तक इस आकृति को निश्चित रूप से भगवान शिव के रूप में पहचानना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसका कोई सीधा लिखित (Textual) प्रमाण नहीं है। उन्होंने दावा किया कि यह आकृति तत्कालीन ईरान की 'प्रोटो-एलामाइट' (Proto-Elamite) संस्कृति और अन्य यूरेशियाई सभ्यताओं में पाए जाने वाले व्यापक "लॉर्ड ऑफ एनिमल्स" (पशुओं के देवता) के प्रतीक से प्रभावित हो सकती है। ट्रशके के अनुसार, प्राचीन सभ्यताओं का अध्ययन तुलनात्मक साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि पुरानी चीजों पर बाद की धार्मिक पहचान को थोपकर।
अमिष त्रिपाठी और भारतीय इतिहासकारों का तीखा पलटवार— 'क्या योग भी अब ईरानी है?'
ट्रशके के इस दावे पर भारत के प्रसिद्ध लेखक अमिष त्रिपाठी और इतिहासकार लावण्या वेमसाणी ने बेहद तीखा पलटवार किया है। अमिष त्रिपाठी ने ट्रशके के तर्क की धज्जियां उड़ाते हुए एक्स (X) पर लिखा, "पशुपति सील पर हाथी, गैंडा और जल भैंसा जैसे जानवर छपे हैं, जो केवल भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं, प्राचीन एलाम (दक्षिण-पश्चिम ईरान) में नहीं। इसके अलावा, यह आकृति एक विशिष्ट योग मुद्रा (Yogic Posture) में बैठी है। तो क्या अब योग भी एलामाइट हो गया है? गंभीरता से पूछ रहा हूँ?"
वहीं, इतिहासकार लावण्या वेमसाणी ने भी ट्रशके को घेरते हुए कहा कि प्रोटो-एलामाइट सील और भारत की पशुपति सील में कोई समानता नहीं है और यह आकृति प्राकृतिक रूप से स्वदेशी भारतीय परंपराओं में पूरी तरह फिट बैठती है। उन्होंने कहा कि कोई भी हमसे हमारे भगवान और हमारा इतिहास नहीं छीन सकता।
1931 से जारी है 'प्रोटो-शिव' थ्योरी पर बहस
गौरतलब है कि साल 1931 में ब्रिटिश पुरातत्वविद सर जॉन मार्शल ने सबसे पहले मोहनजोदड़ो से मिली इस प्राचीन मुहर को "प्रोटो-शिव" या पशुपति (पशुओं के स्वामी) का प्रारंभिक रूप कहा था। हालांकि तब से ही इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय रही है। सरकार के समर्थक जहां इसे सिंधु घाटी और आधुनिक हिंदू धर्म के बीच की सबसे मजबूत सांस्कृतिक कड़ी मानते हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि बिना लिपि पढ़े किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना केवल एक अनुमान लगाना होगा। बहरहाल, करीब एक सदी बाद भी यह पशुपति सील दुनिया के सबसे रहस्यमयी और विवादित अवशेषों में से एक बनी हुई है।