
जनता के लिए सादगी, नेताओं के लिए ठाट? बीजेपी की किफायत नीति पर उठे सवाल
एक अर्थशास्त्री और कार्यकर्ता ने प्रधानमंत्री मोदी के अचानक जन त्याग के आह्वान पर सवाल उठाया है, क्योंकि ईंधन की बढ़ती कीमतों से आम नागरिक प्रभावित हो रहे हैं, जबकि सत्ताधारी पार्टी के नेता बड़े-बड़े काफिले प्रदर्शित करना जारी रखे हुए हैं।
Capital Beat: देश में पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से एक खास अपील की है। उन्होंने नागरिकों से ईंधन की खपत कम करने, खाद्य तेल का उपयोग घटाने और विदेश यात्राओं से बचने का आग्रह किया है। पीएम ने इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है। लेकिन अब इस अपील पर गंभीर राजनीतिक और आर्थिक सवाल खड़े होने लगे हैं। विपक्षी दलों और अर्थशास्त्रियों ने पूछा है कि क्या यह सचमुच कोई आर्थिक कदम है या सिर्फ राजनीतिक नाटक है। यह बहस तब और तेज हो गई जब खुद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बड़े नेता सार्वजनिक रूप से इन नियमों की धज्जियां उड़ाते दिखे।
सुवेंदु अधिकारी के चार्टर्ड सफर पर विवाद
इस विवाद के केंद्र में पश्चिम बंगाल के नवनियुक्त मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी आ गए हैं। हाल ही में कार्यभार संभालने वाले अधिकारी शुक्रवार 22 मई को चार्टर्ड फ्लाइट से नई दिल्ली पहुंचे। पीएम मोदी की सादगी और किफायत बरतने की अपील के ठीक कुछ दिनों बाद उनके इस वीआईपी सफर की सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हो रही है। इंटरनेट पर लोग इसे सरकार के दोहरे मापदंड के रूप में देख रहे हैं। इसके अलावा कुछ दिनों पहले बंगाल में एक बड़े काफिले की गाड़ी के ऊपर सवार सुवेंदु अधिकारी के वीडियो भी इंटरनेट पर जमकर वायरल हुए थे।
फडणवीस की इकोनॉमी क्लास यात्रा और काफिले
दूसरी तरफ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक अलग ही तस्वीर पेश करने की कोशिश की है। सोशल मीडिया पर उनकी एक तस्वीर सामने आई जिसमें वह फ्लाइट की इकोनॉमी क्लास में सफर करते दिखे। इसे पीएम मोदी के किफायत संदेश के समर्थन के रूप में देखा गया। इससे पहले फडणवीस मुंबई में मंत्रालय जाने के लिए मोटरसाइकिल की सवारी भी कर चुके हैं। लेकिन मध्य प्रदेश जैसे अन्य बीजेपी शासित राज्यों से बिल्कुल अलग तस्वीरें आईं। वहां नेताओं के कई तेज रफ्तार वाहनों के बड़े-बड़े काफिले देखे गए, जिसने पार्टी की गंभीरता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।
अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने साधा निशाना
प्रसिद्ध विकास अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने डिजिटल शो 'कैपिटल बीट' में इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और बीजेपी का पुराना दोहरा रवैया करार दिया। मेहरोत्रा ने कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री किफायत की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनके नेता चार्टर्ड प्लेन उड़ा रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आम जनता के लिए ही गैस, पेट्रोल और डीजल की कीमतें मायने रखती हैं, नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने याद दिलाया कि खुद पीएम का काफिला भी आलोचना के बाद ही छोटा किया गया था।
अपीलों को बताया गया सरकारी फरमान
बहस में शामिल वकील और सामाजिक कार्यकर्ता आयुष्मान पांडे ने इस पर और कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि इसे अपील कहना ही पूरी तरह गलत है। यह देश की 97 फीसदी आबादी पर थोपा गया एक तरह का सरकारी फरमान है। पांडे ने कहा कि सरकार असल में आम नागरिकों को अपनी खपत कम करने के लिए कह रही है ताकि संसाधनों को कहीं और इस्तेमाल किया जा सके। उन्होंने इसकी तुलना साल 2016 की नोटबंदी से की। उनके अनुसार यह जनता से कोई सलाह-मशविरा नहीं है, बल्कि सीधे बताया जा रहा है कि अब उन्हें क्या करना होगा।
डीजल की बढ़ती कीमतों पर गंभीर सवाल
आर्थिक मोर्चे पर सरकार को घेरते हुए संतोष मेहरोत्रा ने एक और बड़ा विरोधाभास उजागर किया। उन्होंने कहा कि पीएम के ईंधन संरक्षण संदेश के ठीक बाद सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम सीधे तीन रुपये बढ़ा दिए। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सरकार महंगाई को लेकर वाकई चिंतित है, तो डीजल के दाम क्यों बढ़ाए जा रहे हैं। डीजल महंगा होने से देश में हर जरूरी सामान की ढुलाई महंगी हो जाती है, जिससे सीधे खुदरा महंगाई बढ़ती है। उन्होंने मार्च 2026 के एक नए वर्किंग पेपर का भी हवाला दिया, जिसमें भारत के जीडीपी आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की बात कही गई है।
देश में निजी निवेश का बड़ा संकट
मेहरोत्रा ने सरकारी अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि देश में निजी और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) उस पैमाने पर नहीं आ रहा है जिसकी जरूरत है। उन्होंने पूछा कि जब देश के कॉर्पोरेट खुद निवेश नहीं कर रहे हैं, तो विदेशी कंपनियां यहां क्यों आएंगी। वहीं दूसरी तरफ आयुष्मान पांडे ने युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को घेरा। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी नामक इंस्टाग्राम अकाउंट का उदाहरण देते हुए कहा कि युवाओं का गुस्सा अब सोशल मीडिया पर साफ दिख रहा है, जिसे दबाने की कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं।
पिछले दस सालों की कमाई पर चर्चा
चर्चा के दौरान दोनों विशेषज्ञों ने सरकार के पिछले दस वर्षों के वित्तीय रिकॉर्ड पर भी बात की। मेहरोत्रा ने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 30 से 60 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर पर था, तब सरकार ने ईंधन टैक्स के जरिए करीब 43 लाख करोड़ रुपये की भारी रकम जुटाई थी। यूक्रेन युद्ध के समय को छोड़ दें तो सरकार के पास लगातार भारी मुनाफा आया है। पांडे ने पूरी स्थिति को समेटते हुए कहा कि सारा पैसा पहले ही खर्च किया जा चुका है और अब जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है।
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